कोरोना वायरसः अपनी सरकार को कोसते भारत में फँसे ब्रिटिश नागरिक

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- Author, डेविड पिट्टम और गगन सभरवाल
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
लॉकडाउन में भारत में फँसे ब्रिटेन के पर्यटकों ने लौटकर अपनी सरकार के रवैये को "लचर" और "शर्मनाक" बताया है.
कुछ ने कहा कि उन्हें किसी भी संबद्ध कर्मचारी से संपर्क करने में घंटों लगे, बात कैसे हो इसे लेकर पूरा भ्रम था और ब्रिटिश अधिकारी "अक्षम और असंवेदनशील" थे.
अभी भी भारत में मौजूद एक व्यक्ति ने कहा कि उनसे कहा गया कि उन्हें एक फ़्लाइट में ले जाया जाएगा, मगर बाद में पता चला कि ये जानकारी ग़लत थी.
ब्रिटेन के विदेश और कॉमनवेल्थ कार्यालय या एफ़सीओ का कहना है कि विदेशों से लोगों को लौटाना एक "बड़ा और जटिल" काम है.
डर्बीशायर निवासी 56 वर्षीय ऐंडी हैडफ़ील्ड दो महीने की छुट्टी पर भारत आए थे और गोवा से गत रविवार को वापस लौट पाए जबकि उन्हें तीन सप्ताह पहले आना था.
उन्होंने बताया कि उनकी फ़्लाइट भारत में लॉकडाउन की घोषणा से पहले ही रद्द हो गई थी और घंटों फ़ोन पर बिताने के बाद भी जो ब्रिटिश अधिकारी आया वो किसी भी तरह की मदद की पेशकश नहीं कर सका.
‘और देशों के नागरिक लौट रहे थे’
ऐंडी ने बताया, "मैंने 61 पाउंड दिए और फिर कहा गया – आपका नाम लिस्ट में है मगर कोई फ़्लाइट मिलेगी हम इसका वादा नहीं कर सकते."
"जर्मनी, बेल्जियम, इटली – हर जगह के लोग लौट रहे थे. ये बहुत शर्मनाक था, सबको लगा कि सरकार को हमारी कोई परवाह नहीं. "

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उन्होंने बताया कि जब 300 से ज़्यादा लोगों को लेकर विमान वापस ब्रिटेन लौटा तो हमसे कहा गया कि अगर ज़रुरी लगे तो आप अपने घर पब्लिक ट्रांसपोर्ट से जा सकते हैं या किसी को आपको ले जाने के लिए बुला सकते हैं.
ऐंडी ने कहा,”ये कुछ नहीं बस अव्यवस्था है“.
37 वर्षीया ब्रिटिश नागरिक चांदनी लडवा गुजरात से लेस्टर सोमवार को पहुँची.
उन्होंने बताया कि वो मार्च की शुरुआत में भारत आई थीं जब ये पता नहीं था कि हालत कितनी गंभीर हो जाएगी और तब ब्रिटेन सरकार ने भी कहा था कि भारत की यात्रा करने में कोई परेशानी नहीं है.
उन्होंने कहा कि उन्हें अपनी वापसी की फ़्लाइट की जानकारी बस एक दिन पहले मिली और उन्हें रात को एफ़सीओ की ओर से ठीक की गई ट्रांसपोर्ट कंपनी से बहस करनी पड़ी ताकि वो समय पर एयरपोर्ट पहुँच सकें.
‘कोई बात करने वाला नहीं’
चांदनी लडवा ने बताया कि ट्रांसपोर्ट कंपनी का कहना था कि उन्हें एफ़सीओ की ओर से उनका कोई ब्यौरा नहीं दिया गया है. उन्होंने बताया कि टैक्सी अगले दिन आई, मगर तीन घंटे देर से.
वो सरकार के रवैये के बारे में कहती हैं,”बात करने के लिए कोई भी उपलब्ध नहीं था“.

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68 वर्षीय अमरीक माहिल नॉटिंघम के रहने वाले हैं मगर अभी भी पंजाब में हैं. उन्हें उम्मीद है कि गुरुवार को उन्हें वापसी की फ़्लाइट मिल जाएगी क्योंकि उसके बाद उन्हें अपने ख़ून में आए एक थक्के के लिए जो दवा दी गई थी, वो दवा ख़त्म हो जाएगी.
वो कहते हैं कि वो फ़रवरी से भारत में हैं और पिछले एक महीने में अपने घर से बाहर नहीं निकले क्योंकि ऐसी रिपोर्टें आ रही हैं कि लॉकडाउन तोड़नेवालों पर हमले हो रहे हैं.
अमरीक बताते हैं कि उन्हें पहली उपलब्ध फ़्लाइट से वापस भेज दिया जाएगा मगर बाद में कहा गया कि ये सूचना ग़लत थी.
वो कहते हैं, ”मैं उस रात सोया नहीं. सरकार को अपने लोगों को वापस लौटाना चाहिए.“

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‘जटिल काम’
एफ़सीओ का कहना है कि वो अगले सप्ताह से लगभग 5,000 ब्रिटिश नागरिकों की वापसी की व्यवस्था करेगा. मगर उसका कहना है कि अभी उसके 20,000 से ज़्यादा नागरिक भारत में हैं जो वापस जाना चाहते हैं.
एक प्रवक्ता ने कहा कि वो सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को सूचना दे रही है और उसके कॉल सेंटर की क्षमता तिगुना कर दी गई है.
प्रवक्ता ने कहा,”हम हरसंभव प्रयास कर रहे है. ये एक बड़ा और जटिल अभियान है जिसमें हमें भारत सरकार से भी तालमेल करना पड़ रहा है ताकि भारत के भीतर उनके आने-जाने की व्यवस्था की जा सके“.

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