वियतनाम युद्ध पर बनी नई फ़िल्म में सबसे अलग क्या है?

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- Author, कलीम आफ़ताब
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
निर्देशक स्पाइक ली की नई फ़िल्म 'दा 5 ब्लड्स' वियतनाम युद्ध पर अलग तरह की फ़िल्म है.
यह चार अफ्रीकी-अमरीकी पूर्व सैनिकों की कहानी है, जिनकी भूमिका रोल डेलरॉय लिंडो, क्लार्क पीटर्स, इसियाह व्हाइटलॉक जूनियर और नॉर्म लेविस ने निभाई है.
वे दशकों बाद वियतनाम लौटते हैं और अपने पूर्व साथी (चैडविक बोसमैन) के शव की तलाश करते हैं. उनको सोने की छड़ों का खज़ाना मिलता है, जिसका इस्तेमाल अमरीका अपने दक्षिण वियतनामी साथियों को भुगतान करने के लिए करता था.
ली ने दिखाया है कि अश्वेत सैनिकों के साथ किस तरह का भेदभाव होता था और युद्ध में उनके योगदान की कैसे अनदेखी की जाती थी.
फ्लैशबैक में ली ने यह भी दिखाया है कि अमरीका में नस्लीय पूर्वाग्रह के इतिहास को वियतनाम ने भी भुनाया था.
उन्होंने अमरीका में नागरिक अपराधों और मार्टिन लूथर किंग जैसे अश्वेत नेताओं की हत्या के बारे में पर्चे गिराए थे और अमरीका के काले सैनिकों को युद्ध न करने के लिए मनाने की कोशिश की थी.
स्क्रिप्ट बदलकर बनाई फ़िल्म
ली को जब इस फ़िल्म की स्क्रिप्ट मिली थी तब यह चार गोरे पूर्व सैनिकों की कहानी थी जो मूल रूप से ओलिवर स्टोन के निर्देशन के लिए लिखी गई थी.
ली ने अपने सह-पटकथा लेखक केविन विलमॉट जूनियर के साथ इसके पात्र और कहानी बदल दिए.
फ़िल्म महान मुक्केबाज़ मुहम्मद अली के फ़ाइल फुटेज से शुरू होती है. 1978 में अली ने कैमरे पर कहा था कि उन्होंने वियतनाम में लड़ने से क्यों मना किया- "(उन्होंने) कभी मुझ पर कुत्ते नहीं छोड़े, उन्होंने कभी मुझसे मेरी राष्ट्रीयता नहीं छीनी..."
एक दशक पहले, अली को युद्ध में जाने से इंकार करने पर 5 साल जेल की सज़ा सुनाई गई थी और उनके हेवीवेट टाइटल और बॉक्सिंग लाइसेंस रद्द कर दिए गए थ.
ली ने फ़ैसले को चुनौती दी तो उनको जेल नहीं जाना पड़ा. 1971 में आख़िरकार सुप्रीम कोर्ट ने अली के पक्ष में फ़ैसला सुनाया था.
दो मोर्चों पर लड़ाई

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अली के शब्दों से शुरू होने वाले मोंटाज़ में कुछ तस्वीरें दिखती हैं- वियतनाम युद्ध में लड़ने वाले अफ्रीकी-अमरीकी सैनिक, चांद पर उतरते नील आर्मस्ट्रांग, भाषण देते हुए मैल्कम एक्स, 1968 के मेक्सिको ओलंपिक के मेडल पोडियम पर मुट्ठी बांधे टॉमी स्मिथ और जॉन कार्लोस, हार्लेम की गरीबी की तस्वीरें और अंत में नागरिक अधिकार कार्यकर्ता क्वेम टूर (स्टोकली कारमाइकल) का भाषण- "अमरीका ने अश्वेत लोगों के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ दिया है."
इसके बाद संभवतः सबसे ताक़तवर साउंड बाइट आती है जिसमें दार्शनिक एंजेला डेविस कहती हैं, "वियतनाम में जो हो रहा है और जो यहां पर हो रहा है उसमें अगर संबंध नहीं जोड़ा गया तो हम ज़ल्द ही पूर्ण फासीवाद का दौर देखेंगे."
ली ने यह सीक्वेंस इसलिए तैयार किया क्योंकि वियतनाम युद्ध पर अपनी कहानी दिखाने से पहले वह लोगों को याद दिलाना चाहते थे कि 1960 और 1970 के दशक में अमरीका में क्या हो रहा था.
अली ने कहा था, "वियतनाम में एक युद्ध हो रहा था और एक युद्ध यहां अमरीका में भी हो रहा था."
अली उन लोगों में शामिल थे जो कह रहे थे कि वियतनाम के कम्युनिस्ट उन्हीं साम्राज्यवादी ताक़तों से लड़ रहे हैं जो अफ्रीकी-अमरीकी लोगों की भी दुश्मन है.
यह फ़िल्म ऐसे समय आई है जब एक पुलिस अधिकारी पर अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या का आरोप लगा है और पूरे अमरीका की सड़कों पर प्रदर्शन हो रहे हैं.
कुछ लोग कह सकते हैं कि फ़िल्म के मोंटाज़ में दिख रहा अमरीका आज से बिल्कुल अलग नहीं है.
जिस दिन मैंने ली से 'दा 5 ब्लड्स' के बारे में बात की उससे एक दिन पहले उन्होंने इंस्टाग्राम पर एक शॉर्ट फ़िल्म '3 ब्रदर्स' डाली थी.
यह फ़िल्म 2014 में न्यूयॉर्क सिटी में एरिक गार्नर की मौत और पिछले महीने मिनेपोलिस में जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के रियल फुटेज और 1989 की उनकी लैंडमार्क फ़िल्म 'डू द राइट थिंग' के दृश्यों को मिलाकर बनाई गई है.
इस समय 'दा 5 ब्लड्स' के रिलीज़ पर ली कहते हैं, "हो सकता है कि यह ऊपर वाले की योजना हो. मैं इस पर सोचने में बहुत ज़्यादा समय ख़र्च नहीं करूंगा कि ऐसा क्यों हुआ."
"जिन चीज़ो पर आपका कोई वश नहीं होता उनको स्वीकार करना होगा. लेकिन मुझे ख़ुशी है कि यह फ़िल्म अभी आ रही है, क्योंकि इसमें ऐसा बहुत कुछ है जो आज हो रही चीज़ों के बारे में कहता है."
युद्ध के फ्लैशबैक दृश्यों में ली उन्हीं अभिनेताओं का इस्तेमाल करते हैं लेकिन उनकी उम्र नहीं घटाते. यह फ़ैसला इस विचार को पुष्ट करता है कि हमारा इतिहास हमारे वर्तमान का हिस्सा होता है.
व्यक्ति के रूप में और देश के रूप में हम अपने अतीत होते हैं. यह बर्तोल्त ब्रेख्त की फ़िल्म निर्माण शैली है जो याद दिलाती रहती है कि कहानी की हमारे वर्तमान में सामाजिक प्रासंगिकता है.
अश्वेत सैनिकों को कैसे हाशिए पर किया गया

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वियतनाम से अमरीकी सैनिकों की वापसी के 40 साल से अधिक वर्षों में 'दा 5 ब्लड्स' पहली ऐसी फ़िल्म होने का दावा कर सकती है जो अफ्रीकी-अमरीकी पूर्व सैनिकों के अनुभव पर केंद्रित है.
दशकों तक उन्हें युद्ध फ़िल्मों की मुख्य थीम से अलग रखा गया, जबकि 1967 में वियतनाम में लड़ रहे अमरीकी सैनिकों में 23 फीसदी सैनिक अश्वेत थे और 1965 में युद्ध में मारे गए कुल अमरीकी सैनिकों का चौथाई हिस्सा अश्वेतों का था.
जॉन वेन की फ़िल्म 'द ग्रीन बेरेट्स' (1968) के बाद की फ़िल्मों को देखें तो आपको अफ्रीकी-अमरीकी अनुभव शायद ही कभी दिखेगा.
वियतनाम की कहानी आम तौर पर गोरे अमरीकी सैनिक के नज़रिये से ही दिखाई गई है और उन्हीं के तजुर्बों को अहमियत दी गई है.
युद्ध की कहानी का यह रंग-रोगन सिर्फ़ वियतनाम की फ़िल्मों के साथ नहीं हुआ है.
ली बचपन में अपने भाई के साथ टीवी पर दूसरे विश्व युद्ध की फ़िल्में देखा करते थे. तब उनके पिता बताते थे कि दूसरे विश्व युद्ध में काले सैनिक लड़े थे.
सिनेमाई इतिहास ऐसी युद्ध फ़िल्मों से भरा है जो गोरे नायकों को बड़ा बनाती हैं. पिछले दो साल की ही बड़ी युद्ध फ़िल्मों को देखने से इसका अंदाज़ा हो जाता है.
उदाहरण के लिए, क्रिस्टोफर नोलन की फ़िल्म डनकर्क (2017) को लीजिए. लेखिका और शिक्षाविद् सनी सिंह ने इस फ़िल्म के बारे में एक लेख लिखा था 'डनकर्क में भारतीय और अफ्रीकी चेहरों की कमी क्यों मायने रखती है'. इसमें उन्होंने फ़िल्म को ऐतिहासिक फ़िल्म की जगह काल्पनिक फ़िल्म कहा था.
नोलन ने फ़िल्म में रॉयल इंडियन आर्मी सर्विस कोर का जिक्र भी नहीं किया था जबकि वे सैन्य आपूर्ति की अहम जिम्मेदारी संभाल रहे थे.
लश्कर में दक्षिण एशिया और पूर्वी अफ्रीका के सैनिक थे जो ब्रिटिश जहाजों के नाविक दल का चौथाई हिस्सा थे. फ्रांस की सेना की नॉर्थ अफ्रीकी ट्रूप्स में भी उनकी बड़ी तादाद थी.
सनी सिंह ने लिखा है, "लोकप्रिय संस्कृति अतीत, वर्तमान और भविष्य के बारे में हमारी कल्पनाओं को इतिहास की किताबों और स्कूली पाठों से ज़्यादा आकार देती है."

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युद्ध फ़िल्मों में नस्लीय उन्मूलन की परंपरा का नतीजा यह है कि जब कोई फ़िल्म निर्माता सही काम कर रहे हों तब भी आलोचक उसे झूठ कहकर खारिज कर देते हैं.
इसका सबसे हालिया उदाहरण बड़बोले ब्रिटिश अभिनेता लॉरेंस फ़ॉक्स का है जब उन्होंने पहले विश्व युद्ध पर सैम मेंडेंस की फ़िल्म '1917' में एक सिख सैनिक की भूमिका की आलोचना की थी.
इसके लिए 'स्पेक्टेटर' में हरदीप सिंह ने फ़ॉक्स पर व्यंग्य किया था, "उन्होंने विश्व युद्ध में सिख सैनिकों के योगदान को सामने लाने के लिए जितना कुछ किया उतना करने के बारे में ज़्यादातर सिख अपनी पूरी ज़िंदगी और अगले जनम में बस सोच सकते हैं."
ली ने 2008 में दूसरे विश्व युद्ध पर जेम्स मैकब्राइड के उपन्यास 'मिरैकल एट सेंट एना' पर फ़िल्म बनाकर इसमें संतुलन बनाने की कोशिश की थी. यह फ़िल्म 92वीं इंफैंट्री डिविजन पर थी जिसमें सिर्फ़ अश्वेत सैनिक थे जिनको बफैलो सोल्जर कहा जाता था.
वियतनाम फ़िल्मों के आलोचक
'दा 5 ब्लड्स' मनोरंजक और जटिल फ़िल्म है. वियतनाम पर बनी फ़िल्मों में इसकी अपनी जगह है और यह पहले बनी फ़िल्मों की आलोचना करती दिखती है.
शुरुआती दृश्यों में एक क्लब का सीन जिसका नाम 'अपोकैलिप्स नाउ' है. फ्रांसिस फ़ोर्ड कोप्पोला ने इसी नाम पर फ़िल्म बनाई थी.
ली ने ऐसा करके कोप्पोला की फ़िल्म को श्रद्धांजलि दी है क्योंकि उन्होंने फ़िल्म में दो अफ्रीकी-अमरीकी सैनिकों को शामिल किया था जिनका रोल लॉरेंस फ़िशबर्न (जो उस समय 14 साल के थे) और अल्बर्ट हॉल ने निभाया था.
ये पात्र फ़िल्म के नायकों से बहुत दूर थे. लेकिन इस फ़िल्म ने यह दिखाया था कि युद्ध में अफ्रीकी-अमरीकी सैनिकों के मारे जाने की संभावना ज़्यादा थी.
डो लंग ब्रिज बैटल के सीन में मोर्चे पर लड़ रहे सभी सैनिक अश्वेत हैं, जो यह बताते हैं कि अफ्रीकी-अमरीकी सैनिक बड़ी संख्या में अगले मोर्चे पर भेजे गए थे और वे मारे गए थे.
निश्चित रूप में जहां तक नस्ल की बात है, कोप्पोला की फ़िल्म सबसे मशहूर वियतनाम फ़िल्म 'द ग्रीन बेरेट्स' से बहुत आगे है.
'द ग्रीन बेरेट्स' एकमात्र ऐसी फ़िल्म है जो युद्ध के दौरान ही बनाई गई थी. कर्नल किर्बी (वेन) और उनके साथी सैनिक अमरीका में अपने प्रशिक्षण केंद्र से वियतनाम भेजे जाते हैं.
यह फ़िल्म सरकारी मदद से बनाई गई थी और इसे प्रोपेगेंडा कहा गया था. इसमें सिर्फ़ एक अश्वेत पात्र था- डॉक्टर मैकगी (रेमंड सेंट जैक्स) जिनकी देशभक्ति को सराहनीय बताया गया था.
इसमें दक्षिणी वियतनाम के साथियों और उत्तरी वियतनाम के दुश्मनों को एक समान अमानवीय और पूर्वी एशिया के लोगों को पश्चिमी मूल्यों का दुश्मन दिखाया गया था.
1980 के दशक में ओलिवर स्टोन की 'प्लाटून' 'अपोकैलिप्स नाउ' के नक्शेकदम पर चली. इसमें अमरीकी सैनिकों के नस्लीय विभाजन को चित्रित किया गया. इसमें गोरे सैनिक शराब पीते थे और काले सैनिक मारिजुआना.
स्टोन ने नस्ल और वर्ग के मुद्दे को फिल्माया लेकिन अश्वेत सैनिकों को गोरे सैनिकों के नज़रिये से ही दिखाया गया. वियतनामियों का चित्रण और भौंडा था.
'प्लाटून' से लेकर स्टैनली कुब्रिक की 'फुल मेटल जैकेट' (1987) तक एक भी 'क्लासिक' वियतनाम युद्ध फ़िल्म को याद करना मुश्किल है जिसमें एशियाई महिलाओं को सेक्स वर्कर और वियतनाम के लोगों को बर्बर न दिखाया गया हो.
सिर्फ़ एक फ़िल्म इससे अलग है- 'गुड मॉर्निंग, वियतनाम' जो सशस्त्र सेना रेडियो सर्विस के डीजे एड्रियन क्रोनौर की ज़िंदगी पर आधारित है.
1987 में रिलीज़ हुई इस फ़िल्म ने वियतनामी पात्रों के अपने जीवन, परिवार, दोस्त और प्रेमियों को दिखाया.
गोरों की श्रेष्ठता के साधन?

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सबसे लोकप्रिय, मगर सबसे बुरा उदाहरण रीगन के समय की फ़िल्में हैं जिसमें गोरों की श्रेष्ठता साबित करने के लिए युद्ध को जीत की कहानी में बदलने कोशिश की गई.
एक्शन हीरो चक नॉरिस (मिसिंग इन एक्शन) और सिल्वेस्टर स्टेलोन (रैंबो फर्स्ट ब्लड- पार्ट 2) वियतनाम युद्ध के पूर्व सैनिक बने जो अमरीकी बंदियों को छुड़ाने के लिए फिर से वहां जाते हैं और पुराने दुश्मनों को ख़त्म करते हैं.
'दा 5 ब्लड्स' के पात्र उन फ़िल्मों पर चर्चा करते हैं और उनका मजाक उड़ाते हैं ("क्या तुम्हें रैंबो फ़िल्में याद हैं", "हॉलीवुड के वे लोग वापस जाकर वियतनाम युद्ध को फिर से जीतने की कोशिश कर रहे हैं").
ली कहते हैं, "यदि मैं सम्मान से कहूं तो अमरीका को एक छोटे से देश ने निकाल बाहर किया था, ठीक उसी तरह जैसे फ्रांस ने किया था, इसलिए इन फ़िल्मों को फिर से नैरेटिव लिखना पड़ा."
"मुझे लगता है कि बहुत से अमरीकियों को सच्चाई का पता नहीं है."
तब से अब तक वियतनाम युद्ध पर बहुत कम फ़िल्में आई हैं जिनका लोगों की चेतना पर या युद्ध के बारे में पश्चिमी लोगों की समझ पर कोई बड़ा प्रभाव पड़ा हो.
रैंडेल वैलेस की फ़िल्म 'वी वेयर सोल्जर्स' (2002) अलग थी, जिसमें उत्तरी वियतनाम के सैनिकों के मानवीय पहलुओं को दिखाया गया था.
उसमें लेफ्टिनेंट कर्नल गुएन हू एन (डॉन डुओंग) को भी उतना ही समय दिया गया जितना कर्नल हेल मूर (मेल गिब्सन) को. इस नज़रिये से 'दा 5 ब्लड्स' का लंबे समय से इंतज़ार था.
ली अलग क्यों हैं?

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ली वियतनाम फ़िल्मों के इतिहास को सुधारने के लिए दो मोर्चों पर सचेत थे- अश्वेत सैनिकों का चित्रण और वियतनामी पात्रों का चयन.
पहले के निर्देशक किसी भी एशियाई को वियतनामी पात्र का रोल देकर ख़ुश रहते थे. लेकिन ली ने सिर्फ़ वियतनामी कलाकारों को चुना.
फ़िल्म की ज़्यादातर शूटिंग थाईलैंड में हुई. ऐसे में उनके लिए थाई कलाकारों को मौका देना आसान भी होता और सस्ता भी, ख़ासकर बैकग्राउंड एक्स्ट्रा के रूप में. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.
वियतनामी पात्रों तो उचित जगह भी दी गई. विन्ह (जॉनी ट्राई न्युगेन) एक टूर गाइड हैं जिनके पिता दक्षिणी वियतनाम की ओर से लड़े थे जबकि उनके चाचा वियतकांग (कम्युनिस्ट वियतनाम) की ओर थे.
टिएन (ले वाई लान) कारोबारी महिला हैं जिनका एक सैनिक के साथ अफेयर है, उनकी मिश्रित नस्ल की एक बेटी भी है जिसके लिए उनको लांछित किया गया.
अन्य वियतनामी पात्र वे हैं जो सोने के लिए चारों पूर्व सैनिकों से लड़ने को तैयार हैं और जो युद्ध के अत्याचारों को भूलने के लिए तैयार नहीं हैं.
अमरीकी नायक भी अलग-अलग हैं. वे राजनीति से लेकर पैसे तक सब कुछ पर बहस करते हैं. उनमें से एक ट्रंप का समर्थक है. कुछ बुरे पिता हैं और उनमें ढेर सारे अवगुण हैं. उनकी ज़िंदगी युद्ध में बिखर गई है.
'दा 5 ब्लड्स' नेटफ्लिक्स पर ऐसे समय रिलीज़ हुई है जब कुछ ही बड़ी फ़िल्में रिलीज़ हो रही हैं. उम्मीद है कि इसे ज़्यादा लोग देखेंगे और इस तरह विविधता से भरी कहानियों पर और फ़िल्में बनेंगी.
युद्ध पर बनी फ़िल्मों ने गोरी नस्लीयता को आगे बढ़ाया है. हालांकि ली का कहना है कि ये उन समस्याओं का एक छोटा हिस्सा भर है जो हॉलीवुड में जड़ें जमाए हुए है.
"मुझे लगता है कि हॉलीवुड में कहानी का बड़ा हिस्सा हमेशा गोरों के नज़रिये से कहा जाता है, इसलिए यह सिर्फ़ युद्ध की फ़िल्मों के साथ नहीं है. यह ऊपर से नीचे तक सब जगह है."
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