इमरान ख़ान और पाकिस्तानी सेना प्रमुख बाजवा भारत से दोस्ती की तरफ़दारी क्यों कर रहे हैं?

बाजवा

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    • Author, रियाज़ सुहैल
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू सर्विस कराची

पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा ने कहा है, कि भारत और पाकिस्तान के मज़बूत रिश्ते वो चाबी है, जिससे पूर्वी और पश्चिमी एशिया के बीच कनेक्टिविटी सुनिश्चित करते हुए दक्षिण और मध्य एशिया की क्षमताओं को अनलॉक किया जा सकता है.

उन्होंने कहा, हालांकि, यह अवसर दो परमाणु क्षमता से संपन्न देशों के बीच विवादों के कारण बंधक बना हुआ है. कश्मीर विवाद स्पष्ट रूप से इस मुद्दे का मुख्य केंद्र है.

देश की राजधानी इस्लामाबाद में पहली इस्लामाबाद सुरक्षा वार्ता को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि ''जब तक कश्मीर मुद्दा हल नहीं हो जाता तब तक उपमहाद्वीप में शांति का सपना पूरा नहीं होगा. अब अतीत को भुला कर आगे बढ़ने का समय आ गया है."

उन्होंने स्पष्ट किया है, कि सार्थक बातचीत से पहले, हमारे पड़ोसी देश को परिस्थितियों को अनुकूल बनाना होगा, ख़ासतौर से भारतीय प्रशासित कश्मीर में.

पाकिस्तान की तरफ़ से हाल ही में सीमा पर युद्ध विराम समझौता किया गया है. जिसके बाद सेना प्रमुख जनरल जावेद बाजवा की भारत से बातचीत की पेशकश सामने आई है.

पाकिस्तान के पूर्व केंद्रीय मंत्री मोइनुद्दीन हैदर ने कहा है, कि सेनाध्यक्ष से पहले, प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने भी कहा था कि चल रहे तनाव को कम किया जाना चाहिए ताकि शांति के कुछ पल मिल सकें.

बाजवा, इमरान खान

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'इस पहल का फ़ायदा उठाते हुए बातचीत करना चाहिए'

उन्होंने कहा कि 'भारत एक बड़ा देश है और इस प्रस्ताव पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देना उसकी ज़िम्मेदारी है. कश्मीर एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिसके कारण स्थिति बिगड़ जाती है. इससे पहले भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार से इस पर बात हुई थी. कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार ने भी इस सिलसिले को जारी रखा था. यह एक सच्ची पेशकश है कि पाकिस्तान युद्ध के पक्ष में नहीं है, वह बातचीत चाहता है.'

"कुछ राजनेताओं की तरफ से यह कहा जाता है, कि सेना बातचीत के पक्ष में नहीं है. सेना चाहती है कि द्विपक्षीय व्यापार हो, सीमा खुले, लोगों का लोगों से संपर्क हो, लेकिन असल समस्या कश्मीर को न भूलें."

"जो समझौता एक्सप्रेस है, मैत्री बस सेवा है, इसे तो बहाल किया जाए, द्विपक्षीय व्यापार शुरू किया जाए. कहीं से तो शुरुआत की जाए, फिर चाहे सचिव स्तर पर बातचीत हो, मंत्री स्तर पर हो या शीर्ष स्तर पर."

मोदी-इमरान ख़ान

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वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक ज़ाहिद हुसैन का कहना है, ''सेना प्रमुख ने सकारात्मक रुख़ अपनाया है और कहा है कि आर्थिक विकास महत्वपूर्ण है. इस क्षेत्र में शांति होनी चाहिए. जिससे पता चलता है, कि एक दिशा निर्धारित की जा रही है, तनाव बढ़ाने के बजाये, इसे कम किया जाये और क्षेत्र मे आर्थिक विकास हो, यह एक सकारात्मक दृष्टिकोण है.''

"इससे पहले, हमने संघर्ष विराम देखा, जिससे उम्मीद जगी कि क्षेत्र में तनाव कम हो रहा है. उससे पहले, स्थिति अलग थी. सोच में बदलाव आया है. सेना प्रमुख ने भी इसी बात का इज़हार किया है."

राजनीतिक और सामाजिक अनुसंधान संस्थान, पाकिस्तान इंस्टिट्यूट ऑफ़ लेजिस्लेटिव डेवलपमेंट एंड ट्रांसपेरेंसी (पीआईएलडीएटी) के प्रमुख अहमद बिलाल महबूब का कहना है, कि सेना प्रमुख के भाषण के लिए "लक्षित दर्शक" भारत था. इससे पहले भी वह इस तरह का बयान दे चुके हैं, कि शान्ति के लिए काम करना चाहते हैं. इसके बाद दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम समझौता हुआ. इसमें निश्चित रूप से कुछ मित्र देश शामिल होंगे.

"ये युद्धविराम का जो माहौल बना हुआ है वह इसका फायदा उठाते हुए बातचीत करना चाहते हैं. सरकार और सेना चाहती है, कि इसकी शुरुआत वहीं से हो, जहां से इस सब (तनाव) की शुरुआत हुई थी. शायद वे कारगिल के बारे में कह रहे हैं, कि हम अतीत को भूल जाएं और आगे बढ़ें."

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'देशों के बीच शांति ना होना इलाके के विकास में बाधा'

पत्रकार और विश्लेषक मोहमल सरफराज़ का कहना है, कि सेना प्रमुख कह चुके हैं, कि वह किसी दबाव में शांति की बात नहीं कर रहे हैं. वास्तव में, पाकिस्तान कई वर्षों से शांति स्थापित करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन मोदी सरकार इसमें रुकावट बनी हुई है जो एक दक्षिणपंथी मुस्लिम विरोधी सरकार है.

"क्षेत्र के विकास में भारत और पाकिस्तान के बीच शांति न होना सबसे बड़ी बाधा है. यही कारण है, कि क्षेत्रीय देशों का संगठन सार्क, यूरोपीय संघ की तरह सफल नहीं हो सका है."

मोहमल सरफराज़ के अनुसार, 'पिछली सरकारें भी शांति की ही बात करती रही हैं. उसके बाद पुलवामा हमला हो गया, इस परिस्थिति में भी भारतीय पायलट अभिनंदन को बिना शर्त सद्भावना के तौर पर रिहा कर दिया गया था. इसी अवधि के दौरान, पाकिस्तान-करतारपुर कॉरिडोर खोला गया था. पाकिस्तान तो शांति और बातचीत चाहता है. अब जबकि सेना प्रमुख और सरकार एक साथ खड़े हैं, यह दोनों देशों के लिए एक अच्छा अवसर है.'

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रक्षा विश्लेषक डॉक्टर आयशा सिद्दीक़ा का कहना है, कि सेना प्रमुख की पेशकश के पीछे आर्थिक कारक है. उन्होंने आगे कहा, कि अगर शांति बहाली की प्रक्रिया शुरू नहीं होती है और स्थिरता बहाल नहीं हुई, तो हम सड़क पर आ जायेंगे.

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने इंडो पैसिफिक रणनीति को गंभीरता से नहीं लिया. अमेरिका का पेपर प्रकाशित भी हो गया, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई. इस योजना में नेपाल, श्रीलंका, भूटान और भारत शामिल हैं, हमारा कोई उल्लेख नहीं है. जबकि पाकिस्तान चीन के पक्ष में है, जिससे हमें पहले भी फायदा नहीं हुआ है.

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