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International Nurses Day: कोरोना वार्ड की देखरेख करने वाली एक नर्स और उनके बेटे की कहानी
- Author, अमृता दुर्वे
- पदनाम, बीबीसी मराठी
कोविड-19 मरीज़ों का इलाज और देखभाल कर रहे डॉक्टरों और नर्सों को किस तरह की इमोशनल चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?
उनके परिवार कैसी परिस्थितियों में रह रहे हैं? ख़ासतौर पर इन डॉक्टरों और नर्सों के बच्चों पर क्या गुजर रही है?
इसे जानने के लिए एक नर्स का अनुभव जानिए. इन्हें एक कोरोना वार्ड और अपने बेटे की देखभाल करनी पड़ रही है.
मैं एक कोविड वार्ड की नर्स हूं
उस दिन हमें हमारे हॉस्पिटल में एक आकस्मिक मीटिंग के लिए बुलाया गया था. मीटिंग में हमें बताया गया कि हमारा हॉस्पिटल कोविड के मरीज़ों को भर्ती करेगा और हमें खुद को इसके लिए मानसिक तौर पर तैयार करना होगा.
वार्ड की तैयारी
हमने ज़रूरत के हिसाब से वार्ड्स को तैयार करना शुरू कर दिया. कुछ मरीज़ हमारे यहां कस्तूरबा हॉस्पिटल से आने थे और हम इन ज़रूरतों के लिए खुद को तैयार करने में जुट गए. बाद में मुझे पता चला कि मेरे डिपार्टमेंट को कोविड वार्ड के तौर पर चुना गया है.
20 तारीख से हमने कस्तूरबा हॉस्पिटल के मरीज़ों को अपने यहां भर्ती करना शुरू कर दिया. इससे पहले मैं इसी तरह के मामलों के लिए दूसरे विभागों में मदद कर चुकी थी, ऐसे में मुझे ज़्यादा डर नहीं लग रहा था. हम पढ़ते रहे थे कि क्या चीज ज़रूरी है और किस तरह के इंतजाम किए जाने हैं.
हमें यही सब काम अपने वार्ड में करने थे, लेकिन हमने यह महसूस किया कि हमें खुद को अपने परिवारों से दूर रखना है.
अधूरी रह गई बेटे का जन्मदिन मनाने की हसरत
मेरे बेटे ने अभी ही 10वीं की परीक्षा दी थी और 24 मार्च को उसका जन्मदिन था. मैं कई दिन पहले ही अपने बेटे के जन्मदिन के लिए छुट्टी का आवेदन कर चुकी थी और इसे मनाने के लिए काफ़ी सारी तैयारियां पहले ही की जा चुकी थीं.
चूंकि मेरे पति एक जर्नलिस्ट हैं, ऐसे में हम दोनों ही नियमित रूप से काम पर जा रहे थे. लेकिन, मेरे बेटे के जन्मदिन के कुछ दिन पहले से कोविड मरीज़ हमारे वार्ड में आने लगे. ऐसे में मैंने अपने पति के साथ इस बारे में बात की और अपने बेटे को उसकी नानी के यहां भेज दिया.
जब 24 मार्च आई तो मैंने अपनी छुट्टी कैंसिल करा दी और काम पर चली गई. मैं उस दिन रात 8 बजे तक हॉस्पिटल में रही. इस व्यस्तता में मैं यह पूरी तरह से भूल गई कि आज मेरे बेटे का जन्मदिन है. बाक़ी सेलिब्रेशन तो छोड़ दीजिए, मैं उसे विश तक नहीं कर पाई.
वह मेरी मां के यहां था. उसकी मौसी और नानी ने जन्मदिन के रीति-रिवाज पूरे किए. लेकिन, हम खुद को रोक नहीं पाए और रात के 11 बजे उससे मिलने पहुंच गए. आधी रात को हम भगवान के सामने खड़े हुए और उन्हें धन्यवाद दिया.
भले ही यह उसका जन्मदिन था, लेकिन उसकी मां उसके लिए कुछ भी ख़ास नहीं कर पाई थी. हालांकि, मेरे बेटे ने न तो कोई शिकायत की न ही वह बिलकुल भी गुस्सा हुआ. इसकी बजाय उसने मुझे दिलासा दिया. उसने कहा, 'इट्स ओके ममा, जब यह सब ख़त्म हो जाएगा तब हम जन्मदिन सेलिब्रेट कर लेंगे.'
मुझे उससे वादा करना चाहिए था, लेकिन, इसकी बजाय वह मुझसे वादा कर रहा था.
मरीज़ स्टेबल होने से बढ़ा मनोबल
तब मेरा मरीज़ों के सीधे संपर्क में आना शुरू हो गया था. मेरे विचार दिमाग में घूम रहे थे. मैं जानती थी कि मैं और मेरी टीम इससे संक्रमित हो सकती है. मेरे वार्ड में पहले मरीज़ के दाख़िल होने के पहले मैंने अपनी टीम को पास बुलाया.
मैंने उन्हें गले लगाया और कहा, 'अब हमें इस पूरे हालात को संभालना है. एक टीम लीडर के तौर पर यह मेरी ज़िम्मेदारी है कि आप सबका ख्याल रखूं. हमें अपना ख्याल भी रखना है और अपने मरीज़ों का भी.'
यह सब कहते हुए मैं अपने आंसू रोक नहीं पाई, लेकिन मैंने कदम पीछे नहीं खींचने का ऐलान किया क्योंकि हम पर समाज का ऋण है.
जब पहला मरीज़ स्टेबल हो गया तो हमें थोड़ी सी हिम्मत मिली. हालांकि, हमने अपने बेटे को उसकी नानी के पास भेज दिया थआ, लेकिन मेरे पति घर पर ही मेरे पास थे. उनकी सेफ़्टी कैसे करनी है, यह भी बड़ा सवाल था.
अगर मैं घर पर आती हूं तो क्या कोई दूसरा भी मुझसे संक्रमित हो सकता है?
क्या मेरी सोसाइटी को मेरी वजह से कोई दिक्कत होगी? इस तरह के कई विचार मेरे दिमाग में कौंध रहे थे और मैं अपने दिल में रो रही थी. कुछ दफा मुझे शक हुआ कि क्या मैं इस जिम्मेदारी को उठा भी पाऊंगी या नहीं.
बेटे ने बढ़ाया मनोबल
ऐसे मानसिक उथल-पुथल के हालात में, मैंने एक बार अपने बेटे को कॉल किया. मैंने उसे बताया कि वह हमारे यहां किसी भी कीमत पर न आए. साथ ही मैंने उसे बताया कि उसके पिता भी उससे मिलने नहीं आ पाएंगे. चूंकि ट्रैवल करने के सभी विकल्प बंद हो गए थे, ऐसे में मेरे पति हर सुबह मुझे हॉस्पिटल छोड़ने जाते थे और उसके बाद वह अपने दफ़्तर जाते थे.
यह सब समझते हुए मेरे बेटे ने इससे निबटने के लिए मानसिक मजबूती का परिचय दिया. उसने मेरा मनोबल बढ़ाते हुए कहा, 'ममा, कोई बात नहीं. आप यहां मत आइएगा. मुझे कोई दिक्कत नहीं होगी.'
लेकिन, मैं रो रही थी… मेरे बेटे ने कहा, 'ममा, आपको रोना नहीं चाहिए.'
पंद्रह मिनट में वह दरवाजे पर खड़ा था. उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे बिठाया. उसने कहा, 'मम्मी आपको रोना नहीं है. आप एक बड़ा काम कर रही हैं. पापा, नानी, नाना, चाचा हम सबको आप पर गर्व है. मेरे दोस्त भी इस बात पर गर्व करते हैं कि आप एक नर्स हैं. आपको रोना नहीं चाहिए. मैं भरोसा करता हूं कि आप यह काम कर सकती हैं.'
मेरा 15 साल का बेटा मुझसे भी बड़ा हो गया था और वह मुझे दिलासा दे रहा था.
हर दिन मेरा हालचाल पूछता था बेटा
उसके बाद वह हर दिन मुझे कॉल करता था. वह पूछता था, 'आप घर पर पहुंच गईं? आपने खाना खा लिया? हॉस्पिटल में क्या हुआ? क्या आप अपना ख्याल रख रही हैं?' हर दिन उससे बात करते वक्त मैं रोने लगती थी और वह मुझे दिलासा देता था. जब मैं वीडियो-कॉल करती थी, वह कहता था, 'देखो, मैं अच्छा हूं और मैं बिलकुल फ़िट हूं.' फिर मैं हंसने लगती थी.
कई बार मुझे लगता था कि चूंकि मैं पीपीई पहनती हूं ऐसे में मैं खतरे से बाहर हूं. मैं बाहर जा सकती हूं और अपने बेटे से मिल सकती हूं. लेकिन, ऐसे मौकों पर, मेरे पति मुझे इस तथ्य से वाकिफ कराते थे कि यह मेरे उम्रदराज़ मां-बाप के लिए बेहद खतरा पैदा कर सकता है.
14 दिनों तक अस्पताल में मैं 10-12 घंटे तक काम करती रही. वार्ड कोविड मरीज़ों से भर गया था. लेकिन, फोन कॉल्स से मुझे संबल मिलता था.
मुझे नहीं पता कि जब यह महामारी नियंत्रण में आएगी. मेरे बेटे को शायद तब तक अपनी नानी के यहां ही रहना पड़े. मैं शायद उस वक्त तक उससे मिल भी न पाऊं.
14 दिन की वार्ड ड्यूटी और फिर होटल में क्वारंटीन
14 दिन की ड्यूटी के बाद मुझे एक होटल में 14 दिनों के लिए क्वारंटीन कर दिया गया. मेरे पति घर पर अकेले थए. मैं होटल में थी और मेरा बेटा नानी के यहां था. हम तीनों अलग-अलग जगहों पर थे.
सौभाग्य से फोन कॉल्स और वीडियो कॉल्स से बहुत मदद मिली. हम एक-दूसरे को देख सकते थे. मुझे नहीं पता कि कब वह दिन आएगा जब हम तीनों लोग एकसाथ बैठकर बातचीत कर पाएंगे.
क्वारंटीन की अवधि के पूरे होने के बाद मुझे एक टेस्ट कराना पड़ा. यह टेस्ट नेगेटिव आया. मुझे घर जाने की इजाजत मिल गई. मैं आपको बता नहीं सकती कि टेस्ट के रिजल्ट के नेगेटिव आने से मैं कितनी खुश थी. मेरे अंदर थोड़ा साहस आ गया था कि 14 दिन तक कोविड मरीज़ों के साथ रहने के बावजूद मैं इस संक्रमण से बच गई हूं.
सीधे मां के घर पहुंची
अपने पति को कुछ भी बताए बगैर मैं सीधी अपनी मां के घर पहुंच गई. मेरा बेटा मुझे अलग लग रहा था क्योंकि मैं उससे एक महीने बाद मिल रही थी. वह बड़ा लग रहा था. वह वैसा नहीं लग रहा था जैसा मैं रोजाना उसे अपने फोन में देखती थी. एक महीने के दौरान कई चीजें बदल गई थीं. हालांकि, मेरा रिजल्ट नेगेटिव था, लेकिन मैंने उसे गले नहीं लगाया क्योंकि मेरे दिमाग में डर बैठा हुआ था.
मेरा बेटा वैसे तो खुलकर अपनी बात नहीं कहता था, लेकिन मेरे लिए उसने इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट लिखी औऱ मैं उसे गले लगाना चाहती थी और खूब रोना चाहती थी. मैं कहना चाहती थी कि वह अब मुझसे भी ज्यादा परिपक्व हो गया है और मैं उसके जितनी परिपक्व नहीं हूं.
मैं अपनी मां के यहां 15 मिनट तक रुकी. दो दिन के ब्रेक के बाद मैंने काम फिर से शुरू कर दिया. एक बार फिर से एक महीने का साइकल शुरू हो गया. लेकिन, मुझे भरोसा है कि सबकुछ सामान्य हो जाएगा और हम फिर से एकसाथ आ जाएंगे.
(सोनम घूमे की बात)
कोविड वार्ड की देखरख करने वाली इस नर्स के 15 साल के बेटे ने भी अपनी भावनाएं व्यक्त की हैः-
मेरी मां कोविड वार्ड की देखरेख करती हैं.
कोविड-19 ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है. हर रोज़ एक अलग मुश्किल हमारे सामने आ रही है. इसने किसी न किसी तरीके से हमारी जिंदगियों पर असर डाला है. इसने मेरी ज़िंदगी पर भी असर डाला है.
जब यह महामारी फैल रही थी, तब मेरे 10वीं के इम्तहान चल रहे थे. मैं भी अपने दोस्तों की तरह ही आने वाली छुट्टियों को लेकर उत्साहित था. मैंने गर्मियों की छुट्टियों में हर दिन क्या करना है इसकी प्लानिंग कर रखी थी.
लेकिन, अचानक से देशभर में 14 अप्रैल तक के लिए लॉकडाउन लागू कर दिया गया. मैं इस फैसले से ज्यादा खुश नहीं था. मैं इस महामारी की गंभीरता को समझ नहीं पाया था.
मां-बाप दोनों आवश्यक सेवाओं में
मेरे पापा एक जर्नलिस्ट हैं और मेरी मां मुंबई के एक बड़े अस्पताल में एक नर्स हैं. दोनों लोग आवश्यक सेवाओं वाले क्षेत्र में काम करते हैं. ऐसे में दोनों के लिए लॉकडाउन की अवधि में भी काम पर जाना था.
दूसरी ओर, मेरी मां को एक ऐसी टीम में शामिल किया गया था जो कि कोरोना मरीज़ों की देखरेख करने के लिए बनाई गई थी. हर किसी को मेरी नर्स मम्मी की चिंता होती थी. सबको लगता था कि उनसे मुझे भी संक्रमण हो रकता है. ऐसे में मुझे मेरी नानी के यहां भेज दिया गया.
इन दिनों पापा कुछ दफ़ा नानी के यहां मुझसे मिलने आए थे. लेकिन, वह भी घर के अंदर नहीं आए. वह घर के बाहर रहकर ही बात किया करते थे और उसके बाद वह अपने दफ़्तर चले जाते थे.
मां को लेकर सब लोग चिंतित थे
पहले राउंड की ड्यूटी खत्म होने के बाद मेरी मां को एक होटल में क्वारंटीन कर दिया गया. एक महीने तक मैं उन्हें देख भी नहीं पाया. उन दिनों, तीन लोगों वाले हमारे परिवार में केवल पापा ही घर पर थे. मैं नानी के यहां था और मेरी मां होटल में क्वारंटीन में रह रही थीं.
सेफ़्टी के लिहाज से उनका कोरोना का टेस्ट किया गया. हर कोई तनाव में था. उनके एक सहयोगी कोरोना से संक्रमित पाए गए थे. ऐसे में पूरा परिवार बेहद तनाव में था.
मैं अपनी मां को रोज़ाना कॉल करता था. कई बार यह वीडियो कॉल होती थी. मैंने पाया कि वह निराश और अकेलेपन का शिकार थीं. मैं और परिवार के दूसरे सदस्य उनका मनोबल बढ़ाने की कोशिश करते थे. मैं ऐसे जोक करता था जिससे वह हंस सकें. लेकिन, अंदर ही अंदर हमें पता था कि वह हर रोज़ एक गंभीर खतरे का सामना करती हैं.
टेस्ट नेगेटिव आने से सबको राहत मिली
उन्होंने फोन पर हमें बताया कि उनका कोरोना टेस्ट नेगेटिव आया है. इससे हम सब ने राहत की सांस ली. हम खुश थे कि वह ख़तरे से अब बाहर हैं.
मां ने मुझे बताया कि वह कुछ दिन बाद आएंगी और हम सब से मिलेंगी. 21 अप्रैल को वह अचानक नानी के यहां पहुंच गईं. जैसे ही वह घर के अंदर आईं उन्होंने सबसे पहले अपने हाथ और मुंह धोए. उन्हें पोंछा और सोफे पर बैठ गईं.
मैं बेहद खुश था और आश्चर्यचकित था. मुझे नहीं पता था कि वह इतनी जल्दी घर आ जाएंगी. मैं उन्हें कसकर गले लगाना चाहता थआ, लेकिन उन्होंने मुझे दूर रहने को कहा.
वह भी मुझे बाहों में भरकर बताना चाहती थीं कि वह मुझसे कितना प्यार करती हैं. लेकिन, वह ऐसा नहीं कर पाईं. इसके बावजूद, इतने दिनों बाद उन्हें देखकर हम सबको बहुत अच्छा लग रहा था.
मां से मिलना सबसे अच्छा दिन था
2020 में मेरा अब तक का यह सबसे अच्छा दिन था.
उस दिन मुझे पता चला कि मैं उनसे कितना प्यार करता हूं. मैं यह सोचकर खुश था कि मां अब मेरे साथ रहने वाली हैं. लेकिन, ऐसा नहीं हुआ. वह दो दिन बाद वापस लौट गईं. उनकी दो हफ्ते की ड्यूटी थी और उसके बाद उतने ही दिन उन्हें होटल में रहना था.
मैं उन्हें जाने देना नहीं चाहता था. लेकिन, उनका जाना ज़रूरी था क्योंकि हॉस्पिटल में नर्सों की कमी थी.
मुझे उनसे पता चला कि ड्यूटी हमेशा पहले आती है. मैं एक बेटे के तौर पर अपने पेरेंट्स पर गर्व करता हूं कि वे इतने ज़िम्मेदार हैं.
आज हम घर पर बैठे बोर हो रहे हैं. हमें लगता है कि हमारे अधिकार हमसे छीन लिए गए हैं. लेकिन, कोरोना का चक्र तोड़ने के लिए यह ज़रूरी है.
अब से जब आप किसी फालतू के काम से घर से बाहर निकलें तो यह जरूर सोचें कि मेरी मां और पापा जैसे लोग दिन रात अपने परिवारों से दूर रहकर काम कर रहे हैं ताकि कोरोना से जंग लड़ी जा सके.
ऐसे कई लोग हैं. ये लोग हम सबकी सेफ़्टी के लिए काम कर रहे हैं. घर से बाहर निकलने से पहले कोविड के योद्धाओं परिवारों के बारे में सोचिए जो कोरोना योद्धों की हेल्थ और सेफ़्टी को चिंतित हैं.
घर पर रहिए, सुरक्षित रहिए.
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