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"मेरी बेटी पूछ रही थी,डैडी क्या हम मरने वाले हैं?"
तालिबशाह हुसैनी ने अपनी तीनों बेटियों को थामा, अपनी बीमार पत्नी की मदद की और भाग पड़े.
ज़रूरत से ज्यादा भीड़ वाले विशालकाय मोरिया कैंप में हर तरफ आग लगी थी.
वे जाग रहे थे और दूरी से मामूली लग रही आग पर नज़र बनाए हुए थे.
अफ़ग़ानिस्तान के इस 37 साल के आर्टिस्ट ने तब इसे पास जाकर देखने का फैसला किया.
उन्होंने आसपास के परिवारों को अलर्ट देने की सलाह दी, लेकिन जब वे अपने टेंट वापस लौटे तो वहां भगदड़ मची हुई थी.
वे बताते हैं, "यह बहुत भयानक था. मेरी छोटी सी बेटी रो रही थी और पूछ रही थी कि डैडी क्या हम मरने वाले हैं?"
पिछले हफ़्ते ग्रीस के टापू लेसबोस में स्थित इस कैंप में भयंकर आग लग गई जिसने हर चीज़ को राख में बदल दिया.
बेघर और असहाय
हुसैनी का परिवार झाड़ियों से होकर भागा, उन्होंने बाड़ लांघी और अगले 90 मिनट तक तब तक चलते रहे जब तक कि वे सुरक्षित जगह पर नहीं पहुंच गए.
उन्होंने पूरी रात खुले में हजारों शरणार्थियों और प्रवासियों के साथ एक कार में गुज़ारी.
वे कहते हैं, "मेरी बेटी मुझसे पूछ रही थी कि डैड हमें ठंड लग रही है. हम यहां क्यों हैं, हमें क्या होगा? लेकिन, मेरे पास इनमें से किसी सवाल का कोई जवाब नहीं था."
वे कहते हैं कि अपने परिवार को तालिबान से बचाने के लिए 2019 में जब से उन्होंने अफगानिस्तान छोड़ा है तब से वे मौत को मात देते आ रहे हैं.
उन्हें मोरिया कैंप में आए हुए नौ महीने और पांच दिन हो चुके हैं.
कैंप में 3,000 प्रवासी होने चाहिए, लेकिन इसमें पूरी दुनिया से 13,000 से ज्यादा लोग मौजूद हैं.
इसमें 70 देशों के नागरिक हैं, लेकिन ज्यादातर लोग अफ़ग़ानिस्तान से हैं.
परेशान करने वाला
हुसैनी कहते हैं कि इस बार मोरिया में यह घटना उनके जीवन की सबसे बुरी घटना रही है.
उन्होंने चाकुओं से जख्मी एक गर्भवती महिला को मरते देखा. उन्होंने लूटपाट और चोरी की घटनाओं का सामना किया.
उन्होंने कहा, "मैं रातों तक सो नहीं पाया. मुझे डर था कि लोग मेरे टेंट में घुस सकते हैं और मुझे मार सकते हैं या मेरे परिवार पर हमला कर सकते हैं."
महीनों से वे एक छोटे से कैंपिंग टेंट में अपनी तीन बेटियों और पत्नी के साथ रह रहे हैं. उनकी पत्नी किडनी की मरीज हैं.
तकरीबन एक महीना पहले, बार-बार अनुरोध करने के बाद उन्हें एक अन्य परिवार के साथ साझा करने के लिए एक बड़ा टेंट दिया गया.
"हम अपने नए टेंट से बाहर निकले ही थे कि इसमें आग लग गई. अगर हम बाहर नहीं निकले होते तो हम सब भी आग में घिर जाते."
भागने के लिए मजबूर
लगातार संघर्ष के बावजूद अफगानिस्तान में एक समृद्ध जिंदगी के बाद उनका एक लंबा सफर रहा है.
हुसैनी उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान में फरयाब नेशनल थिएटर के एक अहम सदस्य थे.
अपने गृह कस्बे में वे एक सेलेब्रिटी की तरह से थे. वे उपहास उड़ाने वाले आर्टिस्ट के तौर पर टीवी शोज में आते थे और उनमें वे सामाजिक और राजनीतिक मसलों पर बात करने के साथ ही चरमपंथ की आलोचना भी करते थे.
2009 में उनकी शादी हुई और उनके तीन बेटियां- फारिमा (9), पारिसा (7) और मरजान (4) हुईं.
उनकी पत्नी एक ब्यूटी पार्लर में काम करती थीं और उनकी जिंदगी में तब तक कोई मुश्किल नहीं थी जब तक उन्होंने तालिबान की आलोचना नहीं की थी. एक शो में उन्होंने तालिबान की आलोचना की और अफ़ग़ान मिलिटरी की तारीफ की.
इसके बाद उन्हें स्थानीय मुल्ला और तालिबान की तरफ से धमकियां मिलने लगीं.
उन्होंने कहा, "मुझे अपने देश से प्यार है और मैं अपने देश और सरकार के लिए काम करना चाहता था, लेकिन जब मेरी जिंदगी खतरे में थी तब उन्होंने मेरी कोई मदद नहीं की."
अफ़ग़ानिस्तान में दशकों से जारी हिंसा में उन्हें अपने पिता, दो भाइयों और एक भतीजे को खोना पड़ा है.
कई देशों से गुजरते हुए उनके परिवार ने यूरोप तक की यात्रा की है. उनकी बड़ी बेटी ने इस सफर में कई भाषाओं को सीखने की कोशिश की है.
हुसैनी अपनी बुद्धिमान बेटी पर गर्व करते हैं, लेकिन वे उसे लेकर चिंतित भी हैं.
"जब हमने देश छोड़ा उस वक्त वह चौथी कक्षा में थी. वह कहती है कि 'डैडी में आपको पसंद नहीं करती क्योंकि आपकी वजह से मेरा स्कूल छूट गया है, मैं खुश नहीं हूं.'"
अफरातफरी और अनिश्चितता
उनके लिए जीने का संघर्ष है और ग्रीक अधिकारी इन बेघर लोगों को मदद देने की कोशिश कर रहे हैं.
हुसैनी को गुरुवार की सुबह खाना बांटने वाली एक वैन दिखी, लेकिन वहां ऐसे हालात थे कि वैन का ड्राइवर इससे घबरा गया और चला गया.
वे कहते हैं, "लोगों को कुछ भी नहीं मिल पाया. रात में बहुत सर्दी होती है और उन्हें खुद को कवर करने के लिए भी कुछ नहीं मिलता."
दिन के दौरान तेज़ धूप होती है और लोगों के पास कहीं छायादार जगह नहीं होती है.
हुसैनी कहते हैं कि उन्हें यहां इतनी दिक्कतें हुई हैं कि वे अब कोई बड़ा फैसला करने के बारे में सोच रहे हैं.
वे कहते हैं, "मेरी सबसे बड़ी बेटी की नाक में चोट है. यहां न पानी है, न खाना है, न ही टॉयलेट है और न ही डॉक्टर हैं. मुझे मानसिक परेशानियां हैं और मुझे नहीं पता कि क्या किया जाए. मैं बेहद निराश हूं."
"मैं अब और नहीं झेल सकता. अगर वे हमें शरण नहीं दे सकते हैं तो हमें यहां से निकाल दें."
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