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कोरोना दौर में भारत में हिंदू-मुसलमान तो पाकिस्तान में किस पर चर्चा? - ब्लॉग
- Author, मोहम्मद हनीफ़
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार और लेखक, इस्लामाबाद से
पिछले हफ़्ते सोशल मीडिया पर एक वीडियो क्लिप देखी, जिसे देखकर दिल काँप सा गया. भारत के एक मध्यमवर्गीय मोहल्ले में एक सब्ज़ीवाले से कुछ लोग उसका नाम पूछते हैं.
सब्ज़ी वाले के साथ उसका बच्चा भी है, इसलिए डरकर वो अपनी जान बचाने के लिए एक हिंदू नाम लेता है, बच्चे के सामने ज़लील होता है, किसी तरह अपनी जान बचाकर, अपना ठेला लेकर वहाँ से निकल जाता है.
दिल इसलिए काँपा क्योंकि जब किसी इंसान को ज़िंदा रहने के लिए, रोज़ी-रोटी कमाने के लिए अपना नाम, अपना धर्म छिपाना पड़े तो इसका मतलब है कि समाज ख़ूंख़ार हो गया है, जैसा कि विभाजन के समय हुआ था.
उस वक़्त भी सदियों से, एक ही गाँव में रहने वाले लोगों ने रातोंरात एक दूसरे के बच्चों की जान ले ली थी. वह ऐसा समय था जब गायें-भैसें भी इंसान को देखकर डरती थीं. ऐसा लगता था जैसे इंसानों से पूछ रहीं हों, "क्या आप हमें हैवान कहते हैं? इंसान ऐसा होता है?"
भारत में झांककर मैं अपने मुल्क पाकिस्तान की ओर वापस लौटा. रमज़ान का पवित्र महीना है. कोरोना के दौर में, लोग प्रार्थना, इबादत कर रहे हैं, ख़ैरात भी बांटी जा रही है, लेकिन अब कई दिनों से सोशल मीडिया पर एक टॉप ट्रेंड चल रहा है- 'क़ादियानी काफ़िर हैं.'
भारत के पंजाब का गुरदासपुर ज़िले का गाँव क़ादियाँ जहां अहमदिया मुसलमानों के गुरु का जन्म हुआ था.
45 साल पहले ही पाकिस्तान की संसद ने क़ादियानियों को काफ़िर क़रार दे दिया था, फिर अब क्यों? फिर एक और चलन शुरू हुआ कि क़ादियानी न सिर्फ़ काफ़िर हैं, बल्कि दुनिया में सबसे बुरे काफ़िर हैं. 25 साल पहले एक क़ानून बनाकर इसे पुख़्ता किया गया.
इसके बाद एक और ट्रेंड चला कि क़ादियानी काफ़िर तो हैं लेकिन अल्पसंख्यक नहीं हैं. पाकिस्तान में तो क़ादियानी लोगों की इतनी हैसियत भी नहीं कि वे यह कह सकें कि हम अहमदी हैं, हमें क़ादियानी मत कहो. उन्होंने यह नहीं पूछा कि अगर हम अल्पसंख्यक नहीं हैं, तो फिर हम क्या हैं?
इसके बाद, एक नया ट्रेंड शुरू हुआ कि क़ादियानी ग़द्दार हैं. इमरान ख़ान के एक जिगरी दोस्त मिनिस्टर ने भी "सर तन से जुदा, सर तन से जुदा" का नारा लगा दिया. मैंने कहा कि ये अच्छी रही.
भारत में पहले मुसलमानों को शक की नज़र से देखा जाता था, और अब वे 'ग़द्दार' हैं. भले ही वह अपना नाम बदलकर ठेले पर सब्ज़ियां बेच रहे हों. पाकिस्तान में अहमदी पहले काफ़िर थे, फिर सबसे बुरे काफ़िर और अब वो ग़द्दार बन गए हैं.
भारत में कई लोग मुसलमानों को कोई अपना घर किराये पर नहीं देते हैं. यहां पाकिस्तान के बाज़ारों के बाहर हमने बोर्ड लगा रखे हैं कि 'कुत्तों और क़ादियानियों' का घुसना मना है.
हम पाकिस्तानी बच्चों को बचपन में स्कूल में पढ़ाया गया था कि भारत में इस्लाम इसलिए फैला क्योंकि हिन्दू बहुत ही कट्टर धर्म था और ज़ात-पात का भी मुद्दा था.
हम मुसलमानों को खुले स्वभाव का मानते थे - 'कलमा पढ़ लो, तो सब बराबर हैं. कव्वालियाँ सुन लो, हज-उमरे करो. एक इंसान का हत्यारा पूरी इंसानियत का हत्यारा है. यहां तक कि अगर कुत्ता भी भूखा मरे तो उसके लिए ख़लीफ़ा को ज़िम्मेदार मानो..वग़ैरह वग़ैरह.'
पाकिस्तान में मुसलमानों को ताना दिया जाता था कि इस्लाम वाले होकर भी हिन्दुओं जैसे पाखंड कर रहे हो? हिन्दू भी यक़ीनन यही कहते होंगे कि हम इन मुसलमानों जैसे बुरे नहीं हैं.
यहाँ बैठे हुए 'सर तन से जुदा' का नारा लगाने वालों और वहाँ सब्ज़ी वाले को जान से मारने की धमकी देने वालों में कोई अंतर नहीं रह गया है.
कोई इन लोगों से पूछे कि आपको मुसलमान बनकर ऐसा ही व्यवहार करना था तो इस्लाम अपनाने की ज़रूरत क्या थी? कोई कट्टर हिंदुओं से पूछे, अगर आपको कट्टर मुसलमानों जैसे ही काम करने हैं तो फिर हिंदू होने का क्या मतलब है?
जिन बुज़ुर्गों ने हमें हमेशा बताया है कि राम-रहीम एक है, शोर किस बात का है, उन सभी बुज़ुर्गों से हाथ जोड़कर विनती है - हम ना राम से डरे हैं और ना ही हमें रहीम की कोई बात समझ में आई है.
राम और रहीम का नाम लेने वाले सभी लोगों, उस मालिक से चाहे डरो ना डरो, पर कुछ दिनों के लिए कोरोना से ही डर जाओ.
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