मोज़ाम्बिक: एक ऐसा देश, जहाँ बच्चों के सर क़लम किए जा रहे हैं

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एक शीर्ष सहायता एजेंसी ने कहा है कि अफ़्रीकी देश मोज़ाम्बिक में बच्चों के सर क़लम किए जा रहे हैं. एजेंसी का कहना है कि ऐसा मोज़ाम्बिक के काबो डेलगाडो प्रांत में हो रहा है.
ये भी कहा जा रहा है कि कई बार तो 11 साल तक के बच्चों के सर क़लम किए जा रहे हैं.
गैर सरकारी संगठन 'सेव द चिल्ड्रेन' को एक माँ ने बताया कि कैसे उन्होंने अपने 12 साल के बच्चे का सर क़लम होते देखा. ऐसा जब हो रहा था वे पास में ही अपने अन्य बच्चों के साथ छिपी हुई थी.
मोज़ाम्बिक में 2017 से शुरू हुए विद्रोह में अभी तक 2500 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं और क़रीब सात लाख लोगों को पलायन करना पड़ा है.
इस्लामिक स्टेट से जुड़े चरमपंथी काबो डेलगाडो की हिंसा के पीछे हैं.
अपनी रिपोर्ट में 'सेव द चिल्ड्रेन' ने ये नहीं बताया है कि इन हमलों के पीछे कौन है, लेकिन इसका कहना है कि वहाँ से पलायन करके आए लोगों ने ऐसी नृशंस घटनाओं का ज़िक्र किया है. तंज़ानिया की सीमा से लगा काबो डेलगाडो प्रांत में गैस के भंडार हैं.
लोगों ने क्या बताया

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एक माँ ने सेव द चिल्ड्रेन को बताया है कि उनके बेटे का उनके सामने सर क़लम कर दिया गया. इस महिला की पहचान सुरक्षा कारणों से छिपाई गई है.
उन्होंने बताया, "उस रात हमारे गाँव पर हमला हुआ था और हमारे घर जला दिए गए थे. जब ये सब शुरू हुआ, मैं अपने चार बच्चों के साथ अपने घर पर थी. हमने जंगलों में भागने की कोशिश की, लेकिन वे हमारे बड़े बच्चे को उठाकर ले गए और उसका सर क़लम कर दिया. हम कुछ नहीं कर पाए क्योंकि हम भी मारे जाते."
एक अन्य महिला ने बताया कि उनके बेटे को चरमपंथियों ने मार दिया जबकि वो अपने बाक़ी तीन बच्चों के साथ पलायन को मजबूर हो गईं.
उन्होंने बताया, "जब मेरे 11 साल के बेटे को मारा गया, हमने सोचा कि अब हमलोगों का गाँव में रहना सुरक्षित नहीं है. मैं भागकर अपने पिता के गाँव आ गई, लेकिन कुछ दिनों बाद वहाँ भी हमले शुरू हो गए."
मोज़ाम्बिक में सेव द चिल्ड्रेन के निदेशक चांस ब्रिग्स ने बताया कि बच्चों पर हमलों की रिपोर्ट ने हमें अंदर तक हिला दिया है. उन्होंने बताया, "पलायन करके कैम्पों में रह रही माँओं ने जब अपनी अपनी कहानियाँ सुनाईं, तो हमारे कर्मचारियों की आँखों में आँसू आ गए."
संयुक्त राष्ट्र के विशेष अधिकारी ने चरमपंथियों की ओर से की जा रहीं इन हत्याओं को ऐसी क्रूरता कहा है, जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता.
कौन हैं ये चरमपंथी
स्थानीय रूप से इन चरमपंथियों को अल शबाब के नाम से जाना जाता है. अरबी में इसका मतलब है युवा. इससे ये भी अंदाज़ा होता है कि इन्हें काबो डेलगाडो के मुस्लिम इलाक़ों के अधिकतर युवा बेरोज़गारों का समर्थन मिलता है
अल शबाब नाम का एक संगठन सोमालिया में एक दशक तक सक्रिय रहा है. मोज़ाम्बिक से अलग ये संगठन अल क़ायदा से जुड़ा है. जबकि मोज़ाम्बिक का अल शबाब अपने को इस्लामिक स्टेट आंदोलन से जुड़ा हुआ कहता है.
इस्लामिक स्टेट इन विद्रोहियों को उस प्रांत का हिस्सा बताया है, जिसे वह सेंट्रल अफ़्रीका प्रॉविंस कहता है. पिछले साल इस्लामिक स्टेट ने कुछ तस्वीरें जारी की थी, जिसमें काबो डेलगाडो में लड़ाकों को एके-47 राइफ़ल्स और रॉकेट से चलाए जाने वाले ग्रेनेड के साथ देखा जा सकता था.
इन तस्वीरों ने आतंकवाद रोधी विशेषज्ञों को सतर्क कर दिया, क्योंकि इससे ये पता चल रहा था कि कई देशों में सक्रिय जिहादी अपने फ़ायदे के लिए स्थानीय विद्रोह का फ़ायदा उठा रहे हैं.
क्या चाहते हैं विद्रोही
कुछ जानकार कहते हैं कि विद्रोह की जड़ वहाँ की सामाजिक-आर्थिक बदहाली में है. कई स्थानीय लोग ये शिकायत करते हैं कि उन्होंने प्रांत के रूबी और गैस इंडस्ट्री से बहुत कम फ़ायदा होता है.
पिछले साल जारी वीडियो में एक चरमपंथी नेता ने कहा था, "हम इलाक़ों पर अपने क़ब्ज़े से ये दिखाना चाहते हैं कि मौजूदा सरकार अन्यायी है. ये सरकार ग़रीबों को अपमानित करती है और मालिकों को फ़ायदा देती है."
इस व्यक्ति ने इस्लाम के बारे में बात की और इस्लामी सरकार की अपनी इच्छा जताई. इस व्यक्ति ने ये भी आरोप लगाया कि मोज़ाम्बिक की सेना लोगों को प्रताड़ित करती है और ये सरकार अन्यायपूर्ण काम करती है.
चांस ब्रिग्स ने बीबीसी वर्ल्ड सर्विस को बताया कि इन चरमपंथियों का मक़सद क्या है, ये पता लगाना मुश्किल है, क्योंकि इनके पास इससे संबंधित कोई दस्तावेज़ नहीं है.
उन्होंने बताया, "ये युवकों को अपने साथ जुड़ने के लिए चुनते हैं और अगर वे इससे इनकार करते हैं, तो उन्हें मार दिया जाता है. और कई बार इनका सर क़लम कर दिया जाता है. इसका अंत क्या होगा, ये बताना मुश्किल है."
पिछले साल काबो डेलगाडो की राजधानी पेम्बा का दौरा करने के बाद दक्षिण अफ़्रीकी बिशप्स कॉन्फ़्रेंस के एक प्रतिनिधिमंडल ने कहा था कि जिन लोगों से भी उन्होंने बात की, सबने यही बताया कि ये युद्ध प्रांत के खनिज और गैस संसाधन पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नियंत्रण को लेकर है.
काबो डेलगाडो

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काबो डेलगाडो मोज़ाम्बिक के सबसे ग़रीब प्रांतों में से एक है. यहाँ बेरोज़गारी और अशिक्षा बहुत है. वर्ष 2009-10 में यहाँ रूबी के बड़े भंडार और एक बड़े गैस फ़ील्ड का पता चला था. इससे उम्मीद बँधी थी कि यहाँ नौकरियों के अवसर बढ़ेंगे और स्थानीय लोगों की ज़िंदगी बेहतर होगी.
लेकिन जल्द ही लोगों की उम्मीदें टूट गईं. ये आरोप लगाया गया कि सत्ताधारी फ़्रीलिमो पार्टी के एक छोटे किंतु अभिजात वर्ग को यहाँ का सारा फ़ायदा मिलता है. ये पार्टी 1975 में मोज़ाम्बिक को मिली आज़ादी के बाद से ही सत्ता में है.
नए इस्लामिक प्रचारकों, वो चाहें पूर्वी अफ़्रीकी हों या फिर मोज़ाम्बिक़ के, इन लोगों ने विदेशों में प्रशिक्षण प्राप्त किया, मस्जिदों की स्थापना की और ये तर्क दिया कि स्थानीय इमाम फ़्रीलिमो पार्टी की कमाई की कोशिशों से जुड़े हुए हैं.
नए मस्जिदों में से कुछ ने स्थानीय लोगों की आर्थिक मदद की ताकि वे अपना काम शुरू करें और नौकरियों के अवसर भी उपलब्ध कराएँ. इन इस्लामिक प्रचारकों ने ये तर्क दिया कि शरिया के अंतर्गत समाज ज़्यादा न्यायसंगत रहेगा.
इसने वहाँ के युवाओं को आकर्षित किया और यही युवा विद्रोह की रीढ़ बने हुए हैं.
सरकार की क्या प्रतिक्रिया है?

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सरकार का ध्यान सैनिक समाधान पर केंद्रित दिखता है. लेकिन उनकी सेना ऐसे विद्रोह से निपटने के लिए तैयार नहीं है.
सोमवार को राजधानी मापुटो में अमेरिका दूतावास के अधिकारी ने कहा है कि अमेरिकी सैन्यकर्मी मोज़ाम्बिक में सैनिकों को ट्रेनिंग देने के लिए दो महीने रहेंगे. साथ ही उन्हें मेडिकल और संचार उपकरण भी उपबल्ध कराए जाएँगे.
पिछले साल यूरोपीय संघ ने भी घोषणा की थी कि वो मोज़ाम्बिक के सैनिकों को प्रशिक्षण उपलब्ध कराएगा. यूरोपीय संघ और अमेरिका की पहल उन रिपोर्टों के बाद आई थी कि मोज़ाम्बिक ने चरमपंथियों से लड़ने के लिए रूसी और दक्षिण अफ़्रीकी के किराए के सैनिकों को नियुक्त किया है.
हालाँकि ऐसी रिपोर्टें हैं कि रूस के इन प्राइवेट लड़ाके काबो डेलगाडो से हट गए हैं, क्योंकि उन्हें वहाँ विद्रोहियों के हाथों बड़ा नुक़सान उठाना पड़ रहा था.
इन सबके बीच इन विद्रोहियों का क़ब्ज़ा अभी किसी इलाक़े पर नहीं है. पिछले साल ज़रूर इन्होंने मोसिमबोआ डा परिया के सामरिक रूप से अहम पोर्ट और एक अन्य अहम शहर क्विसांगा पर कुछ समय के लिए नियंत्रण कर लिया था.
पिछले साल तंज़ानिया के गैस से संपन्न इलाक़े मटवारा में कई गाँवों पर सीमा के इस बार से हमले भी हुए थे.
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