म्यांमार में क्या होगी लोकतंत्र की वापसी? - दुनिया जहान

    • Author, टीम बीबीसी हिन्दी
    • पदनाम, नई दिल्ली

जगह: म्यांमार की राजधानी नेपीडाव, तारीख: एक फरवरी, दिन: सोमवार.

सुबह के वक़्त यहां मौजूद संसद भवन के सामने फ़िल्माया गया एक वीडियो वायरल हो गया. इसमें नज़र आती हैं एक युवा फिटनेस इंस्ट्रक्टर. 

मास्क से ढका चेहरा, बैकग्राउंड में बजता गाना और ताल से ताल मिलाकर थिरकते हाथ-पांव. 

हवा में पंच जड़ते हुए वो इस कदर तल्लीन दिखीं कि उन्हें अपने पीछे तेज़ी से बदलती तस्वीरों का कोई अंदाज़ा ही नहीं हुआ. 

उनके पीछे से काले रंग की SUV और सशस्त्र गाड़ियों का काफ़िला गुज़र रहा था. इनमें से कुछ गाड़ियों की छत पर मशीनगन लगी थीं. ये गाड़ियां संसद की तरफ बढ़ती दिखीं. 

इन फिटनेस इंस्ट्रक्टर की ही तरह म्यामांर के तमाम लोग कुछ मिनट बाद देश में होने जा रहे तख़्तापलट से अनजान थे. 

सेना ने देश की निर्वाचित नेता आंग सान सू ची को गिरफ़्तार कर लिया. इस कार्रवाई के विरोध में प्रदर्शन शुरू हो गए और उन्हें रोकने के लिए सेना ने शुरू कर दी सख्ती.

चार हफ़्ते बाद भी म्यांमार में स्थिति जस की तस है.

सड़क पर उतरे लोग 

विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा ले रही हैं मे प्यू कहती हैं, "तमाम लोग काफ़ी सक्रिय हैं. वो कई तरह के क्रिएटिव आइडिया आजमा रहे हैं. पूरे देश में लोग सड़कों पर उतरकर सेना के प्रति अपना विरोध जता रहे हैं." 

मे प्यू कुछ हफ़्ते पहले तक म्यांमार में लिंग समानता के लिए अभियान चला रहीं थीं. वो बताती हैं कि तख़्तापलट के बाद शुरुआत में लोग सार्वजनिक जगहों पर इकट्ठा हो रहे थे. लेकिन अब विरोध करने वालों की रणनीति बदल रही है. इसकी वजह ये है कि बड़े शहरों में सार्वजनिक जगहें सुरक्षित नहीं हैं. 

मे प्यू बताती हैं, "प्रदर्शनकारी एक जगह जमा होने के बजाए पूरे शहर में घूम रहे हैं. वो जानते हैं कि सेना और सुरक्षाबल दूतावासों के सामने शांत रहेंगे. इसलिए लोगों के समूह एक के बाद दूसरे दूतावास का रुख़ कर रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से समर्थन मांग रहे हैं." 

नए तरीके आजमा रहे प्रदर्शनकारी सार्वजनिक परिवहन पर असर डालने के साथ दफ़्तर जाने वाले लोगों की राह रोकना चाहते हैं. सेना की सख़्ती और इंटरनेट पर पाबंदी के बाद भी लोग आपस में संपर्क कायम करने और विरोध प्रदर्शन आयोजित करने में कामयाब हो रहे हैं. 

ताज़ा स्थिति को लेकर मे प्यू कहती हैं, "सेना ने दूसरे शहरों में गिरफ़्तारियां बढ़ा दी हैं. लोगों पर बल प्रयोग किया जा रहा है. सिर्फ रबर की गोलियां इस्तेमाल नहीं की जा रही हैं. वो प्रदर्शकारियों पर असली गोलियां भी चला रहे हैं."

सुरक्षाबलों का कहना है कि उन्हें आदेश दिए गए है कि अगर पांच से ज़्यादा लोग एक जगह इकट्ठा हों तो वो गोली चलाएं. 

चीन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन

इस बीच म्यांमार में चीन के दखल को लेकर भी आशंका जाहिर की जा रही है. इसीलिए चीनी दूतावास के आगे भी प्रदर्शन हो रहे हैं. 

मे प्यू बताती हैं कि म्यांमार के लोग ताक़तवर पड़ोसी तक अपनी नाराज़गी पहुंचाने में संकोच नहीं कर रहे हैं. इससे उनके मज़बूत इरादे की झलक मिलती है.

वो कहती हैं प्रदर्शनकारी चीन को संदेश दे रहे हैं, "हमसे मत उलझो. हम जानते हैं कि चीन सेना का समर्थन करता है. लोग चीन के दूतावास के आगे नारे लगा रहे हैं, चीन सुनो, हमारे देश से बाहर निकलो. हमारे वोट का सम्मान करो."

मे प्यू के मुताबिक़ प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सेना को बैरकों में वापस चले जाना चाहिए.

हालांकि, इसे एक महत्वाकांक्षी ख़्वाब कहा जा सकता है. म्यांमार में सेना ने पहली बार क़रीब छह दशक पहले देश की सत्ता पर कब्ज़ा किया था. 2015 के चुनाव में आंग सान सू ची की पार्टी की जीत के बाद भी सेना के हाथ में काफी ताक़त थी. बीते साल नवंबर में आंग सान सू ची को दोबारा जीत मिली और सेना को लगा कि सत्ता उनके हाथ से फिसल रही है.

शक्तिशाली सेना

बीबीसी बर्मा सेवा की पूर्व प्रमुख टिन टा स्वे कहती हैं कि म्यांमार की सेना बीते 70 साल से ज़्यादा वक़्त से बिना रुके लड़ रही है.

वो बताती हैं कि यहां सेना शक्तिशाली संस्थान है जिसे अपने बनाए संविधान से ताकत मिलती है. साल 2008 में सेना ने म्यांमार के संविधान में संशोधन किया. इसके बाद देश लोकतंत्र के रास्ते पर बढ़ा और साल 2015 में यहां चुनाव हुए

टिन टा स्वे बताती हैं, "उस चुनाव में आंग सान सू ची की पार्टी ने हिस्सा लिया और जीत हासिल की. उन्हें 80 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट हासिल हुए." 

संविधान के मुताबिक़ आंग सान सू ची की पार्टी सभी सीटें हासिल नहीं कर सकती थी. कुछ सीटें सेना के लिए रिजर्व थीं. आंग सू ची की पार्टी तीन अहम मंत्रालय गृह, रक्षा और सीमा मामले भी अपने पास नहीं रख सकती थी. लेकिन फिर भी आंग सान सू ची के नेतृत्व ने देश में उम्मीद के नए युग की शुरुआत हुई.

टिन टा स्वे कहती हैं, "मुझे लगता है कि उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि एक आज़ाद समाज की रचना है. उन्होंने लोगों खासकर युवाओं में विश्वास बहाल किया. लोग अब राजनीति के बारे में बात करने से डरते नहीं. जैसा डर उनके सत्ता में आने के पहले दिखता था. उन्हें लगा कि उनके पास भविष्य है और वो निर्माण प्रक्रिया का हिस्सा हैं."

जनता का साथ

लेकिन जैसे-जैसे समय बीता सरकार चलाने के उनके तौर-तरीकों की आलोचना भी हुई. लेकिन आंग सान सू ची की कर्तव्यनिष्ठ नेता की पहचान पर कोई असर नहीं हुआ. हालांकि, जब उन्होंने रोहिंग्या समुदाय पर सेना के हमलों की आलोचना करने से इनकार कर दिया तब दुनिया के कई देशों ने नाराज़गी दिखाई.

टिन टा स्वे बताती हैं, "साल 2017 में रोहिंग्या समुदाय के ख़िलाफ़ सेना के क्रूर अभियानों को लेकर उनका रुख़ समझौतावादी नज़र आया और इसने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को निराश किया. दिक्कत सेना के अभियान या फिर उनके सिद्धांतों को लेकर नहीं है. दिक्कत इस बात की थी कि वो देश की चुनी हुई नेता थीं लेकिन तब भी सेना के पास ख़ासी राजनीतिक ताक़त बनी रही."

साल 2020 में आंग सान सू ची का पांच साल का पहला कार्यकाल पूरा हुआ. इसके बाद चुनाव हुए और उन्हें प्रचंड बहुमत मिला. सेना की पार्टी को सिर्फ़ सात फ़ीसदी वोट मिले. चुनाव नतीजों से ये जाहिर हुआ कि सेना के जनरलों के हाथ से ताक़त फिसल रही है. उन्हें डर था कि आंग सान सू ची संविधान में बदलाव कर सकती हैं.

टिन टा स्वे कहती हैं, "सेना की नज़र में आंग सान सू ची ने लक्ष्मण रेखा पार कर दी. उन्हें रोकने के लिए ज़रूरी था कि देश की सत्ता पर अधिकार कर लिया जाए. इस फ़ैसले की एक और वजह मानी जाती है. म्यांमार सेना के प्रमुख राष्ट्रपति बनने का ख़्वाब देख रहे थे. लेकिन सेना को बेहद कम वोट हासिल होने के कारण उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया. ये भी साफ हुआ कि लोगों से सेना की पकड़ छूट रही है."

टिन टा स्वे कहती हैं, "अंतरराष्ट्रीय समुदाय से उनका संपर्क बहुत कम है. उनके रिश्ते पड़ोस के एशियाई देशों से ही हैं. उन्हें लगता है कि लोग अब भी सेना का सम्मान करते हैं."

लेकिन वो ग़लत साबित हुए. लोग सेना की विदाई चाहते थे. लेकिन इस कहानी में बात सिर्फ़ महात्वाकांक्षा या रुतबे की नहीं है. पैसे की भी भूमिका है.

अर्थव्यवस्था पर सेना का दबदबा

एशिया पैसिफ़िक प्रोग्राम के एसोसिएट फेलो वासुकी शास्त्री की राय है कि म्यांमार में सेना ने अर्थव्यवस्था समेत देश के करीब-करीब हर पहलू में अपना दखल बनाया हुआ है.

शास्त्री कहते हैं कि म्यांमार की भौगोलिक स्थिति इसे अवसरों के केंद्र में रखती है. इसकी पश्चिमी सीमा बंगाल की खाड़ी को छूती है और यहीं से पड़ोसी देश भारत के साथ उसका संपर्क जुड़ता है. म्यांमार के पूर्व में एशिया का एक और शक्तिशाली देश है. चीन. म्यांमार के अंदर भी कई तरह की संपदाएं हैं.

वासुकी शास्त्री कहते हैं, "म्यांमार में प्राकृतिक संसाधन की भरमार है. यहां खेती का भी बड़ा आधार है. यहां की आबादी की बात करें तो लोग पढ़े-लिखे और मेहनती हैं. दक्षिण पूर्व एशिया के बाकी देशों के लोगों में जो खूबियां दिखती हैं, वो यहां के लोगों में भी हैं. वो उद्यमशील हैं. निवेश और कारोबार में उनकी दिलचस्पी है."

म्यांमार इस क्षेत्र में गैस के सबसे बड़े उत्पादकों में शामिल है. उसके पास अपनी जरूरत के मुताबिक तेल का पर्याप्त भंडार है. शास्त्री कहते हैं कि म्यांमार को अपनी भौगोलिक स्थिति का लाभ मिल सकता था लेकिन म्यांमार की अर्थव्यवस्था जब-जब उड़ान भरने को तैयार दिखी, तभी सेना के जनरल आए और घड़ी की सूइयां घुमाते हुए वक़्त को पीछे ले गए.

इसका एक उदाहरण 1980 के दशक में दिखा था. तब प्रचलन में रहे कुछ नोटों को हटाने का फ़ैसला किया गया था. इस कदम से आर्थिक अफरा-तफरी की स्थिति बन गई. लेकिन नए सैन्य नेतृत्व की देखरेख में म्यांमार ने तरक्की की राह पकड़ ली.

वासुकी शास्त्री कहते हैं, "हमने बीते दशक में आर्थिक स्थिरता का दौर देखा. इसकी वजह ये थी कि जनरल थेन सेन ने तय किया कि आगे बढ़ने का रास्ता लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़ा है. उन्होंने चीन और दक्षिण पूर्व एशिया से विदेशी निवेश को मंजूरी दी."

चीन ने म्यांमार की लचर यातायात प्रणाली को सुधारने में दिलचस्पी दिखाई. चीन ने म्यांमार के समुद्री संपर्क बेहतर करने में भी मदद की. लेकिन चीन के साथ म्यांमार के रिश्ते में विश्वास की डोर कभी बहुत मजबूत नहीं दिखी.

शास्त्री कहते हैं चीन के निवेश के बाद भी सेना को आशंका रही कि चीन दोतरफा खेल खेल रहा है. वो म्यांमार में फल फूल रहे विद्रोहियों की मदद कर रहा है. एक तरह से ये रिश्ता काफी उलझा हुआ सा रहा.

उधर, एशिया की अर्थव्यवस्थाओं में हाल में आए उछाल का फ़ायदा म्यांमार को भी मिला. पश्चिमी देशों के कई ब्रांड की सप्लाई चेन में ये अहम कड़ी बन गया. कंबोडिया, श्रीलंका और बांग्लादेश के साथ म्यांमार की भी आर्थिक प्रगति हुई. इसकी वजह इन चार देशों से यूरोप, अमेरिका और ब्रिटेन को होने वाला निर्यात है. लेकिन इस बीच म्यांमार की अर्थव्यवस्था पर सेना के जनरलों की पकड़ लगातार मजबूत रही.

वासुकी शास्त्री कहते हैं, "जिन बिजनेस पर सेना का नियंत्रण है, उनकी देश की जीडीपी में कितनी हिस्सेदारी है, ये हिसाब करना मुश्किल है. ऐसी रिपोर्ट हैं कि चीन की साझेदारी में आधारभूत ढांचे से जुड़ी हर परियोजना में सेना शामिल होती है. देश में सैंकड़ों घोषित और हजारों अघोषित साझा परियोजनाएं हैं. सेना के हस्तक्षेप का एक कारण ये भी लगता है कि जनरलों को डर था कि उनके लिए आर्थिक समस्याएं बढ़ सकती हैं."

क्या बदलेंगे हालात?

शास्त्री कहते हैं कि 2015 में हुए चुनाव एक नई शुरुआत का मौक़ा थे लेकिन वो कहते हैं कि तब भी एक बड़ा अवसर गंवा दिया गया और अब म्यांमार को एक बार फिर नई शुरुआत करनी होगी. लेकिन म्यांमार नई शुरुआत करेगा कहां से? क्या यहां लोकतंत्र बहाली की उम्मीद मज़बूत होगी या फिर ये देश सेना के ही कब्ज़े में रहेगा.

इस सवाल पर म्यांमार इंस्टीट्यूट फॉर पीस एंड सिक्योरिटी के रिसर्च डॉयरेक्टर अमारा तिहा कहते हैं कि आंग सान सू ची जब तक जीवित हैं, तब तक म्यांमार की नेता रहेंगी और चाहे जो हो उनका दर्जा बरक़रार रहेगा.

अमारा तिहा कहते हैं कि आंग सान सू ची भले ही गिरफ़्तार कर ली गई हों और उन पर तमाम आरोप हों लेकिन भविष्य की संभावना के लिहाज़ से उन्हें ख़ारिज करना ठीक नहीं होगा. आखिरकार वो 1980 के दशक से सेना के विरोधी पक्ष की नेता हैं.

वो ये भी कहते हैं कि सेना आंग सान सू ची की पार्टी एनडीएल पर सख़्ती करेगी और उन्हें म्यांमार की संसद पर दबदबा कायम करने की इजाज़त नहीं दी जाएगी. अगर वादे के मुताबिक़ इस साल के आख़िर में चुनाव हुए तो भी सेना के जनरल चाहेंगे कि उनके सामने एक बंटा हुआ विपक्ष रहे.

अमारा तिहा कहते हैं, "वो हमेशा गठबंधन सरकार देखना चाहेंगे. वो नहीं चाहेंगे कि ऐसा कोई व्यक्ति हो जो उनके प्रभुत्व को चुनौती दे सके. वो 2008 के संविधान को बरकरार रखना चाहेंगे. साथ ही ये भी चाहेंगे कि कोई ऐसा राजनीतिक दल न हो जो उनके दबदबे को चुनौती दे सके."

फिलहाल प्रदर्शनकारियों की एक ही मांग है. वो चाहते हैं कि सेना राजनीति से बाहर रहे. अगर आप उनके नारों पर गौर करें तो पाएंगे कि वो किसी तरह की मध्यस्थता की बात नहीं कर रहे हैं. इस बीच कुछ पश्चिमी देशों ने म्यांमार के कुछ सेना अधिकारियों पर पाबंदियां लगाई हैं. हालांकि, अमारा कहते हैं कि इनका कोई ख़ास असर होने की संभावना नहीं है.

किसकी होगी जीत?

वो कहते हैं, "किसी देश पर प्रतिबंध लगाकर आप ये बताते हैं कि ये क़दम आपको पसंद नहीं है. इसके ज़रिए आप नैतिकता के ऊंचे मानदंडों की बात करते हैं. लेकिन ज़मीन पर बदलाव लाने के लिए बातचीत और मध्यस्थता किए जाने की जरूरत है."

चीन के साथ म्यांमार के रिश्तों को लेकर चाहे जितनी भी आशंकाएं हों लेकिन फिर भी इस दमदार पड़ोसी का यहां ज़्यादा प्रभाव हो सकता है. चीन अपने पड़ोसी देश में अस्थिरता नहीं चाहेगा. लेकिन वो म्यांमार में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बढ़ावा नहीं देना चाहेगा. ऐसा होने पर हांगकांग के प्रदर्शनकारियों को प्रेरणा मिल सकती है.

लेकिन म्यांमार में प्रदर्शनकारी आरपार की बात कर रहे हैं. वो कहते हैं कि उनका भविष्य दांव पर लगा है और अगर वो इस बार जीत हासिल कर पाए तभी उनके बच्चे शांति के साथ रह पाएंगे.

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वो अपनी जान देने को तैयार हैं. कई प्रदर्शनकारियों की जान जा भी चुकी है. अभी ये दावे से नहीं कहा जा सकता है कि आगे सेना कितनी सख़्ती कर सकती है और लोग किस हद तक बर्दाश्त कर पाते हैं.

लेकिन ये भी स्पष्ट है कि अपने हितों के दांव पर होने की आशंका में घिरे सेना के जनरल आसानी से पीछे नहीं हटेंगे.

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