अमरीकी चुनाव: भारतीय मूल के लोगों की वोटिंग पर पीएम मोदी का असर

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- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वॉशिंगटन (अमरीका) से
26 जनवरी यानी भारतीय गणतंत्र दिवस को इलयास मोहम्मद अपने घर से 400 मील की दूरी तय करके वॉशिंगटन डीसी के नॉर्थ कैरोलिना के चारलॉट में नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन में शामिल होने पहुंचे.
गणतंत्र दिवस आधिकारिक रूप से भारत के अपने संविधान को अपनाने के सालगिरह के तौर पर मनाया जाता है.
अमरीका में और बाहर हुए ऐसे कई विरोध प्रदर्शनों में विभिन्न धर्मों के भारतीय मूल के लोग शामिल हुए.
प्रदर्शनकारियों ने भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लहराया, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के ख़िलाफ़ नारे लगाए और धार्मिक उत्पीड़न की वजह से तीन पड़ोसी देशों से भाग रहे गैर-मुस्लिम लोगों को नागरिकता प्रदान करने वाले विवादास्पद क़ानून की निंदा करते बैनर दिखाए.
एक बैनर पर 'नरसंहार बंद करो' लिखा था तो दूसरे पर लिखा था 'मेरे धर्मनिरपेक्ष भारत को बचाओ'.

'ट्रंप और मोदी में ज़्यादा फ़र्क नहीं'
आठ महीने बाद इलयास इस प्रदर्शन में भाग लेने की वजह बताते हैं.
वो कहते हैं, "सीएए-एनआरसी के आने से पहले मैं अपना नज़रिया ऑनलाइन साझा करता था. लेकिन इनके आने के बाद मुझे लगा कि कंप्यूटर स्क्रीन के पीछे अपनी राय व्यक्त करने से कुछ नहीं बदलेगा."
इलयास भारत में हैदराबाद से हैं और आईटी इंडस्ट्री में काम करते हैं.
वो कहते हैं, "ट्रंप और मोदी के विचारों में बहुत अंतर नहीं है. ट्रंप ने यहां मुसलमानों पर प्रतिबंध लगाया. हमारे मोदी जी कुछ ऐसा ही भारत में सोच रहे हैं."
लिंचिंग, कथित रूप से गोमांस को लेकर हुए हमले, नागरिकता संशोधन क़ानून, बाबरी मस्जिद-राम मंदिर, कश्मीर संघर्ष और दिल्ली दंगे...बीते कुछ महीनों के दौरान ये वो मुद्दे हैं जो लगभग 45 लाख भारतीय अमरीकी समुदाय को, विशेषकर मुसलमानों के एक वर्ग को परेशान करते रहे हैं.
ये विभाजन लोगों के वोट के विकल्पों को भी प्रभावित कर रहे हैं.
मोदी की अगुवाई वाली सरकार के आलोचक इसे फ़ासीवादी और ज़ेनोफ़ोबिया (दूसरे देशों के लोगों से नफ़रत) बढ़ाने वाला बताता हैं. वहीं, मोदी सरकार के समर्थक ऐसा कहने वालों को 'पक्षपातपूर्ण' और 'वामपंथी' करार देते हैं.
बीजेपी-यूएसए (ऑफ़बीजेपी-यूएसए) के कार्यकारी अध्यक्ष अडप्पा प्रसाद के प्रवासी मित्र कहते हैं, "उग्र स्वभाव के शरारती लोगों ने कुछ लिंचिंग की हैं. हिंदुओं की भी लिंचिंग हुई है लेकिन इस पर कभी ख़ास तौर से चर्चा नहीं होती."
वो अमरीका में 'भारत विरोधी और कट्टर वामपंथी एजेंडे से संचालित होने वाले अमरीकी अख़बारों' उनकी 'पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग' को इसके लिए दोषी ठहराते हैं.
वो कहते हैं, "अगर मेरे भाई ऐसी ख़बरें पढ़ रहे हैं और इसके प्रभाव में आ रहे हैं तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है."

अमरीका में भी बंटे हिंदू-मुसलमान
अडप्पा प्रसाद कहते हैं, "एक अफ़वाह फ़ैलाई गई कि मुसलमानों को भारत से बाहर निकाल दिया जाएगा. ये एजेंडा से संचालित था और भारत को बदनाम और बर्बाद करने के लिए किया गया था."
अडप्पा प्रसाद ने विभाजन को सुनियोजित और संगठित बताया लेकिन इलयास का मानना है कि समुदाय में विभाजन साफ़ दिखता है.
वो कहते हैं, "मैं चारलॉट में 2011 से रह रहा हूँ और हम भारतीय समुदाय के तौर पर रहते हैं. हमारे बीच मतभेद होते थे लेकिन वर्तमान परिस्थितियों ने हमारे रिश्ते को बांट दिया है."
इलयास हिंदू समुदाय के कुछ उन सदस्यों का ज़िक्र कर रहे थे जो प्रधानमंत्री मोदी और सीएए का समर्थन करते हैं.
एक भारतीय-अमरीकी मुसलमान ने कहा कि खुले राजनीतिक संरक्षण की वजह से कई लोग पक्षपात और नफ़रत का खुला प्रदर्शन कर रहे हैं.

भारतीयों में दरार
तो क्या में जो राजनीति लोगों का ध्रुवीकरण करती है, क्या वही राजनीति भारतीय अमरीकी पहचान को प्रभावित और विभाजित कर रही है?
वॉशिंगटन डीसी में रहने वाली वरिष्ठ पत्रकार सीमा सिरोही का मानना है कि भारतीय-अमरीकी पहचान में अब दरार आ गई है और यह टूटने के कगार पर है.
वो कहती हैं, "मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारतीय मुसलमान भारतीय-अमरीकियों से एक हद तक अलग हो गए हैं. वो खु़द को भारतीय-अमरीकी समूह में शामिल नहीं करते हैं."
सीमा सिरोही के मुताबिक़,"वो कश्मीर को देखते हैं. बीते छह वर्षों के दौरान मुसलमानों के साथ कैसा व्यवहार किया गया है. इससे वे बहुत दुखी हैं. वो इस समूह से बाहर चले गए हैं. सिख अमरीकी भी समूह से बाहर जा रहे हैं. उनकी इस जनगणना में अलग तरह से गिनती होगी. तो अगले कुछ वर्षों में भारतीय-अमरीकियों में केवल हिंदू-अमरीकी ही रह जाएंगे."
सिख-अमरीकियों को 'अमरीका 2020 जनगणना' में एक अलग जातीय समूह के रूप में गिना जाएगा.
हाँलाकि भारतीय प्रवासी मंच 'इंडियास्पोरा' के संस्थापक एमआर रंगस्वामी ने ऐसे किसी भी ब्रेक-अप से इनकार किया.
वो कहते हैं"मैं हमेशा भारतीयों से मिलता हूं. कोई यह नहीं कह रहा है कि मैं एक सिख-अमरीकी हूं, या मैं एक हिंदू-अमरीकी, या मुसलमान-अमरीकी हूं."
अडप्पा प्रसाद का भी कहना है कि किसी बात को लेकर नज़रिया अलग-अलग हो, इससे भारतीय-अमरीकी पहचान प्रभावित नहीं होगी.

'पहले से मौजूद थी ये दरार'
एमहर्स्ट कॉलेज में प्रोफ़ेसर पवन ढींगरा का मानना है भारतीय अमरीकियों के बीच यह दरार हमेशा से रही है.
अमरीकी मूल के भारतीय होटल मालिकों पर एक क़िताब लिख चुके ढींगरा कहते हैं, "9/11 हमले के बाद, अमरीका में कई छोटे-मोटे हमले हुए हैं और मुसलमानों की हंसी उड़ाने जैसे वाकये हुए, इसमें दक्षिण एशिया लोग भी थे. भारतीय अमरीकी हिंदू हर वक्त उनके बचाव में नहीं आए और दावा किया कि ज़रूरी नहीं है हम सभी को एकजुटता के साथ एक दूसरे के साथ आना चाहिए. इसकी बजाए कुछ लोगों ने कहा कि हमारी तरफ मत देखो, हम हिंदू हैं, हम बुरे लोग नहीं हैं."
उन्होंने कहा, "80 के दशक में जब न्यूयॉर्क के न्यूजर्सी में 'डॉट बस्टर्स' का हमला हुआ था, तब ऐसा नहीं था कि उस इलाके के सभी भारतीय इसके ख़िलाफ़ मजबूती से एक साथ खड़े हुए थे. इसीलिए आज ये तनाव है. ये पहले से ही है."
डॉट का संबंध बिंदी से है जिसे हिंदू महिलाएं लगाती हैं. उस समय एक गिरोह हिंदू महिलाओं को निशाना बनाता था, उन्हें 'द डॉट बस्टर्स' कहा जाता था.
रशीद अहमद 1982 में एयरलाइंस से जुड़े प्रशिक्षण के लिए अमरीका पहुंचे. वो साल 2002 के गुजरात दंगों के बाद भारतीय मुसलमानों की वकालत करने वाली एक संस्था भारतीय अमरीकी मुस्लिम काउंसिल (आईएएमसी) के सह संस्थापक हैं.
आईएएमसी और हिंदू फ़ॉर ह्यूमन राइट्स, ग्लोबल इंडियन प्रोग्रेसिव अलायंस जैसी अन्य संस्थाओं ने पुलिस हिंसा और अल्पसंख्यकों के अधिकार को लेकर पीएम मोदी सरकार के ख़िलाफ़ अभियानों की अगुवाई की है.

बाबरी विध्वंस और गोधरा दंगों ने बढ़ाई दूरी
शिकागो में रहने वाले रशीद अहमद कहते हैं, "दरार की शुरुआत बाबरी मस्जिद विध्वंस के साथ शुरू हुई थी. इसने दरार को और भड़काया. इसने भारतीय-अमरीकी समुदाय को विभाजित कर दिया. कुछ इसके पक्ष में थे, कुछ सहानुभूतिपूर्ण थे, तो कुछ चुप थे."
1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुंबई में दंगे हुए जिनमें सैकड़ों लोग मारे गए और फिर मुंबई में बम ब्लास्ट हुए.
हैदराबाद के अहमद कहते हैं, "भारतीय-अमरीकी मुसलमानों ने कभी ख़ुद के मंच बनाने के बारे में नहीं सोचा. बाबरी विध्वंस को भारतीय मामले के रूप में देखा गया. यह महसूस किया गया कि ये अन्याय था. यह भारतीय संस्कृति के ख़िलाफ़ था लेकिन एक समाधान की उम्मीद थी. मगर फिर जब गुजरात में दंगे हुए तब अमरीकी मुसलमानों के एक वर्ग ने कहना शुरू कर दिया कि अब कुछ करना होगा."
अहमद बताते हैं, " साल 1992 में भारतीय अमरीकी मुसलमान समुदाय को भारतीय समाज, संस्थानों और भारतीय संस्कृति में बहुत अधिक विश्वास था. इसलिए बाबरी विध्वंस घटना को एक विसंगति के रूप में देखा गया. मामला अदालत में था और न्याय की उम्मीद थी लेकिन 2002 के दंगों ने इस विश्वास को हिला दिया."
दंगे में कई गुजराती परिवार प्रभावित हुए जो अमरीकी के कई शहरों में बसे हैं और उन्होंने दोस्तों और परिवारों को उन भयानक मंजरों को बयां किया.
'एसोसिएशन ऑफ़ इंडियन मुस्लिम्स इन अमरीका' के कलीम कवाज़ा बताते हैं हैं कि 2002 के दंगों के तनाव कम हो गए थे और कुछ वर्षों में ये ग़ायब हो जाते कि बीते पांच वर्षों में ये फिर से उभर गए हैं.
कानपुर के रहने वाले और आईआईटी खड़गपुर से पढ़े कवाज़ा कहते हैं, "जो उत्तर प्रदेश और दिल्ली में हो रहा है वो हर किसी को परेशान करता है. ये मेरे देश में क्या हो रहा है? मेरे शहर में क्या हो रहा है? उस शहर में क्या हो रहा है जहां मैं रहता हूं? लखनऊ, कानपुर और अन्य जगहों पर क्या हो रहा है?"
कवाज़ा कहते हैं कि तनाव 'हिंदुत्व के प्रभाव' में काम करने वाले इंडियन अमरीकन एसोसिएशन में साफ़ दिखता है.
वो कहते हैं, ''कुछ सामुदायिक कार्यक्रमों में जाना कुछ अमरीकी मुसलमानों को अच्छा नहीं लगता. या तो वो बिल्कुल ही नहीं जाते और अगर वो एक बार जाते भी हैं तो दोबारा नहीं जाते. यह दुखद है.''
कवाज़ा कहते हैं, ''भारतीय अमरीकी पहचान बहुत मज़बूत है और इसमें भारतीय मुसलमान बमुश्किल 20 फ़ीसदी होंगे. यह अब भारतीय अमरीकी हिंदू, भारतीय अमरीकी मुसलमानों में विभाजित हो रहा है, जैसा कि मैंने बीते कुछ वर्षों में देखा है."
पवन ढींगरा कहते हैं कि बीजेपी ने अमरीकी में ये विभाजन नहीं किया. लेकिन इसने ऐसे विभाजन का लाइसेंस निश्चित रूप से दिया है.
'एसोसिएशन ऑफ़ इंडियन मुस्लिम्स इन अमरीका' के कलीम कवाज़ा बताते हैं हैं कि 2002 के दंगों के तनाव कम हो गए थे और कुछ वर्षों में ये ग़ायब हो जाते कि बीते पांच वर्षों में ये फिर से उभर गए हैं.
कानपुर के रहने वाले और आईआईटी खड़गपुर से पढ़े कवाज़ा कहते हैं, "जो उत्तर प्रदेश और दिल्ली में हो रहा है वो हर किसी को परेशान करता है. ये मेरे देश में क्या हो रहा है? मेरे शहर में क्या हो रहा है? उस शहर में क्या हो रहा है जहां मैं रहता हूं? लखनऊ, कानपुर और अन्य जगहों पर क्या हो रहा है?"
कवाज़ा कहते हैं कि तनाव 'हिंदुत्व के प्रभाव' में काम करने वाले इंडियन अमरीकन एसोसिएशन में साफ़ दिखता है.
वो कहते हैं, ''कुछ सामुदायिक कार्यक्रमों में जाना कुछ अमरीकी मुसलमानों को अच्छा नहीं लगता. या तो वो बिल्कुल ही नहीं जाते और अगर वो एक बार जाते भी हैं तो दोबारा नहीं जाते. यह दुखद है.''
कवाज़ा कहते हैं, ''भारतीय अमरीकी पहचान बहुत मज़बूत है और इसमें भारतीय मुसलमान बमुश्किल 20 फ़ीसदी होंगे. यह अब भारतीय अमरीकी हिंदू, भारतीय अमरीकी मुसलमानों में विभाजित हो रहा है, जैसा कि मैंने बीते कुछ वर्षों में देखा है."
पवन ढींगरा कहते हैं कि बीजेपी ने अमरीकी में ये विभाजन नहीं किया. लेकिन इसने ऐसे विभाजन का लाइसेंस निश्चित रूप से दिया है.

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क्या अमरीकी सिख अलग जा रहे हैं?
सिखों पर बढ़ते 'हेट क्राइम' (नफ़रत भरे हमलों) का हवाला देकर 11 सितंबर 2001 से ही सिखों को एक अलग जातीय समूह के रूप में पहचान देने की मांग चल रही है.
अब 2002 की अमरीकी जनगणना में उनकी एक अलग जातीय समूह के रूप में गिनती होगी. इसने कुछ चिंताएं भी भड़काई हैं. जैसे कि ये सिख अलगाववादी आकांक्षाओं को बढ़ावा दे सकती है.
इस अभियान को बढ़ावा देने वाले यूनाइटेड सिख के वंदा सांचेज़ डे कहते हैं, "सिखों की अलग समुदाय के रूप में गणना से बड़े भारतीय समुदाय के मताअधिकारों में असर नहीं डालेगा और इससे भारत में भी राजनीतिक मुद्दों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा.
वो कहते हैं, "सिर्फ इसलिए कि कोई लिखता है कि वो सिख हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि वह भारतीय होने से अलग हैं अगर वह उसका मूल देश है."
पंजाब फाउंडेशन के अध्यक्ष सुखी चहल का तर्क है कि सिख संगठनों को 'पंजाबी' भाषा के लिए अलग कोडिंग की वकालत करनी चाहिए थी, न कि अलग सिख जातीय समूह के रूप में.

इस दरार का क्या असर होगा?
परंपरागत रूप से सिखों को एशियाई भारतीय के रूप में यहां वर्गीकृत किया गया है.
वर्षों से अभियान चलाने वालों ने 11 सितंबर 2001 से बाइडन और ट्रंप दोनों ने हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों को लुभाने के लिए अभियान चलाए हैं. वो भारतीय अमरीकी समुदाय के लिए संदेश दे रहे हैं.
पवन ढींगरा कहते हैं, "मैं इस बात से बहुत चिंतित नहीं हूं कि भारतीय अमरीकी पहचान या एकजुटता या रिश्तों में दरार लाने के लिए किस तरह के माइक्रो-टारगेट किए जा रहे हैं."
भारतीय प्रवासी मंच इंडियास्पोरा ने हाल ही में 260 भारतीय अमरीकियों के बीच हुए एक सर्वे के नतीजे में कहा है कि 65 फ़ीसदी भारतीय जो बाइडन का समर्थन कर रहे हैं जबिक 28 फ़ीसदी ट्रंप के पक्ष में हैं.
'ट्रंप विक्ट्री इंडियन अमरीकन फ़ाइनेंस कमिटी' के सह अध्यक्ष अल मेसन का मानना है कि ट्रंप के प्रति झुकाव 50 फ़ीसदी तक हो सकता है. अगर यह सच है तो यह डेमोक्रेट से दूर एक बड़ा स्विंग होगा.
ऑफ़बीजेपी-यूएसए अदप प्रसाद इसे अच्छा संकेत बताते हुए कहते हैं, "किसी भी समुदाय को किसी एक ही पार्टी का समर्थन करना चाहिए."
प्रमिला जयपाल जैसे डेमोक्रेट्स ट्रंप की ओर झुकाव की वजह कश्मीर और एनआरसी पर पीएम मोदी के कामों की आलोचना करने को बताते हैं.
पवन ढींगरा पूछते हैं, "मेरा सवाल यह है कि आप किसी ऐसे व्यक्ति के लिए वोट क्यों डालेंगे जिसने कई अलग तरह से लोगों के ख़िलाफ़ पूर्वाग्रहों का एक मंच तैयार किया हुआ है. क्या यह इस वजह से है कि आप उन पूर्वाग्रहों से सहमत हैं? क्या यह आर्थिक योजना के कारण है? क्या ऐसा इसलिए है कि आप कुछ खास समूहों के प्रति उन आक्रोशों को भी साझा करते हैं. इससे मैं चिंतित हूं."
आलोचक ट्रंप को 'नस्लवादी' और 'ज़ेनोफ़ोबिक' कहते हैं, जिनकी मुस्लिम बहुल देशों के लोगों के लिए अमरीकी सीमा को बंद करने की नीति की तीखी आलोचना की गई है.
लेकिन हाउडी मोदी इवेंट और राष्ट्रपति ट्रंप के भारत दौरे के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने कई भारतीय-अमरीकीयों, खासकर हिंदुओं को आश्वस्त किया है कि राष्ट्रपति ट्रंप भारत समर्थक हैं.
अल मेसन कहते हैं, "2019 में जब कश्मीर को लेकर दुनिया पीएम मोदी के ख़िलाफ़ थी, दुनिया भर के नेता पीएम मोदी की आलोचना कर रहे थे. ख़ुद मोदी की विपक्षी पार्टी इसका विरोध कर रही थी तो ये ट्रंप थे जो उनके साथ खड़े हुए."
वो कहते हैं, "वो हाउडी मोदी इवेंट में गए और कश्मीर के मुद्दे पर एक बार भी कुछ नहीं बोले. उन्होंने भारत के आंतरिक मसले पर कभी हस्तक्षेप नहीं किया. कश्मीर हर भारतीय अमरीकियों की संवेदनाओं और भावनाओं से जुड़ा विषय है.
ट्रंप के प्रति भारतीय-अमरीकियों के बदले रुख का एक मुख्य कारण कश्मीर मुद्दा है.

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अगली पीढ़ी की उम्मीद
ऑफ़बीजेपी-यूएए के अदप प्रसाद भारतीय अमरीकी समुदाय में मतभेदों को दूर करने के पक्षधर हैं.
आईएएमसी के राशिद अहमद को उम्मीद है कि भारतीय अमरीकियों की अलगी पीढ़ी के सत्ता संभालने के बाद स्थिति में सुधार होगा.
वो कहते हैं, "जब वो बड़े होंगे, उनके पास एक वैश्विक दृष्टि होगी. उनके उदारवादी होने की संभावना है."
भारतीय अमरीकियों की अगली पीढ़ी के अधिकांश लोगों को डेमोक्रेट्स का पक्ष में माना जाता है और वे अपने माता-पिता के राजनीतिक विचारों को चुनौती देने वाले हैं.
इंडियास्पोरा के संस्थापक एमआर रंगस्वामी कहते हैं, "ट्रंप को सुनने वाले अधिकतर वो पुराने लोग हैं जिनका जन्म भारत में हुआ है. भारत और अमरीका के बारे में दिये ट्रंप के संदेश से उनका जुड़ाव ज़्यादा होता है. दूसरी तरफ़, युवा पीढ़ी का जुड़ाव अमरीकी मुद्दों से ज़्यादा होता है."
इलयास मोहम्मद कहते हैं, "मैं भले ही लंबे समय से अमरीका में रह रहा हूं लेकिन मेरे अंदर भारतीयता मौजूद है. हमारे लोगों के प्रति प्यार कभी ख़त्म नहीं होगा, मरते दम तक नहीं."
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