फ़लस्तीनियों को लेकर डेमोक्रेटिक पार्टी के रुख़ में बदलाव की वजह क्या है?

    • Author, एंथनी जर्चर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नॉर्थ अमेरिका

मध्यपूर्व पर अमेरिका के नज़रिये पर पिछले कई दशकों से नज़र रख रहे चुनाव विश्लेषक जॉन जोग्बी कहते हैं, "इन संघर्षों पर डेमोक्रेटिक पार्टी के रुख़ में नाटकीय बदलाव आया है. यह काफ़ी अधिक बदल गया है."

ख़ास कर युवा पीढ़ी के लोगों का फ़लस्तीनियों के प्रति रुख़ ज़्यादा सहानुभूति भरा है. डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थकों में उम्र के अंतर की वजह से यह बदलाव साफ़ दिख रहा है.

हाल के संघर्षों में राष्ट्रपति जो बाइडन ने इसराइल-फ़लीस्तीनी मुद्दे पर बार-बार अमेरिका का पारंपरिक नज़रिया ही ज़ाहिर किया.

उन्होंने कहा कि इसराइल को हमास के रॉकेट हमलों से आत्मरक्षा का अधिकार है. लेकिन राष्ट्रपति अपने इन विचारों को पार्टी के रुख़ से अलग पा रहे हैं, जो फ़िलहाल ग़ज़ा और पश्चिमी तट में फ़लस्तीनियों की ज़मीनी हालात को लेकर चिंतित दिख रही है.

पार्टी में इसराइल की नीतियों को फ़लस्तीनियों की परेशानियां बढ़ाने वाला माना जा रहा है. इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच के ताज़ा संघर्षों ने स्पष्ट कर दिया है कि इसे मुद्दे को लेकर अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी में राजनीतिक रुख़ किस क़दर बदल गया है.

सांसदों की विविध पृष्ठभूमि

पार्टी के रुख़ में जो परिवर्तन दिख रहा है, उसका पता लगाने की शुरुआत संसद पर नज़र डाल कर की जा सकती है.

संसद में मध्यपूर्व के संघर्षों के मामले में अमेरिकी विदेश नीति का झुकाव इसराइल की ओर रहा है.

दरअसल संसद में चला आ रहा यह ऐतिहासिक झुकाव यहूदियों (डेमोक्रेटिक पार्टी के वोटरों में इनकी बड़ी हिस्सेदारी है) और इवेंजिकल मतदाताओं (रिपबल्किन पार्टियों के लिए अहम वोटर) के रुझान की वजह से रहा है.

लेकिन जैसे-जैसे संसद में विविधता बढ़ती गई है, इसराइल के प्रति अमेरिकी नीति पर इसके अहम असर दिखने लगे हैं.

प्यू फ़ाउंडेशन की एक स्टडी के मुताबिक़ 2021 के हाउस ऑफ़ रिप्रजेंटेटिव और सीनेट के 23 फ़ीसद सदस्य काले, हिस्पानी, एशियाई/ पैसिफ़िक या नेटिव अमेरिकी मूल से जुड़े हैं. दो दशक पहले यह संख्या 11 फ़ीसद थी और 1945 में एक फ़ीसद.

इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच टकराव के मुद्दे पर डेमोक्रेटिक अमेरिकी सांसदों की इस विविधता भरी पृष्ठभूमि ने विचारों में भी विविधता पैदा की है और इससे राजनीतिक ताक़त का भी विकेंद्रीकरण हुआ है.

संसद में युवा लिबरल महिलाओं का एक गुट है, जिसका अनौपचारिक नाम 'द स्कवैड' है. मिसाल के तौर पर इसमें मिशिगन की फ़लस्तीनी अमेरिकी सांसद राशिदा तलैब और मिनेसोटा की सोमालियाई रिफ्यूजी सांसद इल्हान उमर जैसे नाम शामिल हैं.

इस ग्रुप की सबसे प्रमुख सदस्य हैं न्यूयॉर्क की एलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कॉर्टेज़. उन्होंने इस बार डेमोक्रेटिक पार्टी के एक सीनियर सदस्य जो क्रोले को हरा कर अमेरिकी संसद में क़दम रखा था. क्रोले इसराइल के क़ब्ज़े वाले इलाक़ों में इसराइली सेना और फ़लस्तीनियों के बीच संघर्ष में हमेशा इसराइल का पक्ष लेते आए थे.

कुल मिलाकर डेमोक्रेटिक पार्टी और इसके वोटर अब प्यूर्टोरिकन मूल की 31 वर्षीय सांसद ओकासियो-कॉर्टेज़ की तरह दिखते हैं न कि 59 साल के क्रोले की तरह. यही वजह है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के नज़रिये में अब बदलाव दिख रहा है.

बीबीसी के पॉडकास्ट अमेरिकास्ट की एक रिकार्डिंग के दौरान चुनाव विश्लेषक जॉन जोग्बी ने कहा, "अश्वेत लोग ख़ास कर डेमोक्रेटिक पार्टी में मौजूद ऐसे लोग अब अपने साथी अश्वेतों के साथ होने वाले व्यवहार को लेकर बेहद संवेदनशील हैं. वे इसराइल को एक हमलावर की तरह देखते हैं. उन्हें इसराइल के पुराने इतिहास और तमाम मुश्किलों को पार कर हासिल की गई इसकी जीत के बारे में पता नहीं हैं."

वह कहते हैं, "उन्हें इंतेफ़ादा के बाद के वक़्त के बारे में पता है. वे फ़लस्तीनियों और इसराइल के बीच होने वाली लड़ाइयों और ताबड़तोड़ बमबारियों और इनमें मारे गए बेक़सूर लोगों के बारे में ही जानते हैं."

बर्नी फ़ैक्टर

अगर अमेरिकी संसद में विविधता बढ़ रही है तो वह उस वामपंथी प्रगतिशील आंदोलन का नतीजा है, जिसकी बदौलत ओकासियो-कॉर्टेज़ जैसी राजनीतिक नेता चुनाव जीत सकीं.

इस प्रगतिशील आंदोलन पर एक शख़्स का काफ़ी क़र्ज़ है और वह हैं वरमोंट के डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट नेता बर्नी सैंडर्स. एक यहूदी के रूप में पले-बढ़े और 1960 में इसराइल में अपना समय बिता चुके सैंडर्स अपने करियर के शुरुआती दौर में अमूमन इसराइल की नीतियों के प्रति सहानुभूति रखते थे.

लेकिन 2016 में राष्ट्रपति चुनाव के लिए पहली बार रेस में शामिल होने के समय तक वह फ़लस्तीनियों की चिंताओं का समर्थन करने लगे थे. यह उन्हें उनकी डेमोक्रेटिक पार्टी के रुख़ से अलग करता था.

राष्ट्रपति चुनाव के लिए कैंडिडेट्स के बीच प्राइमरी की डिबेट में 2016 में उनकी बहस हिलेरी क्लिंटन से हुई थी.

मार्च, 2016 में इस बहस के आसपास जब इसराइल पर हमास के रॉकेट हमले हुए थे तो सैंडर्स ने साफ़-साफ़ फ़लस्तीनियों की दुर्दशा पर बोला था. उन्होंने उनकी बेरोज़गारी, इसराइली हमलों में उनके ध्वस्त मकानों, चरमराए हेल्थकेयर सुविधाओं और बम से ज़मींदोज़ स्कूलों की ओर ध्यान दिलाया था.

उस वक़्त गार्डियन अख़बार के एड पिलिंग्टन ने कहा था कि सैंडर्स के इस रुख़ ने उस 'अलिखित नियम' को तोड़ कर रख दिया कि अगर आप फ़लस्तीनियों की तकलीफ़ों के बारे में बोलेंगे तो राष्ट्रपति चुनाव में आपकी दावेदारी कमज़ोर पड़ सकती है.

हर फ़लीस्तीनी की जान क़ीमती है

इसमें कोई शक नहीं है कि सैंडर्स राष्ट्रपति पद के लिए अपने दोनों कोशिशों में नाकाम रहे.

लेकिन फ़लस्तीनियों के बारे में उनके विचारों की लोकप्रियता ने अलग-अलग प्रांतों में चुनाव लड़ रहे डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को फ़लस्तीन का मुद्दा उठाने को प्रेरित किया. ये नेता हेल्थकेयर, फ्री कॉलेज एजुकेशन, न्यूतनम मज़दूरी बढ़ाने और पर्यावरण की बेहतरी से जैसे प्रगतिशील मुद्दों के तरह ही फ़लस्तीन की त्रासदी का मुद्दा भी उठाने लगे.

इसके बाद से सैंडर्स इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के ख़िलाफ़ अपनी आलोचना में और आग उगलने लगे. उन्होंने नेतन्याहू को एक 'बेचैन नस्लवादी अधिनायकवादी' क़रार दिया.

पिछले सप्ताह सैंडर्स ने 'न्यूयॉर्क टाइम्स' में एक कॉलम लिख कर रही-सही कसर भी पूरी कर दी. इसे डेमोक्रेटिक पार्टी के किसी छोटे-मोटे नेता का मत कह कर ख़ारिज नहीं किया जा सकता है.

सैंडर्स ने लिखा था, "असल बात तो यह है कि इसराइल, फ़लस्तीनी और इसराइल की ज़मीन पर एक संप्रभु शासन के तौर पर बरक़रार है. लेकिन शांति और न्याय के लिए तैयारी करने के बजाय यह असमान और अलोकतांत्रिक नियंत्रण के लिए ज़्यादा से ज़्यादा मोर्चेबंदी कर रहा है."

न्यूयॉर्क टाइम्स के उस कॉलम के आख़िर में सैंडर्स ने अमेरिका में नई पीढ़ी के आंदोलनकारियों के उभार का समर्थन करते हुए लिखा, "हमने बीते साल जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या के समय अमरीका की गलियों में इन आंदोलनकारियों को उतरते देखा था. हम उन्हें अब इसराइल में देख रहे हैं. हमें वो फ़लस्तीनी इलाक़ों में भी दिख रहे हैं."

उन्होंने जो आख़िरी कुछ शब्द लिखे थे वे सीधे ब्लैक लाइव्स मैटर्स मूवमेंट से उठाए हुए थे. उन्होंने लिखा- "पेलिस्टिनियन लाइव्स मैटर्स".

सैंडर्स पिछले दो सप्ताह से अधिक वक़्त से इसराइली सेना और फ़लस्तीनियों के बीच संघर्ष के दौरान साफ़ तौर पर उभर कर आए रुझानों को नोट कर रहे हैं.

पिछली गर्मियों में अमेरिकी शहरों में आंदोलन के ज़रिये अपनी राजनीतिक पहचान हासिल कर चुके लोगों ने अब अपना ध्यान और राजनीतिक बयानबाज़ी मध्यपूर्व में लगातार चले आ रहे अत्याचारों पर केंद्रित कर दिया है. ऐसे ही अत्याचारों के ख़िलाफ़ वे बीते साल सड़कों पर उतर ही चुके थे.

पिछले साल एक प्राइमरी में लंबे समय से सेंट लुई पर क़ाबिज़ एक डेमोक्रेटिक प्रतिनिधि को हराने वाली सांसद कोरी बुश ने सदन में बृहस्पतिवार को कहा कि सेंट लुई ने मुझे यहां लोगों की ज़िंदगी बचाने के लिए भेजा है.

उन्होंने लिखा है, "इसका मतलब कि हम आतंकित करने वाली पुलिस उसके क़ब्ज़े, हिंसक अत्याचार और ट्रॉमा के ख़िलाफ़ हैं. हम नहीं चाहते कि इसके लिए हमारा पैसा ख़र्च हो. हम युद्ध, भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ हैं. हम इस नस्लभेद के ख़िलाफ़ हैं."

लोगों के इस रुख़ की वजह से अमेरिकी सेना की ओर से इसराइल को दी जा रही मदद के ख़िलाफ़ अब आवाज़ें उठने लगी हैं. कम से कम से इस चेतावनी की शुरुआत तो हो ही चुकी है कि अगर नेतन्याहू ने इसराइल के क़ब्ज़े वाले इलाक़े में अपना आक्रामक रुख़ नरम नहीं किया तो यह मदद बंद की जा सकती है.

'डी-फ़ंड द पुलिस' के साथ ही अब विदेश नीति में एक नया नारा जुड़ गया है- और वह है 'डी-फ़ंड द इसराइली मिलिट्री'.

डोनाल्ड ट्रंप और नेतन्याहू की जुगलबंदी

डेमोक्रेटिक पार्टी में इसराइल के पारंपरिक समर्थकों के लिए मामला पेचीदा होता जा रहा है क्योंकि यहूदी राज्य के प्रति अमेरिकी नीति का भी अब राष्ट्रीय राजनीति के हर मुद्दे की तरह पार्टी के आधार पर ध्रुवीकरण हो चुका है.

इस ध्रुवीकरण में काफ़ी हद तक इसराइल के लंबे समय तक पीएम रहे बिन्यामिन नेतन्याहू ने भी भूमिका निभाई है. उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में अमेरिकी दक्षिणपंथियों से मज़बूत संबंध बना लिए हैं.

ओबामा के दौर के डेमोक्रेट्स 2015 में अमरीकी संसद के संयुक्त सत्र को नहीं भूले होंगे जब रिपब्लिकन्स के निमंत्रण पर आए नेतन्याहू ने ईरान से परमाणु समझौते के लिए लिए संसद की मंज़ूरी को पटरी से उतारने की नाकाम कोशिश की थी.

इसके बाद, डोनाल्ड ट्रंप चार साल तक नेतन्याहू के साथ अपने नज़दीकी रिश्तों का ढिंढोरा पीटते रहे और इसराइल के राजनीतिक अधिकारों की दुहाई देते रहे. उन्होंने फ़लस्तीनी प्राधिकरण को दी जाने वाली मानवीय सहायता में कटौती कर दी और अमेरिकी दूतावास को तेल अवीव से हटा कर यरुशलम शिफ़्ट कर दिया.

मध्यपूर्व देशों से राजनयिक वार्ता में वह फ़लस्तीनियों को दरकिनार किए रहे.

ट्रंप और नेतन्याहू के इस तरह के एक-दो राजनीतिक पैंतरों ने कुछ मध्यमार्गी डेमोक्रेटिक नेताओं को फ़लस्तीनियों के हालात पर अपने विचारों पर दोबारा ग़ौर करने पर मजबूर किया.

जोग्बी कहते हैं कि डेमोक्रेटिक नेता फ़लस्तीनियों के बारे में अपना पुराना पारंपरिक नज़रिया बनाए रख सकते थे लेकिन उन्होंने देखा कि इसराइल हितों का समर्थन करके भी ट्रंप रिपब्लिकन उम्मीदवारों के पक्ष में यहूदियों के वोट नहीं खींच पाए.

जोग्बी कहते हैं, "यह डेमोक्रेटिक पार्टी के इन नेताओं की सही सोच हो सकती है क्योंकि अमेरिका के यहूदी मोटे तौर पर प्रगितशील नज़रिये वाली पार्टी के प्रति उदार रहे हैं."

अगर डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता अपने पारंपरिक यहूदी वोटरों को अलगाए बग़ैर अपने प्रगतिशील यहूदी आधार को संतुष्ट किए रहे तो यह उनके लिए ज़्यादा सुविधाजनक राजनीतिक क़दम साबित होगा.

पुरानी सोच के जो बाइडन

अगर इसराइल को लेकर अमेरिकी डेमोक्रेट्स के बीच बहस बदलती दिख रही है तो व्हाइट हाउस से जो संकेत मिल रहे हैं, उससे लगता है कि उस तरफ़ से बदलाव दिखना अभी शुरू ही हुआ है.

इसका सबूत यह है कि बाइडन और उनके आला अफ़सर इसराइल और हमास के बीच युद्धविराम की अपील करने में देर करते दिखे. यहां तक कि पारंपरिक तौर पर इसराइली समर्थक रहे सीनेट के नेता चक शुमर से भी वह इस मामले में पिछड़े साबित हुए.

बाइडन और उनके अफ़सरों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के उस प्रस्ताव को बार-बार रोका जिसमें युद्धविराम का समर्थन किया गया था.

नेतन्याहू के साथ बाइडन ने अपनी अपीलों में बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया कि इसराइल को आत्मरक्षा का अधिकार है. इसमें इसराइल की कार्रवाई की आलोचना का नाममात्र का भी संकेत नहीं था.

यहां तक कि इसराइल को दी जाने वाली अमेरिकी सैन्य सहायता के लिए शर्तें रखने पर भी कोई बात नहीं हो रही है. ताज़ा हिंसा के भड़कने से पहले बाइडन ने इसराइल को 73.5 करोड़ डॉलर ( 518 पाउंड) के हथियार बेचने की अनुमति भी दे दी थी. इससे डेमोक्रेटिक पार्टी के अंदर प्रगतिशील धड़े को गहरा धक्का लगा.

2020 के राष्ट्रपति चुनाव की प्राइमरी के दौरान बाइडन ने कहा था कि सैंडर्स इसराइल को मदद के लिए शर्तें लगाने की जो अपील कर रहे है, वह अजीब है.

हालांकि इस मामले पर बाइडन का जोखिम साफ़ दिखता है. राष्ट्रपति को अगर अपने विधायी एजेंडों को पारित कराना है तो उन्हें अपने गठबंधन में वामपंथी रुझानों के प्रगतिशील सांसदों के समर्थन की ज़रूरत पड़ेगी. इन विधायी एजेंडों में उनका महत्वाकांक्षी इन्फ्रास्ट्रक्चर और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा पैकेज भी शामिल है.

अभी तक तो जो समर्थन बाइडन को चाहिए वह मिल रहा है. लेकिन अगर डेमोक्रेटिक पार्टी में लेफ़्ट रुझान वाले सांसदों को लगा कि बाइडन इसराइल की ओर से मानवाधिकारों के सरासर उल्लंघनों से आंखें फेर रहे हैं तो वो उनका साथ छोड़ भी सकते हैं.

जोग्बी कहते हैं, "हमने फ़लस्तीनियों को मिल रहे समर्थन में लगातार बढ़त देखी है लेकिन अब से पहले इस मुद्दे ने कभी इतना ज़ोर नहीं पकड़ा था. यह बिल्कुल दिलोदिमाग़ पर छा जाने वाला मुद्दा बनता जा रहा है."

"डेमोक्रेट्स के बीच यह अपना रुख़ पक्का करने वाला मुद्दा बनता जा रहा है और इसकी दिशा अश्वेत और युवा वोटर तय कर रहे हैं. मोटे तौर पर यह नज़रिया प्रगतिशील लोग तय कर रहे हैं."

वो कहते हैं कि यह बदलाव देश की विदेश नीति को बदल सकता है, ख़ासकर मध्यपूर्व देशों के बारे में अमेरिकी नज़रिये को.

बाइडन की प्राथमिकता में इन देशों का मामला नीचे रहा है, लेकिन अब यह उनके लिए मुश्किल पैदा कर सकता है.

यही वजह है कि डेमोक्रेटिक पार्टी में इसराइल के समर्थक मानने लगे हैं कि बाइडन प्रशासन ने इस मामले में सही रुख़ नहीं अपनाया तो समस्या पैदा हो सकती है.

अगर बाइडन ने डेमोक्रिटिक पार्टी में वाम रुझान वाले सांसदों की तरह अपना नज़रिया नहीं बदला तो सार्वजनिक जीवन में बाइडन की वर्षों से बरक़रार लोकप्रियता को झटका लग सकता है.

राजनीतिक नेता परंपरा से चली आ रही नीतियों से अलग कोई नीति अपनाते हैं तो अपने राजनीतिक आधार को लंबे समय बरक़रार रखे बग़ैर यह संभव नहीं है.

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