कोरोना वायरसः अलग-अलग देशों में क्यों हैं मरने वालों की संख्या में अंतर

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- Author, मार्था हेनरिक्स
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोरोना वायरस से दुनिया भर में लोगों की जान जा रही है. कहीं ज़्यादा तो कहीं कम. कोरोना का सबसे पहला शिकार चीन के वुहान शहर में हुआ था.
फिर इटली में इस वायरस ने तहलका मचाया. लाशों के ढेर लगा दिए. मार्च महीने के आख़ि तक इटली में इस वायरस से संक्रमित 11 फ़ीसद लोगों की जान चुकी थी. इसी दौरान इटली के पड़ोसी देश जर्मनी में भी इस वायरस ने तांडव किया.
लेकिन यहां मरने वालों की संख्या काफ़ी कम रही. कुल संक्रमित लोगों में से महज़ एक प्रतिशत लोगों की ही मौत हुई. चीन, जहां से इस वायरस का प्रकोप फैलना शुरू हुआ था, वहां भी कुल संक्रमित लोगों में से मरने वाले चार फ़ीसद ही थे. जबकि इसराइल में कोरोना वायरस के संक्रमण का प्रतिशत सबसे कम यानी 0.35 फ़ीसद है.
कोरोना वायरस की ही तरह, अलग अलग देशों मौत के आंकड़ों के बीच ये फ़र्क़ का रहस्य भी फिलहाल समझ से परे है. एक ही देश में मरने वालों की संख्या में तेज़ी आने लगती है, तो कभी अचानक कमी आ जाती है. आख़िर माजरा क्या है? क्या मौत का आंकड़ा आंकने में हम कोई चूक कर रहे हैं? या इसकी वजह कोरोना की जांच है?
आख़िर मृत्यु दर है क्या? असल में मृत्यु दर दो तरह की होती हैं. इस वक़्त जो लोग कोरोना पॉज़िटिव आने के बाद मर रहे हैं, वो अंग्रेज़ी में "case fatality rate" कहलाता है. वहीं जो लोग इन्फ़ेक्शन फैलने के बाद मर रहे हैं, वो "infection fatality rate" कहलाता है. इसे इस तरह समझिए. मान लीजिए 100 लोग कोरोना पीड़ित हैं. इनमें से 10 की हालत इतनी ख़राब है कि इन्हें अस्पताल ले जाया जाता है, जहां वो सभी कोरोना पॉज़िटिव हैं.
बाक़ी बचे 90 लोगों का टेस्ट बिल्कुल नहीं होता है. अब जो मरीज़ अस्पताल लाए गए हैं उनमें से एक की मौत हो जाती है, जबकि 99 लोग बच जाते हैं. इससे हमें 'केस फ़ैटेलिटी रेट' का अंदाज़ा होता है जो कि 10 में से एक है. लेकिन 'इन्फ़ेक्शन फ़ैटेलिटी रेट' 100 में सिर्फ़ एक होगी या एक प्रतिशत.
कुछ देश सिर्फ़ उन मरीज़ों का ही टेस्ट कर रहे हैं, जिनकी हालत ज़्यादा ख़राब है. और, उन्हें अस्पताल ले जाया जा रहा है. जिनमें लक्षण नज़र आ रहे हैं, उनकी जांच अभी नहीं कर रहे हैं. जैसा कि ब्रिटेन में फ़िलहाल किया जा रहा है. इसीलिए ऐसे देशों में मृत्यु दर उन देशों के मुक़ाबले ज़्यादा है, जहां बड़े पैमाने पर कोरोना की जांच चल रही है. जैसा कि जर्मनी और दक्षिण कोरिया.
टेस्ट किट के अभाव में भी दुनिया के ज़्यादातर देशों में बड़े पैमाने पर कोरोना की जांच नहीं हो पा रही है. इसीलिए दुनिया भर से मौत के आंकड़ों का सही अंदाज़ा भी नहीं लग पा रहा है. अगर बड़े पैमाने पर संक्रमित और पॉज़िटिव दोनों तरह के मरीज़ों की जांच होगी, तभी मृत्यु दर का सही अंदाज़ा लग पाएगा.
इटली के गांव 'वो' में पहले कोरोना संक्रमित मरीज़ की पुष्टि के बाद पूरे गांव के 3300 लोगों का टेस्ट कराया गया. रिपोर्ट आने पर पता चला कि गांव की 3 फ़ीसद आबादी तो पहले ही संक्रमित हो चुकी है. लेकिन, लक्षण किसी में नज़र नहीं आ रहे हैं.

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इसी तरह की तस्वीर आइसलैंड में भी देखने को मिलती है. यहां अभी तक 2 लाख 65 हज़ार लोगों की कोरोना जांच हुई है. जो कुल आबादी के तीन प्रतिशत से ज़्यादा है. इसमें लक्षण और बिना लक्षण वाले दोनों मरीज़ शामिल थे. जांच के नतीजों से पता चला कि आधा प्रतिशत आबादी पूरी तर संक्रमित है.
ये आंकड़ा और थोड़ा कम हो सकता है, क्योंकि बहुत से ऐसे लोग भी होंगे, जिनमें लक्षण नहीं के बराबर होंगे तो उनकी जांच ही ना हुई हो. लेकिन माना जा सकता है कि आइसलैंड की एक फ़ीसद आबादी यानी 3650 लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हैं.
एंटीबॉडी टेस्ट से वायरस के प्रति शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता का अंदाज़ा लगता है. साथ ही पता चलता है कि किस व्यक्ति में संक्रमण है. लेकिन ज़रुरत है ऐसे टेस्ट की, जो पता लगा सके कि कौन व्यक्ति वायरस के प्रति अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा चुका है, और ठीक होकर वापस वायरस के बिना जीवन जी सकता है. इटली के वो गांव में दो हफ़्ते के बाद जांच की प्रक्रिया रोक दी गई. आइसलैंड में अभी तक कोविड-19 के दो ही मरीज़ हैं.
मौत के आंकड़ों में अंतर की एक और वजह है. इस समय अगर किसी की मौत किसी सांस संबंधी रोग के चलेत हुई है, तो उसे भी कोविड-19 की मौत माना जा रहा है. जैसा कि हम ब्रिटेन में देख रहे हैं. यहां अगर किसी की कोरोना जांच हुई है और मृत्यु चाहे जिस कारण से हुई हो उसे कोविड़-19 से हुई मृत्यु में ही गिना जा रहा है.
ऐसा ही हाल जर्मनी और हॉन्ग कॉन्ग में भी है. लेकिन अमरीका में इस बात का ख़्याल रखा जा रहा है. यहां डॉक्टरों को निर्देश हैं कि मृत्यु प्रमाण पत्र में मरने वाले की बीमारी का पूरा विवरण दें. लेकिन फ़िलहाल जितनी मौत हो रही हैं और उनमें कोरोना के लक्षण है तो उन्हें कोरोना से हुई मौत ही माना जा रहा है. जितनी ज़्यादा मौत कोविड-19 के तहत दर्ज होंगी, उसी की बुनियाद पर इस महामारी के घातक होने का अंदाज़ा लगाया जाएगा.

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महामारी के दौरान अक्सर डॉक्टर भी मरने की वजह महामारी को ही मान लेते हैं. ये इंसान की फ़ितरत है कि वो परेशानी के समय में सबसे बुरे हालात की कल्पना करने लगता है. उसकी सोच ही नकारात्मक हो जाता है. लेकिन बाद में जब उस दौर को देखा जाता है, तो कुछ और ही तस्वीर सामने आती है. मिसाल के लिए 2009 में स्वाइन फ्लू के बहुत से केस सामने आए. मृत्यु दर भी काफ़ी ज़्यादा रही.
इसकी दस से ज़्यादा वजह बताई गईं. यहां तक कि महामारी के 10 हफ़्ते में अलग-अलग देशों में पीड़ितों की संख्या में अंतर आने लगा. बाद में जब तमाम काग़ज़ात को फिर से स्टडी किया गया तो पता चला कि H1N1 वायरस से मरने वालों की संख्या तो बहुत ही कम थी. महज़ 0.02 फ़ीसद.
मृत्यु दर में अंतर होने की एक और वजह है. बहुत से ऐसे लोगों की भी मौत हो रही है जिनकी बीमारी का कोई रिकॉर्ड नहीं है. और कोरोना वायरस के संक्रमण जांच भी नहीं हुई है. हो सकता है जांच में मरने वाला वो शख़्स कोरोना पॉज़िटिव हो. या ये भी हो सकता है कोरोना के लक्षण दिखने के बाद भी उस शख़्स को अस्पताल ना ले जाया गया हो और उसकी मौत हो गई हो. अब ऐसे में मौत का कारण भले ही कोरोना वायरस हो लेकिन वो कोरोना की महामारी से मरने वालों की श्रेणी में नहीं आएगा.
इटली के लोम्बार्डी इलाक़े के निम्ब्रो क़स्बे में ऐसा ही देखने को मिला. सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक़ यहां 31 लोगों की मौत कोरोना वायरस से हुई है. जबकि इस इलाक़े में इन दिनों जितनी मौत हुई हैं, वो पिछले साल के रिकॉर्ड की तुलना में कहीं ज़्यादा है. इस साल के पहले महीने में ही अकेले निम्ब्रो में 35 लोगों की मृत्यु हई थी. अब चूंकि जांच ही नहीं हुई लिहाज़ा कहना मुश्किल है कि कितने लोग कोरोना वायरस से मरे और कितने अन्य कारणों से.

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इलाज के लिए अस्पताल में बेड की उपलब्धता भी एक बड़ा रोल निभाती है. जिन देशों के पास अच्छी स्वास्थ्य सेवाओं का इंतज़ाम नहीं है ,वहां पहले ये तय किया जा रहा है कि इलाज की सबसे ज़्यादा ज़रुरत किस मरीज़ को है. इसी वजह से बहुत से मरीज़ जांच से वंचित रह जा रहे हैं. समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण उनकी मौत हो रही है.
इसके अलावा कोरोना पॉज़िटिव और संक्रमित लोगों के लिए अलग-अलग अस्पताल, डॉक्टर औऱ देखभाल करने वाला स्टाफ़ होना ज़रुरी है. अगर एक ही डॉक्टर और स्टाफ़ कोरोना पॉज़िटिव और अन्य मरीज़ों का इलाज करेगा तो इस से संक्रमण फैलने का ख़तरा भी बढ़ेगा. भारत में इसकी मिसाल देखने को भी मिली है. दिल्ली में कैंसर के कई मरीज़ कोरोना वायरस से संक्रमित हो गए, क्योंकि उनका इलाज वही डॉक्टर कर रहे थे, जो कोरोना वायरस से संक्रमित मरीज़ों का.
मृत्यु दर के अंतर में उम्र भी एक बड़ा कारक है. मिसाल के लिए 2019 में इटली की एक चौथाई आबादी 65 या इससे ज़्यादा उम्र के लोगों की थी. जबकि चीन में ये आबादी 11 फ़ीसद थी. मध्य मार्च तक इटली में मृत्यु दर 7.2 फ़ीसद थी जबकि चीन में सिर्फ़ 2.3 फ़ीसद थी.
बुज़ुर्गों की मृत्यु दर में भी इटली और चीन के आंकड़ों में अंतर है. मिसाल के लिए इटली में 70-79 की उम्र वाले लोगों की मृत्यु दर 12.8 फ़ीसद है. जबकि चीन में 8 फ़ीसद है. 80 की उम्र वालों की मृत्यु दर इटली में 20.2 फ़ीसद है जबकि चीन में 14.8 फ़ीसद है. समान आयु वाले लोगों की मृत्यु दर में इस अंतर की वजह रिसर्चरों की समझ के भी परे है.
एक वजह ये हो सकती है कि इटली में वायरल इंफ़ेक्शन बहुत ज़्यादा है. अगर शरीर में कोई बेक्टीरियल इंफ़ेक्शन है तो वो शरीर में दूसरे संक्रमणों के लिए ज़मीन तैयार कर देता है. अब हो सकता है कि जिन लोगों की मौत कोविड-19 से हुई भी तो उसके लिए बहुत हद तक निमोनिया जैसे बैक्टीरिया का पहले से शरीर में होना एक वजह हो. वैसे इटली चीन की तुलना में हमेशा से एक सेहतमंद देश की श्रेणी में रहा है.
फ़िलहाल तो मुत्यु दर में अंतर की सबसे बड़ी वजह जांच की कमी है. और अस्पतालों में अबी उन्हीं मरीज़ो का इलाज हो रहा है जिन्हें तुरंत इलाज की ज़रुरत है. अभी बहुत से ऐसे लोग होंगे जो किविड-19 का शिकार हैं लेकिन पकड़ में नहीं आए हैं. फ़िलहाल कोविड-19 से मृत्यु दर का सही अंदाज़ा लगाने के लिए अभी रिसर्चरों को थोड़ा इंतज़ार करना होगा.

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