इस्लामिक स्टेट की ताक़त का क्या नया केंद्र है अफ़्रीका?-दुनिया जहान

    • Author, टीम बीबीसी हिन्दी
    • पदनाम, नई दिल्ली

अफ़्रीकी देश मोज़ाम्बिक के एक शहर पर बीते महीने चरमपंथी हमला हुआ. 

इस हमले में दस से ज़्यादा लोगों की मौत हुई. इनमें से कुछ की मौत गोली लगने से हुई तो कुछ के सिर बेरहमी के साथ क़लम कर दिए गए थे. 

दोपहर बाद सैंकड़ों हथियारबंद लोग आंधी- तूफ़ान की तरह तीन दिशा से शहर में दाख़िल हुए. उन्होंने शहर की तरफ़ आने वाले तमाम रास्ते रोक दिए और मोबाइल नेटवर्क को नाकाम कर दिया. हमलावरों ने होटल, बैंक, हॉस्पिटल और दूसरी अहम इमारतों को निशाना बनाया.

हमले का शिकार हुए पल्मा शहर से आई़ तस्वीरों में सड़क और समंदर किनारे घायल लोग गिरे पड़े थे. कई लाशें बिछी हुई थीं. क़रीब हफ़्ते भर बाद ख़बर आई कि सुरक्षाबलों ने शहर पर दोबारा नियंत्रण हासिल कर लिया है. हमले के कुछ दिन बाद इस्लामिक स्टेट समूह ने इसकी ज़िम्मेदारी ली. 

अफ़्रीका में बढ़ता असर

किसी वक़्त मध्य पूर्व में केंद्रित रहे इस संगठन ने हाल फ़िलहाल अफ़्रीका के कई देशों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है और अब पूछा जा रहा है कि क्या अफ़्रीका इस्लामिक स्टेट के लिए ताक़त का नया केंद्र बन रहा है? 

इस सवाल पर बेलफ़ास्ट की क्वीन्स यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ शिक्षाविद एरिक जीनू कहते हैं, "फ़िक्र की बात ये है कि बहुत छोटे से समूह से शुरुआत करके वो काफ़ी फलफूल गए हैं. पहले वो रात के समय गांवों पर हमला करते थे और ज़्यादातर छुरियों से वार करते थे. अब वो ज़िला मुख्यालयों को निशाना बनाते हैं. अब उनके पास अत्याधुनिक हथियार हैं."

एरिक जीनू ने मोज़ाम्बिक के राजनीतिक और मज़हबी संघर्ष से जुड़े इतिहास का क़रीब 25 साल तक अध्ययन किया है. वो बताते हैं कि इस देश के उत्तरी हिस्से में बीते कुछ सालों से चरमपंथी सक्रिय हैं.

बदली रणनीति

एरिक जीनू बताते हैं, "चरमपंथियों ने अक्टूबर 2017 में अपनी गतिविधियां शुरू कीं. इस मामले में जो रिसर्च हुई है, उससे संकेत मिलते हैं कि उन्होंने उत्तरी मोज़ाम्बिक के काबो डेलगाडो प्रांत में मज़हबी फ़िरक़ों के ज़रिए अपना विस्तार किया. उन्होंने अपनी मस्जिदें और स्कूल बनाए. इसके बाद उन्होंने लोगों के दिमाग में कट्टर विचार भरना शुरू किया. फिर धर्मनिरपेक्ष राज्य को ख़त्म करने और उसकी जगह इस्लामी क़ानून से चलने वाली 'ख़िलाफ़त' स्थापित करने की कोशिश शुरू की गई."

एरिक बताते हैं कि साल 2019 में उन्होंने इस्लामिक स्टेट में आस्था जताई और तभी से उनकी रणनीति बदली हुई दिखती है. 

वो बताते हैं, "एक तरफ़ वो आतंक की घटनाओं के जरिए आम नागरिकों, सेना और पुलिस को डराकर उनका मनोबल तोड़ने की कोशिश में हैं, वहीं दूसरी तरफ वो चुनिंदा ठिकानों को निशाना बना रहे हैं. जैसा अभी पल्मा में देखा गया. उनके निशाने पर सरकारी अधिकारी या फिर ऐसे मुसलमान हो सकते हैं जो उनकी नज़र में कुरान के मुताबिक़ बर्ताव नहीं कर रहे हैं. वो पुरुषों की जान लेते हैं. महिलाओं और बच्चों को बंधक बना लेते हैं. अपने ठिकानों पर वो महिलाओं को बीवी, रसोइये या फिर नौकर की भूमिका देते हैं और बच्चों सशस्त्र ट्रेनिंग दी जाती है."

एरिक कहते हैं कि पल्मा में हुए हमले के बाद मोज़ाम्बिक की सरकार अचंभे की स्थिति में थी. सरकार ने अपनी तमाम ताक़त शहर से क़रीब दस किलोमीटर दूर स्थित गैस परियोजना की हिफ़ाज़त में लगाई हुई थी. ये 20 अरब डॉलर क़ीमत वाली परियोजना है. इसकी कमान फ्रांस की ऊर्जा कंपनी 'टोटल' के हाथ थी. ये अफ्रीका में निजी निवेश के लिहाज़ से सबसे बड़ी परियोजना है. यहां काम शुरू होने के बाद से ही हमले शुरू हो गए. इसके बाद कंपनी ने काम रोक दिया. वहां से अपने स्टाफ़ और विदेशी ठेकदारों को बाहर निकला. हालिया हमले के कुछ दिन पहले ही कंपनी ने काम दोबारा शुरू करने की योजना साझा की थी.

एरिक जीनू के मुताबिक़, "टोटल ने सरकार से सुरक्षा मुहैया कराने की माँग की थी. कंस्ट्रक्शन साइट की हिफ़ाज़त के लिए सरकार ने वहां आठ सौ से ज़्यादा सैनिकों को तैनात किया था. जब शहर पर हमला हुआ तो सैनिकों को वहां से हटने की इजाज़त नहीं मिली. ऐसे में कुछ दिन तक शहर की रक्षा के लिए कोई भी नहीं था."

लाखों ने किया पलायन

वो बताते हैं कि मोज़ाम्बिक में बीते क़रीब चार साल के दौरान ढाई हज़ार से ज़्यादा लोगों की जान जा चुकी है. मोज़ाम्बिक में कुल 11 प्रांत हैं. एरिक का कहना है कि ये घटनाएं उत्तर पूर्व के एक प्रांत के छोटे से हिस्से में हो रही हैं. हालांकि इसका असर दूसरी जगहों पर भी महसूस होता है. डरे हुए लोग यहां से दूसरे प्रांतों का रुख़ कर रहे हैं. पलायन करने वालों की संख्या क़रीब सात लाख बताई जा रही है. 

पहले से मौजूद संगठन का इस्लामिक स्टेट के साथ जुड़ना और संगठित हमले करना, क्या ये घटनाक्रम इस इलाक़े में चरमपंथ के लिहाज़ से टर्निंग प्वाइंट साबित हो सकता है? इस सवाल पर एरिक कहते हैं कि कई एक्सपर्ट मानते हैं कि इस्लामिक स्टेट की ताक़त का केंद्र अफ्रीका में स्थापित होता दिख रहा है.

सेनेगल के रिसर्च इंस्टीट्यूट फ़ॉर सिक्यूरिटी स्टडीज़ के शोधकर्ता डॉक्टर अकिनोला ओलोजो कहते हैं, "इस्लामिक स्टेट मध्य पूर्व से निकलकर अफ़्रीका तक फैल गया है. संगठन के तौर पर उनके असर और उनके हमलों को लेकर चिंता की स्थिति बन गई है."

'ब्रांड का असर'

ओलोजो कहते हैं कि अफ़्रीका में सक्रियता इस्लामिक स्टेट का एक रणनीतिक क़दम भी हो सकता है. या फिर ये सीरिया और इराक़ में लगे झटके का असर भी हो सकता है. एक वक़्त इराक़ और सीरिया में बड़ा इलाक़ा इस्लामिक स्टेट के नियंत्रण में था. वहां इस्लामिक स्टेट की मौजूदगी अब भी है लेकिन असर पहले की तरह नहीं है. डॉक्टर ओलोजो कहते हैं कि इराक़ और सीरिया में चौतरफ़ा हमले झेलने के बाद उन्होंने किसी एक इलाक़े पर नियंत्रण नहीं किया बल्कि बाहर निकलकर फैल गए.

अफ्रीका में बीते कई दशक से इस्लामी चरमपंथी समूह सक्रिय हैं. 1998 में कीनिया और तंज़ानिया में अमेरिकी दूतावास पर हुए बम हमले में अल-क़ायदा का हाथ था. नाइजीरिया में बोको हराम और सोमालिया में अल-शबाब सक्रिय हैं. उधर, इस्लामिक स्टेट ने अफ्रीका के बिखरे धड़ों को जोड़ने का काम किया है. यहां तौर तरीक़ा भी अलग दिखता है. 

अकिनोला ओलोजो कहते हैं, "यहां ताक़त का एक केंद्र नहीं है. अगर आप उनके हमलों पर ध्यान दें तो पाएंगे कि वो कई बार गुरिल्ला हमले करते हैं. कई बार हिट एंड रन का पैटर्न दिखता है. इस्लामिक स्टेट के पास सेंट्रल कमांड होती थी और कमांडर होते थे, ये उससे अलग स्थिति है.अफ्रीकी देशों में संगठन का ढांचा बिखरा हुआ सा है. यहां छोटे समूह हमले करते हैं और फिर ख़ुद को इस्लामिक स्टेट के ग्लोबल ब्रांड से जोड़ लेते हैं."

'मौक़ा भुनाते चरमपंथी संगठन'

ग्लोबल टेररिज़्म इनडेक्स के हालिया आंकड़ों पर नज़र डालें तो वहां आप अफ़ग़ानिस्तान और सीरिया के साथ अफ़्रीका के माली, बुर्किना फासो और मोज़ाम्बिक का नाम भी देखेंगे. ये वो देश हैं जहां लगातार और बहुत ज़ोरदार हमले हुए हैं. डॉक्टर ओलोजो कहते हैं कि ये संगठन मौके फ़ायदा उठाना भी जानते हैं.

वो कहते हैं, "बीते साल अल शबाब ने सोमालिया के दक्षिणी शहर जिलिब में कोविड-19 केंद्र शुरू किया. ऐसी भी रिपोर्ट आईं कि अल-शबाब ने कोरोना वायरस की रोकथाम और इलाज के लिए कमेटी भी बनाई हुई है. इससे हमें पता चलता है कि ये समूह जानते हैं कि उनके आसपास और दुनिया में चल क्या रहा है. दूसरी बात ये है कि ये समूह घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया भी दे रहे हैं. तीसरी बात ये है कि उनका ध्यान समाज पर है. सरकार की ओर से गर्वनेंन्स या फिर सामाजिक आर्थिक लिहाज़ से उन्हें जहां भी दरारें दिखती हैं, वो उसे भरने की कोशिश करते हैं. भले ही वो अब भी उन्हीं लोगों को निशाना बना रहे हों और उन पर हमले कर रहे हों."

डॉक्टर ओलोजो ये भी कहते हैं कि अफ्रीका में इन चरमपंथी समूहों पर रोक लगाने के प्रयास भी लगातार जारी हैं. 

वो बताते हैं, "साल 2020 की शुरुआत में कीनिया और अमेरिका के बीच साझेदारी बनी. दोनों ने ज्वाइंट टेररिज़्म टास्क फ़ोर्स बनाया. हम जितना चाहते हैं, ये समस्या भले ही उस तेज़ी से विदा नहीं हो रही हों लेकिन हममें से ज़्यादातर लोग मानेंगे कि चुनौतियां बड़ी हैं इसीलिए समाधान में वक़्त लग रहा है."

फ़ायदा लेने की कोशिश

अफ़्रीका में इस्लामिक स्टेट के विस्तार के सवाल पर 'वेरिस्क मैपेलक्राफ्ट' एजेंसी में अफ़्रीका मामले के वरिष्ठ विश्लेषक अलेक्ज़ेंडर रेमेकर्स कहते हैं, "ये साफ़ है कि इस्लामिक स्टेट इराक़ और सीरिया में केंद्रित समूह के तौर पर अफ़्रीकी चरमपंथी गुटों की दिलचस्पी की वजह बना रहा."

वो बताते हैं, "अफ़्रीका में इस्लामिक स्टेट के चार प्रमुख गुट है. इनमें से पहला है इस्लामिक स्टेट इन ग्रेटर सहारा. ये प्रमुख तौर पर माली, नाइजीरिया और बुर्किना फ़ासो में गतिविधियां चलाता है. दूसरा है इस्लामिक स्टेट इन वेस्ट अफ़्रीका प्रोविन्स. ये चाड बेसिन में सक्रिय हैं. दो और गुट हैं. इनमें से एक डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो के करीब सक्रिय है तो आखिरी गुट मोज़ाम्बिक में सक्रिय है. हर गुट की क्षमता अलग है. इनमें बस एक ही बात मिलती है कि इन्होंने अलग-अलग वक़्त पर इस्लामिक स्टेट के प्रति निष्ठा ज़ाहिर की है."

अलेक्जेंडर कहते हैं कि जब अफ़्रीका में इस्लामिक स्टेट के नया धरातल तलाशने की बात होती है तो एक अहम तथ्य को नज़र अंदाज़ कर दिया जाता है.

अलेक्ज़ेंडर कहते हैं, "अफ़्रीका में ज़्यादातर समूह ऐसे हैं जिन्हें इस्लामिक स्टेट ने खड़ा नहीं किया. ये स्थानीय स्तर पर पैदा हुए. ये इस्लामिक स्टेट के अस्तित्व में आने के पहले भी थे. इन्होंने इस्लामिक स्टेट के प्रति आस्था ज़ाहिर की और इस्लामिक स्टेट ने इनका इस्तेमाल ये बताने के लिए किया कि उसका अस्तित्व क़ायम है और वो एक प्रभावी चरमपंथी समूह है."

वो कहते हैं कि पहले से मौजूद रहे चरमपंथी समूहों को अपना नाम इस्तेमाल करने की इजाज़त देने से शायद एक फ़र्ज़ी माहौल बनाने में मदद मिलती है कि ये संगठन ख़ुद ही फल फूल रहा है. लेकिन हक़ीक़त ये भी है कि इन समूहों को लेकर डर बढ़ रहा है.

चिंतित हैं कई देश

अलेक्ज़ेंडर कहते हैं, "आइवरी कोस्ट और बुर्कीना फ़ासो में हमले हुए हैं. सेनेगल का कहना है कि वो इन समूहों की बढ़ती ताक़त को लेकर चिंतित है. मोज़ाम्बिक में भी चिंता दिखती है. ये साफ़ है कि हर किसी को इन समूहों से सुरक्षा को लेकर ख़तरा नज़र आता है."

इराक़ और सीरिया में ज़मीन गंवाने के बाद से इस्लामिक स्टेट ने मध्य पूर्व के बाहर ख़ुद को स्थापित करने की कोशिश की है. अलेक्जेंडर कहते हैं कि अब इसका ध्यान अफ्रीका पर है. उनकी राय में अफ़्रीका में ऐसे इलाक़े हैं जहां ये विस्तार कर सकता है. हालांकि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी इसे अफ़्रीका में मज़बूत होते नहीं देखना चाहती. 

उधर, मौजूदा स्थिति को लेकर वाशिंगटन के सेंटर फ़ॉर स्ट्रैटीजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज की सीनियर एसोसिएट एमीलिया कोलंबो कहती हैं, "ऐसा लगता है कि फ़िलहाल इस्लामिक स्टेट के प्रवक्ताओं की दिलचस्पी किसी भी हमले की ज़िम्मेदारी लेने में है. वो अपने संगठन से ज़्यादा हमलों के बारे में बात कर रहे हैं."

एमीलिया का कहना है कि अफ़्रीका के स्थानीय संगठनों के जुड़ने से इस्लामिक स्टेट ख़ुद के ताक़तवर होने की छवि पेश कर रहा है. इससे अफ़्रीका के अंदर उसे नए लड़ाके हासिल होने में मदद मिलती है. 

एमीलिया बताती हैं, "साल 2017 में संयुक्त राष्ट्र ने अफ़्रीका के उन लोगों पर एक अध्ययन कराया जो चरमपंथी रहे थे. उनसे पूछा गया कि वो चरमपंथी गुट में क्यों शामिल हुए? उनमें से 71 फ़ीसद लोगों ने बताया कि उनके चरमपंथी बनने के पीछे उनके किसी प्रियजन के ख़िलाफ़ सरकार की कोई न कोई कार्रवाई थी. चाहे वो कोई ज़ुल्म हो या फिर उनके साथ हुआ कोई हादसा. हमने भी इस संघर्ष के दौरान कई ऐसी रिपोर्ट देखी हैं जहां सरकार या फिर सुरक्षा बलों पर आम लोगों को प्रताड़ित करने का आरोप था." 

चरमपंथी संगठनों को इस्लामिक स्टेट के साथ जुड़कर क्या मिल जाता है? इस सवाल पर एमीलिया कहती हैं कि जब कोई संगठन इस्लामिक स्टेट के प्रति आस्था ज़ाहिर करता है उसके बाद उसका प्रोपगैंडा यानी प्रचार तेज़ हो जाता है. वो साल 2020 में जारी एक वीडियो का ज़िक्र करती हैं. 

एमीलिया बताती हैं, "उस वीडियो में इस्लामिक स्टेट का काला झंडा लहराता नज़र आ रहा था. वीडियो में सरकार को लेकर सवाल उठाए गए थे. ग़रीबों ख़ासकर ग़रीब मुसलमानों के साथ बुरे सलूक की बात की गई थी. वीडियो में शरिया क़ानून लागू करने की भी बात की गई थी. पहले ये संगठन कभी वीडियो पोस्ट नहीं करता था लेकिन बीते साल प्रोपगैंडा की शुरुआत करते हुए उन्होंने दो वीडियो पोस्ट किए."

समर्थकों को संदेश

इस्लामिक स्टेट सैन्य रणनीति और ट्रेनिंग से लेकर तमाम दूसरी जानकारी ऑनलाइन मुहैया कराता है. एमीलिया बताती हैं कि वो वीडियो के ज़रिए निर्देश देते हैं. फंड और हथियारों की सीधी मदद कम देखने को मिलती है लेकिन विचारधारा, ट्रेनिंग और प्रचार को लेकर ज़्यादा मदद की जाती है.

लेकिन ऐसे संगठनों को सबसे ज़्यादा लुभाता है इस्लामिक स्टेट का नाम. एमीलिया कहती हैं कि इस्लामिक स्टेट के साथ जुड़कर कोई भी संगठन चर्चा में आ जाता है.

लेकिन सवाल ये है कि इस रिश्ते में किसे किसकी ज़रूरत ज़्यादा है? 

एमीलिया बताती हैं, "मेरी राय में इसलामिक स्टेट को इसका ज़्यादा फ़ायदा मिलता है. इससे ऐसा लगता है कि उनका दायरा बढ़ रहा है. अब वो दक्षिण पूर्व अफ़्रीका तक पहुँच गए हैं. इससे उनकी ताक़त में इज़ाफ़ा होता दिखता है."

ये साफ़ है कि मध्य पूर्व पर पकड़ कमज़ोर होने के बाद से इस्लामिक स्टेट ताक़त का दूसरा गढ़ तलाश रहा है. इस्लामिक स्टेट के लिए अपने समर्थकों के बीच ऐसी छवि बनाए रखना भी ज़रूरी है कि उसकी ताक़त पहले की तरह बुलंद है. 

अफ़्रीका के कुछ देशों में बेतहाशा ग़रीबी और हिंसा की वजह से यहां अवसरवादी समूहों के फलने-फूलने की काफी संभावनाएं हैं.

फ़िलहाल स्थानीय समूहों का इस्लामिक स्टेट से जुड़ने का फ़ैसला काम करता दिखता है.

लेकिन आने वाले सालों में अगर ये संगठन अपनी किसी भी हिंसक गतिविधि की ज़िम्मेदारी ख़ुद लेते हैं तो स्थिति कुछ अलग हो सकती है.

इस्लामिक स्टेट के साथ उनका नाता आसानी से टूट भी सकता है. हमारे विशेषज्ञों की राय है कि ऐसा कुछ होने तक इस्लामिक स्टेट मौजूदा स्थिति का फ़ायदा लेता रहेगा. 

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