यरुशलम हिंसा: इसराइल-फ़लस्तीन विवाद की जड़ और क्या है अल-नकबा

यरुशलम में हुई झड़पों में अब तक 200 से अधिक फ़लस्तीनी और 20 इसराइली पुलिसकर्मी घायल हो चुके हैं.

इसराइल और फ़लस्तीन के बीच दशकों से संघर्ष चलता चला आ रहा है और ताज़ा हिंसा महीनों से जारी तनाव का नतीजा है.

इसकी शुरुआत कैसे हुई?

यह 100 साल से भी पुराना मुद्दा है.

पहले विश्व युद्ध में उस्मानिया सल्तनत की हार के बाद मध्य-पूर्व में फ़लस्तीन के नाम से पहचाने जाने वाले हिस्से को ब्रिटेन ने अपने क़ब्ज़े में ले लिया था.

इस ज़मीन पर अल्पसंख्यक यहूदी और बहुसंख्यक अरब बसे हुए थे.

दोनों के बीच तनाव तब शुरू हुआ जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने ब्रिटेन को यहूदी लोगों के लिए फ़लस्तीन को एक 'राष्ट्रीय घर' के तौर पर स्थापित करने का काम सौंपा.

यहूदियों के लिए यह उनके पूर्वजों का घर है जबकि फ़लस्तीनी अरब भी इस पर दावा करते रहे हैं और इस क़दम का विरोध किया था.

1920 से 1940 के बीच यूरोप में उत्पीड़न और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान होलोकॉस्ट से बचकर भारी संख्या में यहूदी एक मातृभूमि की चाह में यहाँ पर पहुँचे थे.

इसी दौरान अरबों और यहूदियों और ब्रिटिश शासन के बीच हिंसा भी शुरू हुई.

1947 में संयुक्त राष्ट्र में फ़लस्तीन को यहूदियों और अरबों के अलग-अलग राष्ट्र में बाँटने को लेकर मतदान हुआ और यरुशलम को एक अंतरराष्ट्रीय शहर बनाया गया.

इस योजना को यहूदी नेताओं ने स्वीकार किया जबकि अरब पक्ष ने इसको ख़ारिज कर दिया और यह कभी लागू नहीं हो पाया.

इसराइल का निर्माण और 'तबाही'

1948 में समस्या सुलझाने में असफल होकर ब्रिटिश शासक चले गए और यहूदी नेताओं ने इसराइल राष्ट्र के निर्माण की घोषणा कर दी.

कई फ़लस्तीनियों ने इस पर आपत्ति जताई और युद्ध शुरू हो गया. अरब देशों के सुरक्षाबलों ने धावा बोल दिया.

लाखों फ़लस्तीनियों को अपने घरों से भागना पड़ा या उनको उनके घरों से ज़बरन निकाल दिया गया. इसको उन्होंने अल-नकबा या 'तबाही' कहा.

बाद के सालों में जब संघर्ष विराम लागू हुआ, तब तक इसराइल अधिकतर क्षेत्र को अपने नियंत्रण में ले चुका था.

जॉर्डन के क़ब्ज़े वाली ज़मीन को वेस्ट बैंक और मिस्र के क़ब्ज़े वाली जगह को गज़ा के नाम से जाना गया.

वहीं, यरुशलम को पश्चिम में इसराइली सुरक्षाबलों और पूर्व को जॉर्डन के सुरक्षाबलों के बीच बाँट दिया गया.

इसको लेकर कोई शांति समझौता नहीं था तो आने वाले दशकों में इस पर और युद्ध और लड़ाइयाँ लड़ी गईं.

जंगें जो इसराइल को बढ़त दिलाती चली गईं

1967 में अगला युद्ध लड़ा गया, जिसमें इसराइल ने पूर्वी यरुशलम और वेस्ट बैंक पर क़ब्ज़ा कर लिया. सिर्फ़ यही नहीं इसराइल ने सीरिया के गोलान हाइट्स, गज़ा और मिस्र के सिनाई प्रायद्वीप के अधिकतर हिस्सों पर भी क़ब्ज़ा जमा लिया.

अधिकतर फ़लस्तीनी शरणार्थी और उनके वंशज गज़ा और वेस्ट बैंक में रहते हैं और साथ ही साथ जॉर्डन, सीरिया और लेबनान में भी रहते हैं.

न ही उनको और न ही उनके वंशजों को इसराइल ने अपने घरों को वापस लौटने की अनुमति दी. इसराइल कहता है कि इससे उसका देश प्रभावित होगा और यहूदी राष्ट्र के अस्तित्व को ख़तरा होगा.

इसराइल का अभी भी वेस्ट बैंक पर क़ब्ज़ा है और गज़ा से वो पीछे हट चुका है. हालांकि, संयुक्त राष्ट्र अभी भी मानता है कि यह उसके क़ब्ज़े वाले क्षेत्र का हिस्सा है.

इसराइल दावा करता है कि पूरा यरुशलम उसकी राजधानी है जबकि फ़लस्तीनी पूर्वी यरुशलम को भविष्य के फ़लस्तीनी राष्ट्र की राजधानी मानते हैं. अमेरिका उन चंद देशों में से एक है जो पूरे शहर पर इसराइल के दावे को मानता है.

बीते 50 सालों में इसराइल ने इन इलाक़ों में कई बस्तियाँ बसा दी हैं जहाँ पर छह लाख से अधिक यहूदी रहते हैं.

फ़लस्तीनी कहते हैं कि ये यहूदी बस्तियाँ अंतरराष्ट्रीय क़ानून के अनुसार अवैध हैं और शांति में बाधा हैं जबकि इसराइल इस दावे को ख़ारिज करता है.

अभी क्या हो रहा है?

पूर्वी यरुशलम, गज़ा और वेस्ट बैंक में इसराइली और फ़लस्तीनियों के बची तनाव चरम पर है.

गज़ा पर इस समय हमास का नियंत्रण है और उसने इसराइल से कई बार लड़ाई लड़ी है. इसराइल और मिस्र गज़ा की सीमा का कड़ाई से नियंत्रण करते हैं ताकि हमास तक हथियार न पहुँचें.

गज़ा और वेस्ट बैंक में रहने वाले फ़लस्तीनियों का कहना है कि वे इसराइली कार्रवाइयों और पाबंदियों से पीड़ित हैं. वहीं, इसराइल कहता है कि वह फ़लस्तीनियों की हिंसा से ख़ुद को बचा रहा है.

इस साल मुसलमानों के पवित्र महीने रमज़ान में यानी अप्रैल के मध्य से परिस्थितियाँ तेज़ी से बदलनी शुरू हुईं और 7 मई जिस दिन रमज़ान महीने का आख़िरी शुक्रवार था, उस रात को पुलिस और फ़लस्तीनियों के बीच झड़पें हुईं.

पूर्वी यरुशलम से कुछ फ़लस्तीनी परिवारों के बेदख़ली की धमकी भी इस ग़ुस्से का कारण रही.

क्या हैं मुख्य समस्याएँ?

ऐसे कई मुद्दे हैं जिस पर इसराइली और फ़लस्तीनी कभी सहमत ही नहीं हो सकते हैं.

इनमें कई समस्याएँ हैं जैसे कि फ़लस्तीनी शरणार्थियों के साथ क्या होना चाहिए, क़ब्ज़े वाले वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों का क्या किया जाएगा, क्या वे हटाई जाएँगी या नहीं.

इसके अलावा यरुशलम को दोनों पक्ष कैसे बाँटेंगे और इसके साथ ही सबसे मुश्किल समस्या यह है कि क्या फ़लस्तीनी राष्ट्र इसराइल के साथ बनाया जाएगा या कहीं और. ऐसे कई सवाल हैं जिनका जवाब तलाश पाना बहुत मुश्किल है.

शांति वार्ता बीते 25 सालों से शुरू होती है और बंद हो जाती है लेकिन ये संघर्ष को नहीं सुलझा पाई है.

भविष्य कैसा होगा?

कम शब्दों में कहें यह स्थिति अभी किसी भी सूरत में हल नहीं होगी.

डोनाल्ड ट्रंप जब राष्ट्रपति थे तब अमेरिका ने एक शांति समझौता तैयार किया था और ट्रंप ने इसराइल प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के साथ इसे 'सदी का सौदा' बताया था.

हालांकि, फ़लस्तीनियों ने इसे एकतरफ़ा कहकर ख़ारिज कर दिया था और यह कभी ज़मीन पर नहीं उतर पाया.

भविष्य में किसी भी शांति समझौते के लिए दोनों पक्षों को कई जटिल मुद्दों पर सहमत होना होगा.

वरना तब तक यह टकराव यूं ही जारी रहेगा.

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