फ़्रांसीसी सामान का बहिष्कार, निशाना अर्थव्यवस्था है या मुस्लिम देशों की आपसी लड़ाई

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
फ़्रांस के ख़िलाफ़ मुस्लिम देशों की नाराज़गी संसद से सड़क तक देखी जा रही है. पहले कुछ देशों ने फ़्रांस के सामान के बहिष्कार की बात कही थी. अब पाकिस्तान और ईरान की संसद तक इसकी गूँज सुनाई दे रही है.
कुवैत, जॉर्डन और क़तर की कुछ दुकानों से फ़्रांस के सामान हटा दिए गए हैं.
तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने सोमवार को टीवी पर प्रसारित संदेश में फ़्रांस में बने सामानों का बहिष्कार करने की अपील की.
पाकिस्तान की संसद ने फ़्रांस से अपने राजदूत को वापस बुलाने के लिए प्रस्ताव पारित किया है. बाद में उन्हें ध्यान आया कि उनका राजदूत फ़्रांस में है ही नहीं.
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इससे पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने रविवार को एक ट्वीट में फ़्रांस के राष्ट्रपति पर इस्लाम पर हमला करने के आरोप लगाए थे.
ईरान की संसद में भी अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर पैग़ंबर मोहम्मद के अपमान का मुद्दा उठा. वहाँ भी फ़्रांसीसी सरकार के रुख़ पर सवाल उठाए गए.

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इतना ही नहीं बांग्लादेश में मंगलवार को हज़ारों की तादाद में लोग विरोध प्रदर्शन के लिए सड़कों पर उतरे. यही हाल इराक़, लीबिया और सीरिया का भी था.
मुस्लिम देशों का सारा विरोध पैग़ंबर मोहम्मद के कार्टून दिखाने वाले फ़्रांस के एक शिक्षक की हत्या के बाद राष्ट्रपति मैक्रों की टिप्पणी को लेकर शुरू हुआ है. मैक्रों ने कहा था कि इस्लाम संकट में है. उन्होंने शिक्षक की हत्या को 'इस्लामी आतंकवादी' हमला कहा था.
इस बीच फ़्रांस के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि 'बहिष्कार की बेबुनियाद' बातें अल्पसंख्यक समुदाय का सिर्फ़ एक कट्टर तबक़ा ही कर रहा है.
लेकिन फ़्रांस के सामान के बहिष्कार से क्या हासिल होगा? क्या ये महज़ सांकेतिक विरोध है, या फिर मुस्लिम देशों के बीच की लड़ाई का हिस्सा है?
ये जानने के लिए सबसे पहले जानना होगा कि आख़िर फ़्रांस इन मुस्लिम देशों को क्या सामान बेचता है?

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फ़्रांस के सामान के बहिष्कार का असर
आर्थिक सहयोग और विकास संगठन की अप्रैल 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक़ फ़्रांस का निर्यात चार चीज़ों पर ज़्यादा निर्भर करता है.
पहला हवाई जहाज़ और विमानन से जुड़े सामान, दूसरा परिवहन उपकरण, जिसमें ऑटो सेक्टर शामिल हैं, तीसरा कृषि क्षेत्र से जुड़े सामान और चौथा फ़ैशन, लग्ज़री गुड्स इंडस्ट्री.
बीते दो सालों से फ़्रांस की ओर से दूसरे देशों को निर्यात करने वाले सामान में काफ़ी कमी देखने को मिली है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने कुवैत और सऊदी अरब के बाज़ारों में जाकर फ़्रांस के सामान के बहिष्कार का जायज़ा लिया.
उनकी रिपोर्ट के मुताबिक़ कुवैत के एक सुपरमार्केट स्टोर में लॉरियल ब्रांड के कॉस्मेटिक्स और स्किन केयर प्रोडक्ट की अलमारी ख़ाली पड़ी थी.
लॉरियल फ़्रांसीसी ब्रांड है, जिसके ब्यूटी प्रोडक्ट दुनिया भर में मशहूर हैं. मध्य पूर्व के देशों और अफ़्रीका को मिला कर लॉरियल और दूसरे फ़्रांसीसी फ़ैशन ब्रांड्स का कुल कारोबार मात्र दो फ़ीसद के आसपास है.

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उसी तरह से फ़्रांसीसी सुपरमार्केट चेन कारफ़ुअर, पाकिस्तान, बहरीन, सऊदी अरब के साथ कई दूसरे मुस्लिम देशों में मौजूद है.
सऊदी अरब में फ़्रांसीसी सुपरमार्केट चेन 'कारफ़ुअर' के बहिष्कार की बात सोशल मीडिया पर सोमवार को ख़ूब ट्रेंड भी कर रही थी, लेकिन उनके दो स्टोर, जिनका रॉयटर्स ने जायज़ा लिया, वहाँ काम रोज़ की तरह ही चल रहा था.
फ़्रांस में कारफ़ुअर कंपनी के प्रवक्ता ने कहा कि अभी तक उनके मार्केट चेन पर बहिष्कार का कोई असर इन देशों में देखने को नहीं मिला है.
कृषि उत्पादों में फ़्रांस सबसे ज़्यादा गेंहू निर्यात करता है. फ़्रांस के कुल अनाज निर्यात का तीन फ़ीसद मुस्लिम देशों को जाता है, जिनमें ज़्यादातर उत्तर अफ्रीक़ा के मुस्लिम देश हैं.
इसके अलावा फ़्रांस वाइन भी निर्यात करता है, लेकिन मुस्लिम देशों में इसकी खपत ना के बराबर है.
ऊर्जा के क्षेत्र मेंफ़्रांस की कंपनी टोटल की अपनी अलग पहचान है. पाकिस्तान, बांग्लादेश, तुर्की, सऊदी अरब और दूसरे खाड़ी देशों में पेट्रोलियम प्रोडक्ट का इनका काम चलता है.
रक्षा क्षेत्र में प्राइवेट जेट और रफ़ाल जैसे लड़ाकू विमान फ़्रांस, सऊदी अरब, क़तर, तुर्की, यूएई जैसे देशों को भी बेचता है.

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अगर फ़्रांस के सामान के बहिष्कार की बात हो रही है, तो इन सभी सेक्टर पर आने वाले दिनों में असर देखने को मिल सकता है.
फ़्रांस की अर्थव्यवस्था के जानकार और आईआरआईएस संस्थान में रिसर्च एसोसिएट प्रोफ़ेसर जाँ-जोसेफ़ बायलोट कहते हैं कि इस तरह के बॉयकॉट से फ़्रांस को फ़ौरी तौर पर नुक़सान नहीं होगा. वो इसके पीछे तर्क भी देते हैं.
"पहली बात डिफ़ेंस सेक्टर में फ़्रांस जो निर्यात करता है, वो सबसे अहम है. लेकिन मध्य-पूर्व के मुस्लिम देश फ़िलहाल आपस में लड़ रहे हैं. उन्हें इन सामानों की जब-जब ज़रूरत पड़ेगी, वो ज़रूर ख़रीदेंगे. इसलिए डिफ़ेंस सेक्टर पर ज़्यादा असर नहीं पड़ने वाला. दूसरी वजह है कि लग्ज़री ब्रांड और कृषि क्षेत्र में फ़्रांस के ज़्यादातर ग्राहक मुस्लिम देश नहीं है. लेकिन वो साथ ही कहते हैं, बड़े अंतराल में फ़्रांस की सेक्युलर छवि को इस बॉयकॉट की वजह से नुक़सान ज़रूर पहुँच सकता है."
हालाँकि फ़्रांस के व्यापार मंत्री फ़्रैंक राइस्टर के मुताबिक़ बहिष्कार अभियान के प्रभाव के आँकड़ों के बारे में अभी अंदाज़ा लगाना जल्दबाज़ी है. लेकिन इतना तय है कि इसका असर सीमित है और कृषि क्षेत्र के निर्यात पर ही पड़ने की संभावना है.
फ़्रांस के लोकल रेडियो चैनल को दिए इंटरव्यू में वहाँ के व्यापार मंत्री ने स्पष्ट किया कि वो तुर्की के ख़िलाफ़ ऐसा कोई क़दम नहीं उठाने वाले हैं. साथ ही उन्होंने तुर्की के राष्ट्रपति के फ़्रांस के सामान के बहिष्कार वाले बयान की आलोचना भी की.
ये तो हुई अर्थव्यवस्था पर असर की बात. लेकिन यहाँ मुस्लिम देशों के आपसी रिश्तों के बारे में जानना भी ज़रूरी है.

इस्लामिक देशों के आपसी रिश्ते
बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक़ पश्चिमी यूरोप में सबसे ज़्यादा मुसलमान फ़्रांस में ही रहते हैं. फ़्रांस में तक़रीबन 50 लाख मुस्लिम आबादी है.
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडी के डीन अश्विनी महापात्रा कहते हैं कि फ़्रांस में रहने वाले ज़्यादातर मुसलमान उत्तरी अफ़्रीका के हैं, जो अल्जीरिया, मोरक्को और ट्यूनीशिया से आए हैं.
वो ये भी मानते हैं कि सामान के बहिष्कार की मुस्लिम देशों की अपील आर्थिक नुक़सान पहुँचाने के इरादे से कम और सांकेतिक ज़्यादा है.
इसके पीछे वो वजहें भी गिनाते हैं. फ़्रांस और तुर्की के रिश्ते आज से नहीं, बल्कि सालों से ख़राब चल रहे हैं. उनके बीच आपसी हितों की लड़ाई पहले से चल रही है.

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उनके मुताब़िक, "फ़्रांस यूरोपीय यूनियन में तुर्की की एंट्री का हमेशा से विरोध करता रहा है. इसके अलावा पूर्वी भूमध्यसागर में तुर्की के तेल और गैस के भंडार खोजने के अभियान को लेकर भी फ़्रांस ने तुर्की का विरोध किया है. लीबिया में चल रहे गृहयुद्ध में भी फ़्रांस और तुर्की एक दूसरे के आमने-सामने है. इस्लाम के नाम पर फ़्रांस का विरोध तो अब शुरू हुआ है. इसलिए इन बहिष्कारों का ताज़ा विवाद से सरोकार कम दिखता है."
प्रोफ़ेसर महापात्रा का मानना है कि फ़्रांस के बहिष्कार की बात इस्लामिक देशों की आपसी लड़ाई का भी एक हिस्सा है.
"पिछले कुछ समय से इस्लामिक देशों के बीच वर्चस्व की लड़ाई चल रही है कि उनका असली नेता कौन है? फ़्रांस में बीते दिनों जो कुछ हुआ, उसने इन सभी इस्लामिक देशों को, चाहे वो तुर्की हो या फिर सऊदी अरब या फिर ईरान, सभी को एक मौक़ा दिया कि इन देशों को एकजुट कर असल नेता बनें. ये लड़ाई फ़्रांस के विरोध में कम और आपस में मुस्लिम देशों के बीच की लड़ाई ज़्यादा है."
वो आगे कहते हैं, "फ़्रांस में जो कुछ हुआ, उससे सभी मुस्लिम देशों में गु़स्सा है. विरोध भी सभी ने किया लेकिन लीड तुर्की लेना चाहता है, ताकि वो इस्लामिक देशों के संरक्षक के तौर पर ख़ुद को स्थापित कर सके."

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तुर्की, उस्मानिया साम्राज्य के पतन को एक बहुत बड़ी त्रासदी के रूप में देखता है. उसे लगता है कि इस घटना के बाद मुस्लिम समाज पूरी दुनिया में निर्बल और बदहाल हो गया.
इसलिए वो चाहता है कि ख़िलाफ़त की पुनर्स्थापना के साथ मुसलमान अपने खोए हुए सुनहरे दिन फिर से हासिल कर लेंगे. उस्मानिया साम्राज्य में ख़लीफ़ा प्रमुख शासक हुआ करता था.
ख़िलाफ़त की पुर्नस्थापना का मतलब है कि फिर से तुर्की में ख़लीफ़ा के पद को स्थापित करना. यही तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन की ख़्वाहिश है.
लेकिन तुर्की की इस राह में कई रोड़े भी हैं. जैसे ईरान और सऊदी अरब. कभी-कभी पाकिस्तान भी इसमें कूद पड़ता है. जैसे फ़्रांस के मामले में इस बार प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने किया.
फ़्रांस और इस्लामिक देशों के बीच जो ताज़ा विवाद है, उसमें इस लड़ाई की भी भूमिका है.
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