वीगर मुसलमानों के मुद्दे पर चीन ने ब्रिटेन के 5 सांसदों पर लगाया बैन

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चीन ने ब्रिटेन के 5 सांसदों समेत 9 लोगों पर देश के बारे में 'झूठ और ग़लत जानकारियां' फैलाने के लिए प्रतिबंध लगा दिया है.
ये वो समूह है जो चीन की लगातार आलोचना करता रहता है.
वीगर मुसलमानों के कथित मानवाधिकार हनन को लेकर ब्रिटेन की तरफ़ से उठाए गए क़दमों के विरोध में चीन ने ये प्रतिबंध लगाए.
ब्रिटेन के विदेश सचिव ने कहा कि अगर चीन "दावों को ख़ारिज करना" चाहता है तो उसे संयुक्त राष्ट्र को शिंज़ियाग में जाने की इजाज़त देनी होगी. प्रतिबंधित लोगों की लिस्ट में पूर्व कन्सर्वेटिव नेता सर डंकन स्मिथ, एक वकील और एक शोधकर्ता शामिल हैं.

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'प्रतिबंध गर्व की तरह'
सर इयान ने कहा वो इस प्रतिंबध को "गर्व की तरह" लेकर चलेंगे. यूरोपीय संघ ने भी चीन के खिलाफ़ कदम उठाते हुए ऐसे ही प्रतिबंध लगाए थे. इससे साथ ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा ने भी कदम उठाए.
चीन ने शिनज़ियांग प्रांत में कई वीगर मुसलमानों को बंद कर रखा है. आरोप है कि उन पर यौन शोषण सहित कई अत्याचार किए जा रहे हैं. हालांकि चीन ने अत्याचार के आरोपों से इनकार किया है और वो कैंपों को "पुन: शिक्षा" फ़ैसिलिटी बता रहा है..
जिन लोगों पर प्रतिबंध लगा है, वो सभी चीन, हॉन्ग कॉन्ग और मकाऊ नहीं जा पाएंगे. चीन में उनकी संपत्ति सील कर दी जाएगी और चीनी संस्थाएं और कंपनियां उनके साथ किसी तरह का व्यापार नहीं कर पाएंगी.
शोधकर्ता डॉ स्मिथ फिनलें, जिन पर बैन लगाया गया है, उन्होंने ट्वीट किया, "मुझे आवाज़ उठाने का कोई अफ़सोस नहीं है, मुझे चुप नहीं कराया जा सकता."
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सच की पड़ताल करने दे चीन: ब्रिटेन
ब्रिटेन के विदेश सचिव डौमिनिक रैब ने कहा, "जब ब्रिटेन दुनिया के दूसरे देशों के साथ मिलकर मानवाधिकार उल्लघंन के कारण प्रतिबंध लगा रहा है, तो चीन अपने आलोचकों पर प्रतिबंध लगा रहा है."
"अगर चीन इन आरोपों को ख़ारिज करना चाहता है तो उसे यूएन हाई कमिश्नर फ़ॉर ह्यूमन राइट्स को सच की पड़ताल करने देना चाहिए."

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चीनी विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि ब्रिटेन का प्रतिबंध लगाने का फ़ैसला, "अंतरराष्ट्रीय कानूनों और अंतरराष्ट्रीय रिश्तों के बुनियादी नियमों के ख़िलाफ़ है. ये चीन के आंतरिक मामलों में दख़ल देना है और चीन-ब्रिटेन के रिश्तों की अहमियत को कम करना है."
उन्होंने कहा कि चीनी विदेश मंत्रालय ने ब्रिटेन के राजदूत को "पक्ष रखने, शिकायत दर्ज करने और कड़ी निंदा करने के लिए" समन किया है.
बीबीसी के राजनयिक संवाददाता जेम्स लैंडेल के मुताबिक चीनी सरकार से इस कदम की उम्मीद नहीं थी.
जिस समय से ब्रिटेन ने प्रतिबंध लगाए थे, उसी समय से चीन के जवाब का इंतज़ार था, लेकिन एक जवाबी कार्रवाई की ज़रूरत नहीं थी. उन्होंने कहा इससे दोनों देशों के बीच पहले से ख़राब रिश्ते और ख़राब होंगे.

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यूरोपीय संघ के खिलाफ़ भी कार्रवाई
इससे पहले चीन ने यूरोपीय संघ के 10 यूरोपीय लोगों और चार संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाया था.
चीन के प्रमुख मीडिया संस्थानों जैसे शिन्हुआ न्यूज़ एजेंसी और अख़बार ग्लोबल टाइम्स और सरकारी रेफ़रेंस न्यूज़ ने 22 मार्च को विदेश मंत्रालय के बयान को प्राथमिकता दी, जिसमें उन्होंने कहा था कि यूरोपियन ब्लॉक ने, "चीन की संप्रभुता और हित को झूठ और ग़लत जानकारियाँ फैला कर नुक़सान पहुँचाया है."

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कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र पीपल्स डेली ने 23 मार्च को लिखा, "इस बयान ने यूरोपीय संघ को अपनी ग़लती का अहसास कराया है और उसे सही करने के लिए क़दम उठाने को मजबूर किया है. वो दूसरों को मानवाधिकार के बारे में लेक्चर देना और उनके अंदरूनी मामलों में दख़लअंदाज़ी बंद करें."
द पेपर नाम की सरकार समर्थित वेबसाइट ने 22 तारीख़ को लिखा, "यह कहा जा रहा है कि यूरोपीय पक्ष की तरफ़ से तथ्यों को नज़रअंदाज़ किया गया और खुलकर अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का उल्लंघन किया गया, जिससे चीन और यूरोपीय संघ के रिश्ते ख़राब हुए."
जिन पर प्रतिबंध लगाए गए हैं, उनमें यूरोपीय संसद के लोग, शोधकर्ता और यूरोपीय संसद की मानवाधिकार की सब कमेटी के लोग शामिल हैं.
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