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अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव से जुड़ी वो बातें जो आपको पता होनी चाहिए
अमरीका में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होने में 100 दिन से भी कम का वक्त रह गया है. चुनावों के नतीजों में यह भी मुमकिन हो सकता है कि जिसे आम लोगों के सबसे ज्यादा वोट मिलें उसे जीत हासिल न हो.
ऐसा इस वजह से है क्योंकि राष्ट्रपति को वोटर सीधे नहीं चुनते, बल्कि यह चीज इलेक्टोरल कोलाज के ज़रिए तय होती है.
तो फिर अमरीकी किसे वोट देते हैं?
जब अमरीकी लोग राष्ट्रपति चुनावों में वोट देने जाते हैं तो वे वास्तव में अधिकारियों के एक समूह को वोट देते हैं जो कि इलेक्टोरल कॉलेज बनाते हैं.
"कॉलेज" शब्द का मतलब ऐसे लोगों के समूह से है जो एक तरह के काम से जुड़े हुए होते हैं. ये लोग इलेक्टर्स होते हैं और इनका काम राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति को चुनना होता है.
इलेक्टोरल कॉलेज की मुलाक़ात हर चार साल में चुनाव के दिन के कुछ हफ्तों बाद होती है ताकि इस काम को अंजाम दिया जा सके.
इलेक्टोरल कॉलेज किस तरह से काम करता है?
हर राज्य से इलेक्टर्स की संख्या मोटे तौर पर उस राज्य की आबादी के अनुपात में होती है.
कुल इलेक्टर्स की संख्या 538 है.
कैलिफोर्निया में सबसे ज्यादा 55 इलेक्टर हैं. जबकि व्योमिंग, अलास्का और उत्तरी डेकोटा जैसे कुछ राज्यों में इन इलेक्टर्स की संख्या न्यूनतम तीन है.
हर इलेक्टर एक इलेक्टोरल वोट का प्रतिनिधित्व करता है और किसी भी उम्मीदवार को राष्ट्रपति की सीट जीतने के लिए 270 या उससे ज्यादा वोटों की जरूरत होती है.
आमतौर पर, राज्य अपने सभी इलेक्टोरल कॉलेज वोटों को उसी को दे देते हैं जिसे राज्य में आम वोटरों ने जिताया हो.
मिसाल के तौर पर, अगर रिपब्लिकन उम्मीदवार को टेक्सस में 50.1 फीसदी वोट के साथ जीत हासिल हुई है तो वे उन्हें राज्य के सभी 38 इलेक्टोरल कॉलेज वोट दे दिए जाएंगे.
केवल दो राज्य (माइन और नेब्रास्का) ऐसे हैं जो कि अपने इलेक्टोरल कॉलेज को अपने वोटरों द्वारा हर कैंडिडेट को दिए गए वोटों के हिसाब से बांटते हैं.
इसी वजह से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार खास "स्विंग स्टेट्स" को टारगेट करते हैं. ये ऐसे राज्य होते हैं जहां वोट किसी भी ओर जा सकते हैं. इसी वजह से उम्मीदवार देशभर में ज्यादा से ज्यादा वोट हासिल करने की कोशिश नहीं करते हैं.
ये उम्मीदवार जितने राज्य जीतते जाते हैं वे उन्हें जरूरत के 270 इलेक्टोरल कॉलेज वोटों के नजदीक ले जाते हैं.
क्या ऐसा हो सकता है कि लोगों के ज्यादा वोट आपको मिलें फिर भी आप राष्ट्रपति न बन पाएं?
हां, ऐसा हो सकता है.
ऐसा उन उम्मीदवारों के साथ हो सकता है जो कि देशभर में वोटरों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय हों, लेकिन वे 270 इलेक्टोरल वोट हासिल करने के लिए पर्याप्त राज्यों को नहीं जीत पाएं.
असलियत यह है कि पिछले पांच चुनावों में से दो में ऐसे उम्मीदवार जीते हैं जिन्हें उनके प्रतिस्पर्धी के मुकाबले आम लोगों के कम वोट मिले थे.
2016 में डोनाल्ड ट्रंप को हिलेरी क्लिंटन के मुकाबले तकरीबन 30 लाख वोट कम मिले थे, लेकिन वे राष्ट्रपति बन गए क्योंकि इलेक्टोरल कॉलेज ने उन्हें बहुमत दिया था.
2000 में जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने 271 इलेक्टोरल वोट जीते थे, हालांकि, डेमोक्रेट उम्मीदवार अल गोर को आम लोगों से 5 लाख ज्यादा वोट मिले थे.
केवल तीन और ऐसे राष्ट्रपति हुए हैं जो कि आम लोगों के ज्यादा वोट न हासिल करने के बावजूद जीते. ये सभी 19वीं शताब्दी में हुए थे. ये जॉन क्विंसी एडम्स, रदरफोर्ड बी हायेस और बेंजामिन हैरिसन थे.
यह सिस्टम क्यों बनाया गया था?
जब 1787 में अमरीकी संविधान तैयार हो रहा था, तब आम लोगों के वोटों में जीतने वाले को राष्ट्रपति बनाया जाना प्रैक्टिकल रूप से असंभव था. ऐसा देश के आकार और कम्युनिकेशन की मुश्किल के चलते था.
साथ ही, वॉशिंगटन डीसी में सांसदों को राष्ट्रपति के चुनने की इजाजत देने को लेकर उत्साह न के बराबर था.
ऐसे में संविधान बनाने वालों ने इलेक्टोरल कॉलेज खड़ा किया. इसमें हर राज्य इलेक्टर चुनता है.
छोटे राज्यों ने इस सिस्टम को पक्ष लिया क्योंकि इससे उन्हें राष्ट्रपति तय करने में राष्ट्रीय पॉपुलर वोट के मुकाबले अपनी आवाज ज्यादा दमदार तरीके से रखने को मिलती है.
इलेक्टोरल कॉलेज दक्षिणी राज्यों का भी पसंदीदा था. इन जगहों पर आबादी में दासों की बड़ी संख्या थी. भले ही पहले दास वोट नहीं करते थे, लेकिन उन्हें अमरीकी जनगणना में गिना जाता था. हालांकि, इनकी गिनती एक शख्स के तीन बटा पांच शख्स के तौर पर होती थी.
चूंकि, इलेक्टोरल वोटों की संख्या राज्य की आबादी के आकार के हिसाब से तय होती थी, ऐसे में दक्षिणी राज्यों का राष्ट्रपति चुनने में ज्यादा दखल होता था. यह चीज तब नहीं होती अगर सीधे आम लोगों के वोटों के जरिए राष्ट्रपति को चुना जाता.
क्या इलेक्टर्स को जीतने वाले उम्मीदवार को वोट देना होता है?
कुछ राज्यों में इलेक्टर्स अपनी पसंद के मुताबिक किसी को भी वोट दे सकते हैं. लेकिन, असलियत यह है कि इलेक्टर्स तकरीबन हमेशा उस उम्मीदवार को वोट देते हैं जिसे उनके राज्य में सबसे ज्यादा वोट मिले होते हैं.
अगर कोई इलेक्टर उस राज्य के राष्ट्रपति की पसंद के खिलाफ वोट करता है तो उन्हें "आस्थाहीन" कहा जाता है.
अगर किसी उम्मीदवार को बहुमत न मिले तो?
अमरीकी संसद का निचला सदन, हाउस ऑफ रेप्रेजेंटेटिव्स तब वोट देकर राष्ट्रपति का चुनाव करता है.
ऐसा केवल एक बार हुआ है. 1824 में चार उम्मीदवारों में इलेक्टोरल वोट बंट गए थे. इस तरह से किसी को भी बहुमत नहीं मिला था.
दो पार्टियों के अमरीकी सिस्टम पर दबदबा रखने के चलते आज के दौर में ऐसा होना मुश्किल है.
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