कोरोना वायरसः लॉकडाउन में ज़िंदा रहने के लिए संघर्ष करते बच्चे

लॉकडाउन से प्रभावित बेघर बच्चे

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    • Author, गीता पांडे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत में कोरोनावायरस के मामले

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स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए अचानक लगाए गए 21 दिनों के राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन ने दसियों लाख बच्चों की ज़िंदगी में अफ़रा-तफ़री मचा दी है.

दसियों हज़ार बच्चे रोज़ाना हेल्पलाइन पर कॉल करके मदद मांग रहे हैं जबकि हज़ारों को भूखे पेट सोना पड़ रहा है. महामारी रोकने के लिए पूरा देश बंद है.

भारत में 47.2 करोड़ बच्चे हैं और दुनिया में बच्चों की सबसे बड़ी आबादी भी भारत में ही हैं. सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ग़रीब परिवारों के चार करोड़ बच्चे सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए हैं.

इनमें वो बच्चे भी शामिल हैं जो ग्रामीण इलाक़ों में खेतों में काम करते हैं और वो भी जो शहरों में कूड़ा बीनने का काम करते हैं. चौराहों पर गुब्बारे, पेन, पेंसिल बेचने वाले या भीख मांगने वाले बच्चे सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं.

बाल मज़दूरों और सड़क पर रहने वालों बच्चों के बीच काम करने वाले ग़ैर सरकारी संगठन चेतना के निदेशक संजय गुप्ता कहते हैं कि सबसे ज़्यादा वो बच्चे प्रभावित हैं जो शहरों में सड़कों पर, फ़्लाइओवरों के नीचे और तंग गलियों में रहते थे.

वो पूछते हैं, "लॉकडाउन के दौरान सभी से कहा गया है कि घरों में ही रहो, लेकिन सड़क पर रहने वाले बच्चों का क्या? वो कहां जाएं?"

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मदद की गुहार लगाते बच्चे

एक अनुमान के मुताबिक़ दिल्ली में क़रीब 70 हज़ार बच्चे सड़क पर रहते हैं. संजय गुप्ता का कहना है कि ये आंकड़ा और भी अधिक हो सकता है.

वो कहते हैं कि ये बच्चे ज़्यादातर आत्मनिर्भर होते हैं. वो अपना पेट भरने की ख़ुद ही कोशिश करते हैं, ये पहली बार है कि उन्हें मदद की ज़रूरत पड़ रही है. लेकिन वो व्यवस्था का हिस्सा नहीं हैं और उन तक पहुंचना भी आसान नहीं है, ख़ासकर मौजूदा परिस्थितियों में.

संजय गुप्ता कहते हैं कि उनके साथ काम करने वाले राहतकर्मी बिना कर्फ़्यू पास के आवाजाही नहीं कर सकते हैं और कर्फ्यू पास हासिल करना आसान काम नहीं है क्योंकि 'चेतना' जैसे सामाजिक संगठनों को ज़रूरी सेवा नहीं माना गया है.

गुप्ता कहते हैं कि उन्होंने बच्चों से संपर्क बनाए रखने के लिए नए तरीके निकाले हैं.

उन्होंने बताया, "ऐसे बहुत से बच्चों के पास मोबाइल फ़ोन हैं और आमतौर पर यह समूह में रहते हैं, तो हम इन्हें संदेश भेजते हैं या टिकटॉक वीडियो भेजते हैं जिनमें बताया गया होता है कि इस दौरान अपने आप को कैसे सुरक्षित रखा जाए और क्या सावधानियां बरती जाएं."

बच्चे भी वीडियो संदेशों के ज़रिए अपने हालात बयां कर रहे हैं. जो कुछ संदेश गुप्ता ने मुझे भेजे हैं उनसे पता चलता है कि ये बच्चे किन मुश्किल हालात में रह रहे हैं.

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पेटभर खाने का इंतज़ाम नहीं

हालात से चिंतित बच्चे वीडियो संदेशों में अपने परिजनों के बेरोज़गार होने का डर ज़ाहिर कर रहे हैं, वो पूछ रहे हैं कि राशन का इंतेज़ाम कैसे किया जाए या जब सब बंद है तो पैसे कैसे कमाए जाएं.

ऐसे बच्चों के भी वीडियो हमें मिले हैं जो अकेले रहते हैं.

एक वीडियो में सड़क पर रहने वाला एक बच्चा कह रहा है, कई बार लोग आते हैं और खाना बांटते हैं, मुझे नहीं पता कि ये लोग कौन हैं लेकिन जो खाना हमें मिलता है वह बहुत कम है. हमें दो-तीन दिनों में एक ही बार खाना मिल पा रहा है.

ये बच्चा बता रहा है कि लॉकडाउन की वजह से न ही वो पानी भरने जा पा रहा है और न ही लकड़ी जुटाने. वो ग़ुहार लगाता है, "मैं नहीं जानता कि हम कितने दिन ऐसे ज़िंदा रह पाएंगे, सरकार हमारी मदद करे."

अधिकारियों का कहना है कि वो मदद कर रहे हैं. बाल अधिकारों की रक्षा के लिए दिल्ली आयोग सड़क पर रहने वाले बच्चों और ग़रीब परिवारों में खाना बांट रहा है.

देश के कई और शहरों में भी गैर सरकारी संगठन और प्रशासन बेसहारा बच्चों और बेघर लोगों में खाना बांट रहे हैं लेकिन ये समस्या इतनी बड़ी है कि डराने वाली है.

व्यवस्था और जनता की नज़र से ओझल

गुप्ता कहते हैं कि पूर्ण लॉकडाउन के इस हालात में सरकार को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चों को दिन में तीन टाइम का खाना मिल पाए.

गुप्ता कहते हैं कि कुछ बच्चे ऐसे भी हैं जो व्यवस्था या जनता की नज़र से अदृश्य होते हैं. ये बच्चे मुख्य सड़कों से दूर, ऐसे इलाक़ों में रहते हैं जहां पहुंचना आसान नहीं होता है.

वो कहते हैं, "ऐसे हज़ारों बच्चें हैं जिन तक हम अभी नहीं पहुंच पा रहे हैं."

इस लॉकडाउन से सिर्फ़ ग़रीब बच्चे ही प्रभावित नहीं है. शटडाउन के तनाव में बहुत से और बच्चे अवसाद का शिकार हो रहे हैं.

भारत में 25 मार्च से लॉकडाउन शुरू हुआ था. उस दिन के बाद से ही बच्चों के लिए जारी 24 घंटे की हेल्पलाइन पर आने वाली कॉल की संख्या बढ़ी है.

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हेल्पलाइन नंबरों पर लाखों कॉल

चाइल्डलाइन इंडिया फ़ाउंडेशन के हेल्पलाइन नंबर 1098 पर पहले एक सप्ताह में ही तीन लाख कॉल आई हैं. इससे पहले प्रति सप्ताह दो लाख कॉल आती थीं.

भारत के 718 में से 569 ज़िलों और 128 रेलवे स्टेशनों पर सक्रिय इस हेल्पलाइन पर रोज़ाना हज़ारों कॉल आती हैं जिनमें बच्चों के साथ हिंसा, लापता बच्चों या घर से भागे बच्चों के बारे में शिकायतें होती हैं.

अधिकारियों का कहना है कि अब आ रही कॉल्स महामारी से जुड़ी होती हैं. कॉल करने वाले लोग, जो बच्चे होते हैं या उनकी ओर से कॉल करने वाले वयस्क कई बार खाना मांगते हैं.

हालांकि अधिकतर कोरोना संक्रमण के लक्षणों और इलाज के बारे में पूछताछ करते हैं. कई बच्चे कोविड-19 को लेकर अपने डर और आशंकाओं के बारे में भी बात करते हैं.

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चिड़चिड़े हो रहे हैं घरों में बंद बच्चे

बाल अधिकार कार्यकर्ता भारती अली कहती हैं कि बहुत से बच्चे अपनी स्कूली परीक्षाओं को लेकर भी चिंतित हैं क्योंकि अनिश्चितता का माहौल है और वो नहीं जानते कि आगे क्या होगा.

वो कहती हैं कि 14 साल से कम उम्र के बच्चे इसलिए परेशान हैं क्योंकि घर में उन्हें हर समय माता-पिता कि किसी न किसी बात को लेकर सलाह सुननी होती हैं.

परिजन इस समय ज़्यादा चिंतित हो गए हैं और वो पूरा दिन बच्चों से कहते रहते हैं ये मत छुओ, वो मत छुओ. बच्चे परिस्थितियों को समझने की कोशिश कर रहे हैं.

उत्तर प्रदेश बाल अधिकार आयोग की सदस्य डॉक्टर प्रीति वर्मा बताती हैं कि बच्चे हर समय कोरोना वायरस महामारी के बारे में सुन और पढ़ रहे हैं. अगर उन्हें हल्की खांसी या छींक भी आती है तो उन्हें कोरोना संक्रमण होने की चिंता सताने लगती है.

वो कहती हैं, "उन्होंने पहले कुछ दिन मज़े किए क्योंकि स्कूल बंद थे, लेकिन अब जब लॉकडाउन आगे बढ़ रहा है और भारत में संक्रमण की तादाद बढ़ रही है, कई बच्चे चिड़चिड़े होने लगे हैं. अब जब वो घरों में फंसे हैं, दोस्तों और समाज से दूर हैं, ऐसे में अब उनमें बोरियत और यहां तक की डर के लक्षण भी दिखने लगे हैं."

डॉक्टर वर्मा कहती हैं कि ऐसी स्थिति में परिजनों की ज़िम्मेदारी और बढ़ गई है. उन्हें बच्चें से बात करते रहनी होगी और बताते रहना होगा कि सब ठीक है.

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