कोरोना वायरस: ‘ब्राज़ील के मूल बाशिंदों का अस्तित्व ख़तरे में’

Indigenous women
    • Author, जोआओ फेललेट
    • पदनाम, बीबीसी ब्राज़ील

भारत में कोरोनावायरस के मामले

17656

कुल मामले

2842

जो स्वस्थ हुए

559

मौतें

स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

स्वास्थ्य विशेषज्ञों की माने तो अमेज़न के इलाक़े और ब्राज़ील के दूसरे हिस्सों में रहने वाले मूल बाशिंदों का अस्तित्व कोरोना वायरस की वजह से ख़तरे में पड़ सकता है.

इन्फ्लुएंजा वायरस से होने वाली सांस की बीमारी पहले से ही इस इलाक़े के लोगों की मौत की एक मुख्य वजह है.

ब्राज़ील में अब तक छह हज़ार से ज़्यादा कोरोना वायरस के संक्रमण के मामले आ चुके हैं और 240 लोगों की मौत हो चुकी है.

शुरुआत में औद्योगिक राज्य साओ पालो से संक्रमण के मामले सामने आ रहे थे लेकिन अब यह पूरे देश में फैल चुका है. यहां तक कि अमेज़न के उन इलाक़ों में भी जो मूल बाशिंदो का घर है. यह इलाका फ्रांस और स्पेन दोनों को मिला दिया जाए तो आकार में उसके बराबर होगा.

फ़ेडरल यूनिवर्सिटी ऑफ़ साओ पालो की शोधकर्ता डॉक्टर सोफिया मेंडोंका कहती हैं, "इस बात का भयावह जोख़िम है कि यह वायरस मूल बाशिंदों के समुदाय में फैल जाएगा और उनके अस्तित्व को पूरी तरह से मिटा देगा."

Indigenous gathering

डॉक्टर सोफिया यूनिवर्सिटी की ओर से अमेज़न के जंगलों में मूल निवासियों के लिए जो हेल्थ प्रोजेक्ट चलाया जाता है, उसकी को-ऑर्डिनेटर हैं.

उन्हें इस बात का डर है कि कोरोना वायरस ठीक उसी तरह से मूल निवासियों के बीच तबाही मचा सकता है, जैसे खसरा की वजह से पहले हो चुका है.

साठ के दशक में खसरा की वजह से वेनेजुएला की सीमा के पास रहने वाले यानोमामी समुदाय के सदस्यों में नौ फ़ीसदी लोग इस बीमारी से मारे गए थे.

वो बताती हैं कि कुछ समुदाय कोरोना महामारी को देखते हुए छोटे-छोटे समूहों में बंटने और जंगल के अंदर ही रहने की योजना बना रहे हैं. उन्होंने इससे पहले आई महामारियों का मुक़ाबला ऐसे ही करके खुद के अस्तित्व को बचाया था.

वो बताती हैं, "वे शिकार और मछली मारने के ज़रूरत का सामान इकट्ठा करके कैम्पों में रहेंगे. वो वहीं तब तक रहेंगे जब तक कि वायरस का प्रकोप कम नहीं हो जाता है."

इन समुदायों के पास इस संक्रमण से बचने के साधन जैसे साबुन और सैनिटाइजर मौजूद नहीं है. ये समुदाय एक-दूसरे के साथ बहुत क़रीब रहते हैं और अक्सर एक-दूसरे ग्लास और दूसरे बर्तन इस्तेमाल करते हैं. इससे तेजी से संक्रमण फैलने का ख़तरा रहता है.

उन्हें इस वक्त यह सलाह दी जा रही है कि वे आपस में बर्तन इस्तेमाल करना बंद करे और जिनमें कोरोना के लक्षण हैं, उन्हें अकेले में रहने की उस परंपरा का पालन करने को कहा जा रहा जो इन समुदायों में बच्चा देने वाली मां के साथ निभाया जाता है.

Indigenous chief

ये समुदाय जिन इलाक़ों में रहते हैं, वहाँ हेल्थकेयर ख़ासकर इंटेसिव केयर बेड जैसी सुविधा बहुत कम होती है.

सुरक्षा को लेकर खुद पर ही भरोसा

ब्राज़ील में कोरोना वायरस के संक्रमण को बढ़ते हुए देखकर कई लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि सरकार इन मूल निवासियों के लिए क्या कर रही है, जो ब्राज़ील की आबादी का 0.5 फ़ीसदी है.

राष्ट्रपति जेर बोलसोनेरो को मूल निवासियों के नेता अपने दुश्मन के तौर पर देखते हैं. उन्होंने एक बार कहा था कि जिस क्षेत्र में यह मूल निवासी रहते हैं, वो बहुत बड़ा है और उनके प्राकृतिक संसाधनों पर बाक़ी की आबादी का भी हक होना चाहिए.

हालांकि जहां कई गर्वनर और मेयर संक्रमण को कम करने के लिए पाबंदियां लगा रखी है तो वहीं राष्ट्रपति बोलसोनेरो से इसे एक 'छोटा सा वायरस' बताया है और स्कूल और दुकानें खोलने की बात कही है.

सरकार के इस रवैये को देखते हुए मूल निवासियों के कई संगठनों ने अपने समुदाय के लोगों को शहर आने से मना किया है और अपने इलाके में बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक लगाने की बात कही है.

कराजा समुदाय के लोगों ने माटो गोरोसा में एक बैनर लगाया हुआ है. इस पर लिखा हुआ है, "हमारा जो सच्चा दोस्त होगा, वो हमारे जोख़िम को समझेगा. कोरोना वायरस को गांव से दूर ही रखें."

इन ऐहतियात भरे क़दमों के बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोना कुछ गांवों तक आख़िरकार पहुंच ही जाएगा. इसलिए यह ज़रूरी है कि बीमार को अलग रखा जाए, इससे पहले कि वो अपने संपर्क में आने वालों को संक्रमित कर दें.

विशेषज्ञों ने उन समुदायों के लिए भी कोराना वायरस का गंभीर ख़तरा बताया है, जो खुद से अपने को अलग-थलग रखते हैं.

Indigenous roadblock

इमेज स्रोत, SANDRA HAKUWI KUADY

मूल निवासियों के कल्याण के लिए गठित की गई एजेंसी फुनाई के मुताबिक ब्राज़ील के अमेज़न क्षेत्र में 107 मूल निवासियों का समुदाय रहता है, जिनका दुनिया के बाक़ी हिस्सों से कोई वास्ता नहीं है. हालांकि इन इलाक़ों में ग़ैर-क़ानूनी तरीके से लकड़ी का कारोबार करने वाले, शिकारी और धार्मिक मिशनरी सक्रिय हैं.

मूल निवासियों के संगठनों और ग़ैर-सरकारी संगठनों का कहना है कि हाल के वर्षों में यहां इनकी घुसपैठ में इजाफ़ा हुआ है.

फुनाई के बजट में कटौती कर दी गई है जिससे इन सुदूर इलाक़ों में रहने वाले समुदायों को बचाने में परेशानी हो रही है.

अब कोरोना वायरस की आड़ में इस बात का ख़तरा बढ़ गया है कि जंगलों और इनमें रहने वालों के ऊपर होने वाले ख़र्च में और कटौती कर दी जाएगी.

मूल निवासियों के कई संगठनों ने इस बात की अपील तो की है कि समुदाय के लोग शहरों में ना जाए लेकिन उनके कई नेताओं का यह भी मानना है कि अगर वो बाज़ार नहीं जाएंगे तो भूख की समस्या भी पैदा होगी.

अमेज़न का एक म्युनिसिपल साओ गेब्रियल दा काचियोइरा कोलंबिया और वेनेजुएला की सीमाओं से लगा हुआ है. यहां के हज़ारों लोग पेंशन और सरकार की ओर से मिलने वाली नकद मदद लेने हर महीने शहर जाते हैं.

इस तरह की मददों की वजहों से हुआ यह है कि कुछ समुदायों ने शिकार छोड़कर अनाज उपजाना शुरू कर दिया है और अब वो इस पर निर्भर है.

दहशत में हैं कई समुदाय

रियो नीग्रो के मूल निवासियों के संघ के अध्यक्ष मारिवेल्टन बेरे का कहना है कि कई समुदाय 'दहशत' में हैं. वे कहते हैं, "हमें खाना गांवों तक पहुंचाना होगा ताकि वे इस मुश्किल समय में खुद बाहर आ कर जोख़िम ना लें."

साओ गेब्रियल दा काचियोइरा के अस्पताल में कोई वेंटिलेटर नहीं है. गंभीर रूप से बीमार किसी मरीज़ को 1000 किलोमीटर दूर अमेज़न की राजधानी मनौस ले जाना होगा.

Aerial photo showing mining activity on indigenous lands

इमेज स्रोत, LBAMA

नाम ना छापने की शर्त पर मूल निवासियों के लिए गठित विशेष दल (सेसाई) की नर्स का कहना है कि उनके पास कोरोना का पता लगाने के लिए कोई टेस्ट किट नहीं है और सेफ्टी के लिए गांवों में मास्क और दूसरी चीजें नहीं हैं.

सेसाई ने बीबीसी को बताया है कि उन्होंने, "मूल निवासियों, कर्मचारियों और प्रबंधकों को कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने वाले उपायों से संबंधित तकनीकी दिशा निर्देश दिए हैं."

एजेंसी का कहना है कि उसने अपने सभी मेडिकल टीम को मरीजों का इलाज करने से संबंधित प्रशिक्षण दिए हैं. लेकिन उसने गांव में खाने की कमी को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की.

फुनाई ने भी भूख की समस्या से कैसे निपटेंगे, इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है.

बेरे का कहना है कि अगर सरकार ने मदद नहीं की और उनके पास खाने का स्टॉक ख़त्म हो जाता है तो लोग अपने गांवों में रहने की सलाह हो नज़रअंदाज़ करना शुरू कर देंगे.

वो चेतावनी देते हैं, "अगर संक्रमण और भूख में से किसी एक को चुनना होगा तो वे पहले विकल्प को चुनेंगे और फिर तब गंभीर परिणाम भुगतने पड़ जाएंगे."

Lago Grande, Amazonas state, Brazil (2 April 2020)

इमेज स्रोत, AFP

कोरोना वायरस के बारे में जानकारी
लाइन
कोरोना वायरस हेल्पलाइन

इमेज स्रोत, GoI

कोरोना वायरस के बारे में जानकारी

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)