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कोरोना वायरस: अमरीका की हज़ारों नर्सों के सामने बेरोज़गारी के हालात
- Author, आलिम मकबूल
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
कोरोना वायरस संक्रमण के इस मुश्किल दौर में पूरी दुनिया के डॉक्टर, नर्स और दूसरे चिकित्साकर्मी जान जोखिम में डाल कर काम कर रहे हैं. अमरीका के कई इलाकों में नर्सिंग स्टाफ की कमी भी पड़ रही है.
लेकिन अमरीका के हज़ारों डॉक्टरों और नर्सों के लिए यह वक्त और कठिन साबित हो रहा है.
एक तरफ डॉक्टरों के वेतन में भारी कटौती हो रही है, उन्हें कम तनख्वाह पर काम करना पड़ रहा है. तो दूसरी तरफ कई जगहों पर नर्सों को बिना वेतन के घर पर बैठने के लिए कहा जा रहा है.
दरअसल ये हालात अमरीकी हेल्थकेयर कंपनियों की अपनी लागत घटाने की कोशिश का नतीजा हैं.
कोरोना वायरस महामारी से पैदा हुए संकट ने उनकी कमाई पर करारी चोट की है और अब वो नए हालात से तालमेल बिठाने की कोशिश में हैं.
नर्स मारिया की परेशानी
नर्स के तौर पर काम करने वाली मारिया बक्सटोन कहती हैं, "नर्सों को हीरो कहा जा रहा है. लेकिन मैं इस वक्त खुद को कतई हीरो महसूस नहीं कर रही हूं. क्योंकि मैं अपना काम नहीं कर पा रही हूं."
बक्सटोन एक पीडिएट्रिक्स (बाल चिकित्सा) नर्स हैं. वह मिनेसोटा के सेंट पॉल इलाके में काम करती हैं. लेकिन उन्हें घर बैठने को कहा गया है.
बक्सटोन अस्पताल की जिस यूनिट में काम करती थीं, उसे फिलहाल बंद कर दिया गया है. देश के अस्पतालों में ऐसे कई यूनिट अभी बंद हैं.
दरअसल, अस्पतालों में जो मेडिकल प्रक्रियाएं अर्जेंट नहीं मानी जा रही हैं उन्हें रोक दिया गया है. इससे अस्पतालों को काफी घाटा हुआ है.
बक्सटोन के पास फिलहाल कंपनी का दिया हेल्थ बेनिफिट है, लेकिन घर बिठा दिए जाने की वजह से उन्हें वेतन नहीं मिल रहा है.
वह कहती हैं, "लोग अक्सर मुझसे कहते थे कि नर्स होने की वजह से मुझे कभी बेरोज़गारी का सामना नहीं करना पड़ेगा. लेकिन देखिए क्या हुआ. अभी-अभी मैं 40 साल की हुई हूं और बेरोज़गार हो गई. अपने जीवन में पहली बार मुझे बेरोज़गारी का सामना करना पड़ा है."
बक्सटोन कोरोना वायरस संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए उठाए गए कदमों की हिमायती हैं, लेकिन वह अस्पतालों में रुक गए सामान्य इलाज और दूसरी प्रक्रियाओं को लेकर चिंतित हैं. उनका कहना है कि यह जितना लंबा खिंचेगा उतनी ही ज़्यादा नर्सें बेरोज़गार होंगी.
अस्पतालों में होने वाली इलेक्टिव सर्जरी (पहले से तय सर्जरी) पर रोक लगा दी गई है. इससे उनकी कमाई कम हुई ही है. और अब सामान्य मरीज़ भी अस्पतालों में नहीं आ रहे हैं.
कम हुई अस्पतालों की कमाई
डॉ. सायना पार्क्स कहती हैं, "अप्रैल में मुझे 120 घंटे काम करने थे, लेकिन आधा मार्च ख़त्म होने तक मेरे वर्क शेड्यूल के सारे घंटे काट दिए गए थे. मेरे काम के घंटे के बारे में न तो मुझे कोई ई-मेल भेजा गया और न ही फोन पर कोई जानकारी दी गई. यह बेहद परेशानी भरा अहसास है."
डॉक्टर पार्क्स मिशिगन में रहती हैं और इमर्जेंसी मेडिसिन में स्पेशलिस्ट हैं. लेकिन वह ओहायो और ओक्लाहोमा के अस्पतालों में काम करती हैं. अस्पतालों के जिन विभागों में वह काम करती हैं वे खुले हुए हैं, लेकिन वहां मरीज़ नहीं आ रहे हैं. डॉ. पार्क्स कहती हैं कि पिछले महीने उन्होंने टेलीमेडिसिन के ज़रिये कुछ मरीज़ों का इलाज किया ताकि अपनी घटी हुई कमाई की कुछ भरपाई कर सकें.
वह कहती हैं, "मैं लगभग हरेक मरीज से यही सुन रही हूं कि वे इलाज के लिए अस्पताल नहीं आना चाहते हैं क्योंकि यहां कोरोना वायरस संक्रमण का डर है. लोगों के बीच इस डर की वजह से लगभग पूरे देश के अस्पतालों के इमर्जेंसी विभागों में पहले की तुलना में काफी कम मरीज़ दिख रहे हैं."
डॉ. पार्क्स कहती हैं, "अगर मरीज़ अस्पताल नहीं आ रहे हैं तो इसका मतलब येहै कि अस्पतालों की कमाई नहीं हो रही है. हमें घंटे के हिसाब से पैसा मिलता है. हर घंटे जितने मरीज़ देखते हैं उस हिसाब से पैसा दिया जाता है".
डॉ. पार्क्स अब अन-एम्पलॉयमेंट बेनिफिट के लिए अप्लाई करने की सोच रही हैं ताकि वो अपना स्टूडेंट लोन चुका सकें.
अमरीका में बड़ी तादाद में चिकित्साकर्मी कम वेतन पर काम कर रहे हैं. कोरोना वायरस संक्रमण ने उनके काम के घंटे छीन लिए हैं. हेल्थकेयर मैनेजरों का कहना है कि अस्पतालों पर भारी वित्तीय दबाव है. लिहाज़ा उनके पास वेतन कटौती या काम के घंटे कम करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है.
वरमोंट के एक अस्पताल के सीईओ क्लॉडियो फोर्ट कहते हैं कि उनके अस्पताल की कमाई रातों रात 60 फीसदी कम हो गई है. हर महीने उन्हें 80 लाख डॉलर (64 लाख पाउंड) का नुकसान हो रहा है.
यही वजह है कि उन्हें अस्पताल के लगभग 150 कर्मचारियों ( 10 फीसदी से थोड़ा ही कम) को फरलो (थोड़े वक्त के लिए बिना वेतन की छुट्टी) पर भेजना पड़ा.
फोर्ट कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि देश में शायद ही कोई अस्पताल ऐसा होगा, जो यह नहीं सोच रहा होगा कि इस मुश्किल दौर में खुद को कैसे बचा कर रखे. अपने खर्चे घटाने के लिए वह कौन सा कड़ा कदम उठाए. हमारा अस्पताल जिस संकट से गुजर रहा है, वैसी मुश्किल स्थिति से बचने के लिए हर अस्पताल मशक्कत कर रहा होगा. "
संकट के इस दौर में फोर्ट के अस्पताल को संघीय सरकार से 54 लाख डॉलर की मदद मिली है. लेकिन अभी भी उनके घाटे की भरपाई नहीं हो रही है. उन्हें नहीं पता कि आने वाले महीनों में संघीय सरकार से उन्हें कोई मदद मिलेगी भी या नहीं.
फोर्ट कहते हैं कि यह अभूतपूर्व स्थिति है. उन्हें डर है कोरना वायरस संक्रमण का यह असर लंबा न चले.
वह कहते हैं, "जब यह सब ख़त्म हो जाएगा, तो उम्मीद है कि हर किसी को पूरी सैलरी मिलने लगेगी और काम के घंटों में कटौती भी नहीं होगी. हम फिर 60 हज़ार लोगों की पहले जैसी ही सेवा कर पाएंगे. लेकिन मुझे नहीं पता कि दो महीने पहले की हमारी कितनी कोशिशें आगे लोगों को सेवा देने में काम आ पाएंगीं."
अमरीका में कोरोना वायरस के संक्रमण की वजह से बड़ी तादाद में चिकित्साकर्मियों की छंटनी हुई है. हालांकि अभी भी हज़ारों लोग कम वेतन पर काम कर रहे हैं. लेकिन लोगों को लग रहा है कि संक्रमण खत्म होने के बाद हालात सामान्य होना ही काफी नहीं होगा.
डॉ. जेन जैनब कहती हैं, "इस संकट की घड़ी में जब लोग जान जोखिम में डाल कर काम कर रहे हैं, उसमें मेडिकल स्टाफ के काम के घंटे में कटौती करना और वेतन घटा देने जैसे कदम अपराध हैं. यह हमारे करियर का सबसे ख़तरनाक वक्त है. हमें हर दिन काम पर आना है. ऐसे ख़तरनाक वक्त, जान जोखिम में डाल कर काम करने के लिए तो भत्ता मिलना चाहिए. लेकिन उल्टे वेतन कट रहा है. काम के घंटे कम किए जा रहे हैं."
डॉ. जेनब कोलोराडो के डेनवर में मेडिकल इमरजेंसी की फिजिशियन हैं. वह कहती हैं, "आखिर इस तरह की समस्या क्यों पैदा हो रही है? साफ है कि अमरीका में चिकित्सा सेवा एक धंधा हो गई है. पहले ऐसा नहीं था."
साफ तौर पर उत्तेजित दिख रही डॉ. जेनब कहती हैं, "वे (मैनेजर) इन अस्पतालों को बहुत कम खर्च में चलाने चाहते हैं. बड़े कॉरपोरेट घरानों के ये अस्पताल मरीज़ों के बजाय अपने मुनाफे को लेकर ज्यादा चिंतित रहते हैं."
वह कहती हैं कि डॉक्टरों, नर्सों या दूसरे चिकित्साकर्मियों की अचानक वेतन कटौती, अमरीका के प्राइवेट हेल्थकेयर सिस्टम की कई खामियों में से एक का नतीजा है. कोरोना वायरस संक्रमण ने इन खामियों को उघाड़ दिया है.
वह कहती हैं, "अब हम जैसे अमरीकी डॉक्टरों के बीच आपसी बातचीत में सबसे बड़ी चिंता इस बात को लेकर जताई जाती है कि जब यह सब ख़त्म होगा तो अपने पेशे में आए बदलावों से कैसे निपटेंगे."
"अमरीका में चिकित्सा सेवा एक बिजनेस बनती जा रही है. जबकि यह ऐसा दौर है जिसमें मरीज़ों की अनदेखी नहीं की जा सकती. यह अहसास ज़रूरी है कि हम लोगों के इलाज पर फोकस करें. बिज़नेस का मुनाफा बढ़ाने के बजाय मरीजों की सेवा पर ध्यान दें."
(इवा आर्टसोना की रिपोर्टिंग के साथ)
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