डब्लूएचओ क्यों कह रहा है कि कोरोना वायरस एचआईवी की तरह शायद कभी ख़त्म न हो?

कोरोना

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    • Author, अनंत प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कोरोना वायरस के संक्रमण की चपेट में आकर अब तक दुनिया में दो लाख 97 हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है.

वहीं, संक्रमित लोगों की संख्या 43.5 लाख के क़रीब पहुंच चुकी है.

एशियाई और लैटिन अमरीकी देशों में अभी भी वायरस का प्रसार जारी है. भारत जैसे देश में विशेषज्ञों ने आने वाले दिनों में वायरस का प्रसार तेज़ी से बढ़ने की आशंकाएं जताई है.

कोरोना संक्रमण से लड़ने के लिए दवा या वैक्सीन को लेकर कई जगह काम चल रहा है लेकिन अभी तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकला है.

बीबीसी के साथ विशेष बातचीत में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के विशेष दूत डेविड नाबारो ने भी कहा था कि लोगों तक वैक्सीन पहुँचने में ढाई साल का समय लग सकता है.

इसी बीच डब्लूएचओ ने कहा है कि ये वायरस एचआईवी की तरह इंसानी दुनिया का हिस्सा बनकर रह सकता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से आए इस बयान ने कई चिंताओं और सवालों को जन्म दिया है.

डब्लूएचओ

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डब्ल्यूएचओ का बयान

विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक शीर्ष अधिकारी माइकल रायन ने कहा, ''हमें सच्चाई जानने की ज़रूरत है और ये वायरस हमारे बीच बना रह सकता है.''

इमरजेंसी चीफ़ माइकल रायन कहते हैं, ''हमें इसे लेकर स्पष्ट और तैयार रहने की ज़रूरत है. संभव है कि कोरोना वायरस हमारे बीच क्षेत्र विशेष का एक अन्य वायरस बन जाए और यह कभी नहीं जाए. मुझे लगता है कि इसे लेकर कोई वादा नहीं किया जा सकता कि यह कब ख़त्म होगा. इसकी कोई तारीख़ नहीं है. यह बीमारी हम लोगों के लिए लंबी अवधि का संकट बन सकती है.''

रायन ने ये बात कहते हुए एचआईवी का भी नाम लिया.

उन्होंने कहा, "ये वायरस एक नया एंडेमिक वायरस बन सकता है. आशंका है कि ये वायरस कभी ख़त्म न हो. एचआईवी वायरस ख़त्म नहीं हुआ है. लेकिन हमने इस वायरस के साथ जीना सीख लिया है. हमने इसके लिए थेरेपी और बचाव ढूंढ लिए हैं और अब लोग पहले जितना डर महसूस नहीं करते हैं."

बीबीसी ने संक्रामक रोगों के विशेषज्ञ डॉक्टर जय प्रकाश मुलियलि से ये समझने की कोशिश की है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से आई इस सूचना को किस तरह लेते हैं.

डॉ. मुलियलि बताते हैं, "विश्व स्वास्थ्य संगठन के अधिकारी जो कह रहे हैं, मैं उससे पूरी तरह सहमत हूँ. ये बिल्कुल सही है."

डॉ. मुलियलि हर्ड इम्युनिटी कॉन्सेप्ट के पक्षधर माने जाते हैं. वो मानते हैं कि लॉकडाउन लगाकर इस वायरस से निजात नहीं पाया जा सकता है और इससे निजात पाने के लिए आपको हर्ड इम्युनिटी की ओर जाना होगा.

हर्ड इम्युनिटी से आशय उस स्थिति से है जब किसी जगह की 60 फ़ीसदी जनसंख्या इस वायरस का संक्रमित होने के बाद इस वायरस से लड़ने में कामयाब हो गई हो.

अमरीकी हार्ट एसोसिएशन के चीफ़ मेडिकल अफ़सर डॉक्टर एडुआर्डो सांचेज़ ने अपने ब्लॉग में हर्ड इम्युनिटी को समझाने की कोशिश की है.

वो लिखते हैं, "इंसानों के किसी समूह (अंग्रेज़ी में हर्ड) के ज़्यादातर लोग अगर वायरस से इम्यून हो जाएँ तो समूह के बीच मौजूद अन्य लोगों तक वायरस का पहुँचना बहुत मुश्किल होता है और एक सीमा के बाद इसका फैलाव रुक जाता है. लेकिन इस प्रक्रिया में समय लगता है. साथ ही 'हर्ड इम्युनिटी' के आइडिया पर बात अमूमन तब होती है जब किसी टीकाकरण प्रोग्राम की मदद से अतिसंवेदनशील लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित कर ली जाती है."

एचआईवी

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एचआईवी का ज़िक्र

माइकल रायन ने इस बारे में एचआईवी का उदाहरण दिया.

उन्होंने कहा कि जैसे एचआईवी ख़त्म नहीं हुआ है, वैसे ही संभव है कि ये वायरस भी ख़त्म न हो. लेकिन एचआईवी और कोविड-19 में ज़मीन आसमान का अंतर नज़र आता है. क्योंकि कोविड-19 से काफ़ी बचाव करना पड़ता है.

इसके प्रसार को रोकने के लिए दुनिया भर की सरकारों को लॉकडाउन जैसे क़दम उठाने पड़े हैं लेकिन एचआईवी को लेकर ऐसा नहीं था. एचआईवी एक दूसरे को छूने से नहीं फैलता है.

हालांकि, ये बात सही है कि कोरोना वायरस की तरह एचआईवी की भी कोई वैक्सीन अब तक सामने नहीं आई है लेकिन एचआईवी को लेकर लोगों के बीच एक बेहतर समझ विकसित हुई है. सरकारों से लेकर ग़ैर-सरकारी संस्थानों ने इसके लिए दशकों लंबे अभियान चलाए हैं जो अभी भी जारी हैं.

वहीं, कोरोना वायरस के मामले में ये सब करना एक चुनौती जान पड़ता है. सोशल मीडिया से लेकर आम लोगों के बीच एक राय बनी हुई है कि इस तरह से ज़िंदगी आख़िर कब तक जी जा सकती है और लोग इसके ख़त्म होने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं.

डॉक्टर मुलियलि बताते हैं कि ऐसी बीमारियों के मामले में एक सामान्य लॉकडाउन वायरस के प्रसार की रफ़्तार धीमी कर सकता है. लेकिन लॉकडाउन खुलने के बाद संक्रमण तेज़ी से बढ़ते हैं.

वो कहते हैं, "इस स्थिति में हमें लोगों के मरने की संख्या को घटाना है और मौतों की संख्या घटाने का बस एक तरीक़ा लोगों को बेहतर इलाज मुहैया कराना है."

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क्या अब कुछ नहीं हो सकता?

विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से आई इस जानकारी के बाद लोगों में निराशा का भाव है. लेकिन डॉक्टर मुलियलि बताते हैं कि अभी भी उम्मीद की एक किरण शेष है.

वो कहते हैं, "जब जनसंख्या में रोग प्रतिरोधक क्षमता 60 फ़ीसदी के आसपास पहुंच जाती है तो कुछ समय के लिए इस बीमारी का संक्रमण रुक जाएगा. लेकिन ये कहीं जाएगा नहीं. ये उसी तरह हमारे बीच रहेगा जैसे मीज़ल्स है. जैसे चिकन पॉक्स है. अब इस पैन्डेमिक के दौरान वे बीमारियां कहीं चली नहीं गई हैं. वे हमारे बीच मौजूद हैं. बस धीमे-धीमे एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में पहुंच रही हैं. इसे ही बीमारी का एन्डेमिक स्टेज कहते हैं."

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