कोरोना वायरस: क्या अब हम कभी हाथ मिला पाएंगे?

    • Author, जेम्स जैफरी
    • पदनाम, बीबीसी के लिए

छोटी सी मुलाक़ात से लेकर अरबों डॉलर की कारोबारी डील पक्का करने की प्रक्रिया में एक छोटा सा दुनियावी तौर-तरीक़ा भी शामिल होता है. आप उन अजनबियों से भी हाथ मिलाते हैं, जिनसे शायद ही आपकी दोबारा मुलाक़ात हो और उनसे भी जिनके साथ आपने अरबों डॉलर की बिज़नेस डील साइन की हो.

हाथ मिलाने की शुरुआत कहां से हुई, इस बारे में अलग-अलग विचार हैं. एक मत के मुताबिक़ इसकी शुरुआत ग्रीस में शांति के प्रतीक के तौर पर शुरू हुई होगी. इसका मतलब यह रहा होगा कि जब दो लोग हाथ मिला रहे हैं तो यह इस बात की गारंटी है कि उनके पास (हाथ में) कोई हथियार नहीं है. या मध्यकालीन यूरोप में योद्धाओं के बीच इसकी शुरुआत इसलिए हुई होगी कि इसके ज़रिये वे दुश्मन के हाथ में छिपे हथियारों को हिला कर गिरा देते होंगे.

हाथ मिलाने के प्रचलन को बढ़ावा देने का श्रेय क्वैकर्स (मूल रूप से ईसाई धर्म समूह से जुड़े सदस्य) को भी जाता है. किसी के सामने झुक कर अभिवादन करने की तुलना में वे इसे ज़्यादा बराबरी वाला व्यवहार मानते थे.

ऑस्टिन स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्सास में साइकोलॉजी की प्रोफ़ेसर क्रिस्टिन लेगार कहती हैं, "हाथ मिलाना लोगों के बीच संपर्क की एक मुद्रा है. यह एक प्रतीक है कि मनुष्य कैसे एक सामाजिक और स्पर्श की ओर झुकाव रखने वाले प्राणी के तौर पर विकसित हुआ."

जिस शारीरिक मुद्रा (हाथ मिलाने का) का इतिहास हज़ारों वर्ष पुराना है, उस पर रोक लगाना इतना आसान नहीं होगा. प्रोफ़ेसर लेगार कहती हैं, "मनुष्य के लिए स्पर्श कितना महत्वपूर्ण है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि लोगों ने अब हाथ मिलाने के बजाय कोहनियों को आपस में सटाना शुरू किया. यानी भले ही हाथ न मिलाएं लेकिन कोहनियों के ज़रिये स्पर्श का अहसास बरक़रार रहे."

दरअसल स्पर्श करने और करवाने की यह जैविक इच्छा हर प्राणी में पाई जाती है. 1960 में अमेरिकी साइकोलॉजिस्ट हैरी हर्लो ने दिखाया कि युवा रीसस बंदरों के स्पर्श और प्रेम के विकास के लिए यह कितना ज़रूरी था.

जानवरों में स्पर्श की तरह-तरह की भंगिमाएं देखने को मिलती हैं. चिंपाज़ी हथेलियों को छूते हैं, गले लगाते हैं और अभिवादन के तौर पर एक दूसरे का चुंबन लेते हैं. जिराफ़ अपनी गरदन दो मीटर लंबाई तक ले जा सकते हैं. उनकी इस शारीरिक हरकत को नेकिंग (Necking) कहते हैं. नर जिराफ़ आपस में गर्दन उलझा और रगड़ कर एक दूसरे की ताक़त का जायज़ा लेते हैं. इसके ज़रिये वे एक दूसरे पर अपना प्रभुत्व भी जमाने की कोशिश करते हैं .

दुनिया में लोगों के बीच अभिवादन के कई तरीक़े हैं. इसमें आप संक्रमण के लिए ख़तरा माने जा रहे शारीरिक स्पर्श से बच सकते हैं. हिंदू संस्कृति में अभिवादन नमस्ते के ज़रिये होता है. इसमें आप अपनी हथेलियों को मिला कर अभिवादन करते वक़्त थोड़ा सा झुकते हैं.

समोआ से भी अभिवादन होता है. इसमें किसी व्यक्ति के सामने अपनी आंख की भौहें थोड़ी ऊपर कर और एक चौड़ी सी मुस्कान बिखेर कर उसका अभिवादन किया जाता है.

मुस्लिम देशों में जिसे आप छू नहीं सकते, उसका दिल पर हाथ रख कर अभिवादन करते हैं. हवाईयन शाका साइन, भी अब अभिवादन का तरीक़ा बन गया है. समुद्र की तेज़ लहरों में सर्फ़ करने वाले अमरीकी सर्फ़रों ने इसे अपना कर इसे ख़ासा लोकप्रिय बना दिया है. हवाईयन (हवाई द्वीप से जुड़े) शाका साइन में हाथ की बीच की तीन अंगुलियां मोड़ ली जाती हैं और हाथ मिलाते वक़्त अंगूठे और सबसे छोटी अंगुली को आगे किया जाता है.

शारीरिक स्पर्श हमेशा इतना महत्वपूर्ण नहीं रहा है. 20वीं सदी के मध्य में कई मनोविज्ञानी यह मानते थे कि बच्चों के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करना सिर्फ़ एक भावनात्मक मुद्रा है. इसका कोई वास्तविक उद्देश्य नहीं है. यहां तक कि वे तो यह चेतावनी भी देते थे कि इस तरह प्रेम दिखाने से बीमारियां फैल सकती हैं और इससे वयस्क होने पर मनौवैज्ञानिक परेशानियों का भी सामना करना पड़ सकता है.

लंदन स्कूल ऑफ़ हाइजिन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन में बिहेवियरल साइंटिस्ट वाल कर्टिस अपनी किताब'डोंट लुक, डोंट टच' में लिखती हैं कि हाथ मिलाना और गालों में चुंबन लंबे समय तक अभिवादन के तरीक़ों के तौर पर इसलिए बरक़रार हैं क्योंकि इनसे यह संकेत जाता है कि सामने वाला शख्स इतना विश्वसनीय है कि वह रोगाणुओं को साझा कर सकता है. दरअसल तौर-तरीक़ों को अपनाए जाने और छोड़ने का इतिहास जनस्वास्थ्य से जुड़ी चिंताओं पर आधारित रहा है.

1920 में अमेरिकी जर्नल ऑफ़ नर्सिंग में छपे लेखों में हाथ न मिलाने की चेतावनी दी गई थी क्योंकि ये बैक्टीरिया के वाहक हो सकते थे. उस दौरान अमेरीकियों को अभिवादन का चीनी तरीक़ा अपनाने के लिए कहा गया था, जिसमें किसी दोस्त का अभिवादन करना हो तो हाथ हिलाया जाता है.

हाथ मिलाने को लेकर कोरोना वायरस संक्रमण से पहले भी आपत्तियां जताई गई थीं. 2015 में यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया, लॉस एंजिलिस (UCLA) ने अपनी एक इंटेंसिव केयर यूनिट (ICU) में हैंड-शेक फ्री जोन बनाया था. हालांकि यह पॉलिसी छह महीने तक ही रही.

इस बीच, दुनिया की कई मुस्लिम महिलाएं हाथ मिलाने के ख़िलाफ़ आपत्ति जता चुकी हैं. हालांकि उन्होंने धार्मिक विश्वास के आधार पर इसका विरोध किया है.

लेकिन इन आपत्तियों और धार्मिक विश्वास के आधार पर विरोध के बावजूद 20वीं सदी के आगे बढ़ने के साथ ही हाथ मिलाने का रिवाज लगभग पूरी दुनिया में प्रचलित हो गया. यह पेशेवाराना अभिवादन का एक अकाट्य प्रतीक हो गया.

इस रिवाज के वैज्ञानिक अध्ययन ने यह पाया है कि किस तरह से एक बेहतरीन हैंड-शेक मस्तिष्क के उस हिस्से को सक्रिय कर देता है जो अच्छे भोजन, ड्रिंक्स और यहां तक कि सेक्स को भी प्रोत्साहित करता है.

हैंड-शेक का भविष्य क्या है?

अमरीका के कुछ प्रांतों में लॉकडाउन हल्का किया जाने लगा है. लेकिन हैंड-शेक के भविष्य पर अनिश्चितता बनी हुई है.

व्हाइट हाउस के कोरोनावायरस टास्क फोर्स के एक अहम सदस्य डॉ. एंथनी फॉची ने अप्रैल में कहा था, "ईमानदारी से कहूं तो मुझे नहीं लगता है कि हमें अब कभी हाथ मिलाना चाहिए. हाथ न मिलाना न सिर्फ़ कोरोना वायरस संक्रमण को रोकने में मददगार साबित होगा बल्कि इससे अमरीका में इन्फ्लुएंजा को भी तेज़ी से कम करने में मदद मिल सकती है.''

अमरीकी सरकार की गाइडलाइंस के मुताबिक़ सोशल डिस्टेंसिंग भी अभी यहां लंबे वक़्त तक बरक़रार रहने वाली है. लॉकडाउन को हल्का करने के लिए जो गाइडलाइंस जारी की गई हैं, उनके मुताबिक़ संक्रमण के ख़तरे का सबसे ज़्यादा सामना करने वाले लोग, मसलन बुजुर्ग, फेफड़ों की बीमारियों के मरीज़, मोटापे और डाइबिटीज़ से ग्रसित लोगों के लिए तो यह निहायत ज़रूरी होगी.

डेल मेडिकल में क्लीनिकल इंटिग्रेशन एंड ऑपरेशन्स पीठ के सह-अध्यक्ष स्टुअर्ट वुल्फ़ इसे 'साइंस-फिक्शन डिस्टोपिया' जैसी स्थिति बताते हैं. एक ऐसी स्थिति जहां समाज दो हिस्सों में बंटा होगा. एक हिस्सा उन लोगों का होगा जो स्पर्श कर सकते हैं और स्पर्श करवा भी सकते हैं. दूसरे हिस्से में वो लोग होंगे, जिन्हें बिल्कुल आइसोलेट होकर रहना होगा. डॉ. वुल्फ़ का कहना है इसके गंभीर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ सकते हैं.

वह कहते हैं, "हमने जवानी और ताक़त को समाज में इतनी अहमियत दी है कि इसने बूढ़े-अशक्त और युवा और स्वस्थ लोगों के बीच एक कृत्रिम दीवार खड़ी कर दी है. यह कुछ लोगों पर बहुत भारी पड़ेगी."

शारीरिक नज़दीकी की इच्छा हममें कहीं गहरे गुंथी हुई है. शायद यही वजह है कि एक अमरीकी राष्ट्रपति के हर साल 65 हज़ार लोगों से हाथ मिलाने का अनुमान लगाया जाता है.

लोगों के जोख़िम लेने की प्रवृति की स्टडी करने वाली प्रिंसटन यूनिवर्सिटी की साइकोलॉजी और पब्लिक अफ़ेयर्स प्रोफेसर एल्के वेबर का कहना है कि आदतें बहुत मुश्किल से छूटती हैं. दूसरी ओर अगर सामाजिक और आर्थिक संदर्भ बदलते हैं तो आदतें और सामाजिक रीति-रिवाज बदल सकते हैं. अभी स्वास्थ्य संदर्भ बदले हुए हैं. आप चीन में पैरों को बांधने (महिलाओं के पैर) के बारे में सोचिए. यह भी एक पुरानी परंपरा थी."

दुनिया में अभिवादन के कई विकल्प हैं, जिनमें शारीरिक स्पर्श की ज़रूरत नहीं होती. मसलन झुक कर अभिवादन करना. दुनिया के एक बड़े हिस्से में इस तरह अभिवादन होता है. थाईलैंड में कोरोना वायरस से कम मौतों का श्रेय इसे ही दिया जा रहा है. इस तरह हाथ हिलाना या सिर हिलाना, मुस्कराना और तमाम तरह के हाथ के संकेतों से अभिवादन हो सकता है. इन तरीक़ों में क़त्तई शारीरिक स्पर्श की ज़रूरत नहीं होती.

लेकिन प्रोफेसर लेगर का मानना है कि कोविड-19 की एक क्रूर विडंबना यह है कि यह ऐसे वक़्त में सामने आई है, जब दुनिया तनावपूर्ण हालात का सामना कर रही है. क्योंकि इस दौर में लोग मानव स्पर्श पर निर्भर हैं.

आप सोचिए कि किसी के मरने या कुछ बुरा होने पर लोग कैसे शोक ज़ाहिर करते हैं. गले लगकर या एक दूसरे के नज़दीक बैठ या फिर कंधे पर हाथ देकर. जब शारीरिक स्पर्श की बात हो तो मुट्ठियों को आपस में मिलाने या कोहनियों को मिलाने से वो बात नहीं आती जो हाथ मिलाने, गले लगने से आ सकती है.

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में जॉनस्टोन फैमिली प्रोफेसर ऑफ़ साइकोलॉजी, स्टीवन पिंकर यूनवर्सिटी की ऑफ़िशियल न्यूज़ साइट हार्वर्ड गजट के एक लेख में लिखते हैं, "जब भी लोग मुट्ठी मिलाने या कोहनी मिलाने जैसी हरकत करते हैं, वे जानते हैं कि यह सहज दोस्ती की भावना के ख़िलाफ़ है. इसलिए जहां तक मेरा अनुभव है, ऐसे लोग इस तरह की हरकत करते हुए थोड़ा हंसते है, जैसे वे आश्वस्त करना चाह रहे हों कि इस तरह की भंगिमाएं संक्रमण की वजह से करनी पड़ रही हैं. इससे दोस्ती की भावना पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला."

पब्लिक हेल्थ सेक्टर और संक्रामक बीमारियों पर काम करने वाली डेलियाना गार्सिया हाथ मिलाना छोड़ चुकी हैं. ज़्यादातर लोगों से वह अब हाथ नहीं मिलातीं लेकिन कुछ आदतें दूसरी आदतों की तुलना में मुश्किल से टूटती हैं. गार्सिया कहती हैं, "मैं लोगों को ख़ूब गले लगाती हूं. अपनी 85 साल की मां के साथ सोशल डिस्टेंसिंग मेरे लिए बहुत मुश्किल साबित हुई है."

"मैं उनसे इतनी जुड़ी हुई हूं कि मैं उन तक पहुंच कर उनका चेहरा चूमना चाहती हूं. उनके गालों को एक चुंबन देकर उन्हें कहना चाहती हूं- आई लव यू."

"उनसे गले लगने की ज़बरदस्त इच्छा होती है लेकिन संक्रमण को लेकर डर लगता है, इस वजह से हम दोनों के बीच एक 'बेतरतीब डांस' शुरू हो जाता है.

"जब भी वह मेरी ओर बढ़ती हैं मुझे यह चिंता होती है कि कहीं मैं उन्हें बीमार न कर दूं? इसलिए मैं पीछे हट जाती हूं. लेकिन वो जब जाने लगती हैं तो मैं उनके पीछे-पीछे चल पड़ती हूं." मुझे उनका आश्वस्त करने वाला स्पर्श चाहिए होता है लेकिन मैं उन्हें अपने नज़दीक नहीं ला सकती हूं. हम एक दूसरे से छिटके रहते हैं."

प्रोफेसर वेबर कहती हैं, "ज़िंदा रहना और इसके लिए कोशिश करना मनुष्य की एक और मूल इच्छा है. इसका एक ही विकल्प है. और वह यह कि ज़िंदगी की ओर लौटा जाए. क्योंकि हम जानते हैं की बड़ी तादाद में बुज़ुर्ग, मोटापे के शिकार और बीमारियों के साथ जीने वाले लोग तब तक मरते रहेंगे जब तक कि हम हर्ड इम्यूनिटी नहीं हासिल कर लेते. और इसमें एक लंबा वक़्त लगेगा."

ऑस्टिन स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्सास के डिपार्टमेंट ऑफ़ साइकोलॉजी के प्रोफेसर आर्थर मार्कमैन कहते है, "मनुष्य बचे रहें इसके लिए बीमारियों से दूर रहना ज़रूरी है लेकिन अभी इतनी जल्दी हैंड-शेक को न छोड़िये."

वह कहते हैं, "इसके बजाय, हमें अपने रूटीन में ज़्यादा से ज़्यादा हाथ धोने पर ध्यान देना चाहिए. हम हैंड सेनिटाइनज़र का इस्तेमाल करें और उन तरीकों पर ध्यान दें, जिससे चेहरों पर हाथ न जाए. ना कि हम पूरी तरह शारीरिक स्पर्श को ही छोड़ दें. "

"असली चिंता तो यह है कि हमारे सामने अब एक न्यू नॉर्मल आ सकता है, जिसमें स्पर्श की कोई जगह नहीं होगी. अपने सामाजिक नेटवर्क के दायरे के लोगों को न छूकर हम यह अहसास भी नहीं कर पाएंगे कि हम आख़िर क्या खो रहे हैं".

(जैम्स जैफरी एक फ्री-लांस राइटर हैं और टेक्सास में रहते हैं. वह बीबीसी के लिए लिखते रहते हैं . )

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