कोरोना वायरस अमरीका जैसे शक्तिशाली देश को कैसे घुटनों पर ले आया?

टाइम्स स्क्वेयर

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    • Author, निक ब्रायंट
    • पदनाम, न्यूयॉर्क संवाददाता

अब 9/11 के स्मारक पर नए फूल बिल्कुल नहीं दिख रहे हैं. अमरीका में ये एक ऐसी जगह थी, जो आपको हमेशा ग़ुलाब और गुलनार के ताज़े फूलों से सजी दिखती थी. जहां पर पोस्टकार्ड के आकार के अमरीकी झंडे, प्लास्टिक की एक अस्थाई दीवार के पार सुनसान जगह पर रखे रहते थे.

अमरीका के न्यूयॉर्क शहर का चमक-दमक से मशहूर इलाक़ा, 'ब्रॉडवे', जो गोरी नस्ल की महानता की मिसाल कहा जाता था और जहां हमेशा चहल-पहल रहा करती थी. वहां अब स्याह सन्नाटा पसरा है.

उसका मशहूर उपनगरीय ट्रेन स्टेशन भुतहा मालूम होता है. हालांकि, न्यूयॉर्क के दुनिया भर में विख्यात मैनहट्टन इलाक़े से बाशिंदों को स्टेटेन आइलैंड ले जाने वाली नौकाएं, स्टैच्यू ऑफ़ लिबर्टी के पास से होते हुए, अब भी न्यूयॉर्क की खाड़ी से गुज़रती दिखाई दे जाती हैं.

मगर, आप क़रीब से देखें तो उनमें बमुश्किल ही कोई मुसाफ़िर बैठा दिखाई देता है. कभी लोगों से ठसा-ठस भरा रहने वाला टाइम्स स्क्वॉयर, अब यूं दिखता है, मानो दुनिया में इंसानों का अकाल पड़ गया हो.

हमारे पूरे ग्रह पर फैल चुकी कोरोना वायरस की महामारी का ख़ौफ़ इस क़दर है कि अब, कोई भी 'दुनिया के चौराहे' पर मिलने को राज़ी नहीं है.

न्यूयॉर्क शहर जो अपनी ज़बरदस्त ऊर्जा और उत्साह के लिए मशहूर था. वो न्यूयॉर्क शहर, जो बड़ी शान से ये कहता था कि वो कभी सोया ही नहीं. उसी न्यूयॉर्क शहर को अब कुंभकर्णी नींद के आगोश में जाने को मजबूर होना पड़ा है.

आज न्यूयॉर्क शहर में कोरोना वायरस के संक्रमण के इतने मरीज़ हैं कि अमरीका के अन्य उपनगरीय इलाक़ों के कुल संक्रमित लोगों को मिला भी दें, तो ये न्यूयॉर्क से कम ही होंगे. ऐसे में, न्यूयॉर्क शहर एक बार फिर से 'ग्राउंड ज़ीरो' कहा जा रहा है.

ये एक ऐसी उपाधि है, जिसे कहलाने से न्यूयॉर्क का हर बाशिंदा बचना चाहता था. अचानक आए पागलपन की तरह ही, हमारी दुनिया बस एक पल में सिर के बल खड़ी हो गई है. ठीक उसी तरह जैसे 11 सितंबर 2001 को हो गई थी.

जैसे किसी संकट के वक़्त एक इंसान की पहचान होती है. ठीक उसी तरह, सामने खड़ी चुनौती को देख कर किसी मुल्क़ का किरदार सामने आता है. इतने बड़े पैमाने का संकट सामने खड़ा हो, तो तुरंत पता चल जाता है कि किसी देश का मुखिया इस चुनौती का सामना करने की क़ुव्वत रखता भी है या नहीं, उसके किरदार में इस संकट से निपटने भर की मज़बूती है भी या नहीं.

डोनाल्ड ट्रंप

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डोनाल्ड ट्रंप से यही उम्मीद थी?

तो, आज जब अमरीका एक राष्ट्रव्यापी ही नहीं, वैश्विक क़यामत का सामना कर रहा है, तो ऐसे में हमें अमरीका के किरदार के बारे में कौन सी बात पता चल रही है?

क्या, अमेरिकी सत्ता के केंद्र, कैपिटॉल हिल में बैठे सांसद इस चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हैं? याद रहे कि ये वो अमेरिकी सांसद हैं, जो बरसों से विधायी दांव-पेंच की तालाबंदी में क़ैद हैं. ये अमरीकी संसदीय व्यवस्था को अपनी ज़द में लेने वाला ऐसा सियासी लकवा है, जो दोनों पार्टियों की आपसी दुश्मनी की देन है.

तो फिर, वो इस महामारी से पैदा हुई चुनौती से निपटने के लिए किस हद तक एकजुट होने के लिए तैयार हैं? और उस इंसान के बारे में आप क्या सोचते हैं, जो व्हाइट हाउस के विश्व प्रसिद्ध ओवल ऑफ़िस में, बर्तानवी मलिका विक्टोरिया से तोहफ़े में मिली ऐतिहासिक और मशहूर 'रिज़ॉल्यूट डेस्क' के पीछे बैठता है? और, जिसने ख़ुद से ही अपने-आप को 'युद्ध के दौर के राष्ट्रपति' का चोगा पहना दिया है.

इन तीन सवालों में से आख़िरी प्रश्न, सबसे कम दिलचस्पी वाला है. इसकी बड़ी वजह ये है कि डोनाल्ड ट्रंप ने कोरोना वायरस के संकट से निपटने को लेकर जैसा बर्ताव किया है, हमें उसी की उम्मीद थी. ट्रंप में कोई बदलाव नहीं आया है. वो अभी भी बड़े और समझदार नहीं हुए हैं. उन्होंने अपनी ग़लतियां मानना नहीं सीखा है. उनमें विनम्रता तो लेशमात्र भी नहीं आई है.

बल्कि, डोनाल्ड ट्रंप के शासनकाल की जितनी ख़ूबियां रही हैं, वो इस संकट के दौरान और भी उभरकर सामने आई हैं. उनके हंसी में उड़ा देने लायक़ बड़े-बड़े दावों पर तो अब हंसी भी नहीं आती.

ट्रंप ने इस संकट से निपटने के अपने क़दमों को ख़ुद ही दस में से दस नंबर दे दिए हैं. उन्होंने इस संकट का जिस तरह से राजनीतिकरण किया है, वो भी इसकी एक मिसाल है. जबकि इस संकट का राजनीति से दूर-दूर का कोई वास्ता नहीं था.

ट्रंप जब सेंटर्स फॉर डिज़ीज़ कंट्रोल (CDC) के दौरे पर गए, तो उन्होंने अपने राष्ट्रपति चुनाव के प्रचार अभियान की टोपी पहन रखी थी, जिस पर मोटे लफ़्ज़ों में लिखा था-कीप अमेरिका ग्रेट…यानी अमेरिका को महान बनाए रखो.

सच को तोड़-मरोड़ कर पेश करने वाला ट्रंप का तरीक़ा, ज़हन को उलझा देने वाला है. ट्रंप का दावा है कि उन्होंने तो इस संकट की भयावाहता को पहले ही अच्छे से समझ लिया था. जबकि, सच तो ये है कि हफ़्तों तक वो इसे छोटी-मोटी बीमारी कह कर ख़ारिज करते रहे थे.

ट्रंप

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मखौल उड़ाने वाला नेता

फिर, ट्रंप की इस लापरवाही पर सवाल उठाने वाले मीडिया को वो 'फ़ेक न्यूज़ मीडिया' कहकर हमेशा की तरह एक बार फिर ख़ारिज करने लगे. इसमें ख़ासतौर से एक पत्रकार पर उनके ज़हरीले हमले का ज़िक्र करना ज़रूरी है.

जब व्हाइट हाउस के एक संवादाददाता ने ट्रंप से पूछा कि डरे हुए अमरीकियों के लिए उनका क्या संदेश है? तो, राष्ट्रपति ने कहा था-'मैं उन्हें बता रहा हूं कि तुम बेहद घटिया संवाददाता हो.'

ट्रंप का ओछापन और चिड़चिड़ापन उस वक़्त एक बार फिर उजागर हो गया, जब उन्होंने सीनेटर मिट रोमनी का ख़ुद से आइसोलेशन में जाने को लेकर मज़ाक़ उड़ाया. मिट रोमनी, इकलौते रिपब्लिकन सीनेटर थे, जिन्होंने ट्रंप के ख़िलाफ़ महाभियोग में उन्हें पद से हटाने के लिए वोट किया था.

डोनाल्ड ट्रंप लगातार उन अमरीकी संस्थाओं पर हमले करते रहे, जो इस संकट से निपटने में सबसे आगे मोर्चा संभाले हुए थे. जिस रोज़, ट्रंप ने राष्ट्रपति पद के मंच पर खड़े होकर अमरीका की सबसे सख़्त ट्रैवल एडवाइज़री जारी की थी. और अमरीकी नागरिकों को अंतरराष्ट्रीय यात्राएं करने से गुरेज़ करने को कहा था. उसी दिन, उन्होंने अपने ही विदेश विभाग यानी स्टेट डिपार्टमेंट को, डीप स्टेट डिपार्टमेंट यानी असीम ताक़त वाली ख़ुफ़िया शक्तियों से लैस विभाग कहा था.

आंकड़ों और रेटिंग में ट्रंप की ख़ास दिलचस्पी ऐसी है कि, वो इसके लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं. कोरोना वायरस के मामले की बात करें, तो उन्होंने पश्चिमी तट पर आकर खड़े होने की इजाज़त मांगने वाले एक क्रूज़ शिप को इसकी इजाज़त नहीं दी. और ये कहा कि-'मुझे नंबर पसंद हैं. फिर चाहे वो किसी भी तरह के हों. लेकिन, हम इसके लिए किसी जहाज़ की ज़िम्मेदारी नहीं ले सकते. क्योंकि वो हमारी ग़लती नहीं है. भले ही इससे कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या दोगुनी ही क्यों न हो जाए.'

प्रचार के लालच में ट्रंप इतने मजबूर हो जाते हैं कि कुछ भी बोल देते हैं. अब कोरोना वायरस के इलाज को ही लीजिए. ट्रंप ने कह दिया कि 'हाइड्रॉक्सी क्लोरोक्वीन और एज़िथ्रोमाइसिन को मिला कर हमने दवाओं के इतिहास में सबसे बड़े गेम चेंजर को ईजाद कर लिया है.' और ट्रंप ने ये दावा तब किया जब स्वास्थ्य अधिकारी उन्हें लोगों में ऐसी कोई झूठी उम्मीद जगाने से बचने की सलाह दे रहे थे.

वीडियो कैप्शन, अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमरीका के लिए 20 खरब डॉलर के पैकेज का एलान किया है.

अपनी तारीफ़ के क़सीदे

लोगों से हमदर्दी तो ट्रंप को दूर से भी छूकर नहीं गुज़री है. जिन लोगों ने अपने परिजनों को खोया है, उनके लिए हमदर्दी के दो बोल बोलने के बजाय, उनका हौसला बढ़ाने की बातें करने के बजाय, और इस संकट का सामना कर रहे स्वास्थ्य कर्मियों की तारीफ़ करने के बजाय, ट्रंप व्हाइट हाउस में जब भी प्रेस से मुख़ातिब होते हैं, तो शुरुआत अपनी तारीफ़ से करते हैं.

जब ट्रंप बोल चुके होते हैं, तो उनके वफ़ादार डिप्टी यानी उप-राष्ट्रपति माइक पेंस, राष्ट्रपति की शान में क़सीदे पढ़ते हैं. पिछले तीन वर्षों में माइक पेंस ने ट्रंप की तारीफ़ करना इस क़दर सीख लिया है, मानो वो दरबारी कवि हों, जिसे राजा की शान में कविताएं रचने में महारत हासिल है.

ट्रंप की व्हाइट हाउस में होने वाली प्रेस कांफ्रेंस देख कर यूं लगता है कि आप अमरीका में नहीं, उत्तर कोरिया में हों, जहां तानाशाह की चापलूसी करना अनिवार्य है.

इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि ट्रंप की आत्ममुग्धता की हवस को बुझा पाना क़रीब-क़रीब नामुमकिन है. भले ही ट्रंप ख़ुद को 'युद्ध के दौर का राष्ट्रपति' कहते हों, मगर उनकी हरकतें, लोगों को फ्रांस के राजा लुई चौदहवें की याद दिलाती हैं. जो ठाठ-बाट और शान-ओ-शौकत से रहता था और अपनी ताक़त के समंदर में गोते लगाता रहता था.

फिर, विदेशी लोगों के प्रति ट्रंप की नफ़रत भी जगज़ाहिर है. ये नफ़रत तो हमेशा ही ट्रंप के राजनीतिक कारोबार का अटूट हिस्सा रही है. वो बार-बार कोरोना वायरस को 'चाइनीज़ वायरस' कहते हैं. ठीक उसी तरह, जैसे वो 2016 के चुनाव प्रचार के दौरान अमरीका के औद्योगिक साम्राज्य के ख़ात्मे के लिए चीन और मेक्सिको के अप्रवासियों को ज़िम्मेदार ठहराते रहे थे.

उसी तरह अब वो कोरोना वायरस के प्रकोप के लिए चीन को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं. ताकि, वो इसका चुनावी फ़ायदा उठा कर दोबारा राष्ट्रपति चुनाव जीत सकें.

आर्थिक मामलों में उनकी प्रबंधन क्षमता, सार्वजनिक स्वास्थ्य के मसलों से ठीक उलट, ज़्यादा भरोसेमंद लगती है. पहले के आर्थिक झटकों, और ख़ासतौर से 2008 की आर्थिक मंदी का एक बड़ा सबक़ ये था कि शुरू से ही बड़े क़दम उठाए जाएं. ट्रंप ऐसा करने की कोशिश कर रहे हैं.

लेकिन, यहां भी वो ख़ुद को बेचने में ही ज़्यादा लगे रहते हैं. कोरोना संकट से निपटने के लिए जिस आर्थिक पैकेज का एलान किया गया, उसके आंकड़ों को उन्होंने घालमेल करके ख़ूब बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया. क्योंकि ये आंकड़े कहने-सुनने में बहुत बड़े लगते थे. इसीलिए उन्होंने इन्हें दुनिया का आठवां अजूबा तक कह डाला.

हर लोक-लुभावन और जनवादी नेता की तरह, डोनाल्ड ट्रंप भी जटिल मसलों का साधारण समाधान पसंद करते हैं. उन्होंने चीन से आने वाले लोगों के लिए अमरीका की सीमाएं बंद कर दीं. जिसे देखें तो एक समझदारी भरा फ़ैसला लगता है. हालांकि, कोरोना वायरस के प्रकोप का सामना करने के लिए बहुआयामी और दूरगामी सोच वाली रणनीति की ज़रूरत थी. जो शायद ट्रंप की क़ुव्वत से बाहर की बात है.

उनका शासन काल हमेशा से ही आज और अभी में जीने वाला रहा है. ट्रंप के प्रशासन में वो क्षमता नहीं है कि वो सार्वजनिक स्वास्थ्य की इतनी बड़ी चुनौती और आर्थिक संकट से जूझ सकें. जबकि, ये दोनों ही चुनौतियां उनके बचे हुए शासन काल में चुनौती बनी रहेंगी. फिर चाहे वो अगले दस महीने ही राष्ट्रपति रहें. या फिर इससे आगे के चार वर्षों के लिए भी राष्ट्रपति पद पर चुने जाएं.

डोनाल्ड ट्रंप का शासन काल हमेशा से ही अपने मन मुताबिक़ माहौल बनाने में यक़ीन रखने वाला रहा है. भले ही ज़मीनी स्तर पर कोई प्रगति हुई हो या नहीं. उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग-उन के साथ परमाणु मसले पर शिखर वार्ता, इसकी एक अच्छी मिसाल है.

लेकिन, ट्रंप को समझना होगा कि ऐसे मामलों में एक जादूगर जैसे नुस्खे या फिर किसी प्रचारवादी के मार्केटिंग के हुनर यहां काम नहीं आएंगे. ये एक राष्ट्रीय आपातकाल है. जैसा कि अन्य कई विशेषज्ञ कह चुके हैं. और इसे केवल ट्वीट करके हल नहीं किया जा सकता. जिससे सिर्फ़ प्रचार के बूते नहीं पार पाया जा सकता. जिसका केवल लोक-लुभावन नामकरण करने से कुछ नहीं होगा. आंकड़ों की हक़ीक़त से मुंह नहीं फेरा जा सकता…और वो आंकड़े हैं, अमरीकी नागरिकों की मौत की लगातार बढ़ रही संख्या.

अमरीका

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इस संकट से अमरीका के बारे में क्या जाना?

और, हमने इस संकट से अमरीका के बारे में क्या जाना है? सबसे पहले तो, हमने ये जाना है कि ये एक बहुत अच्छा देश है. और इसका ये मिज़ाज, अचानक नहीं बना. अमरीका हमेशा से ही ऐसा रहा है.

9/11 के आतंकवादी हमलों की ही तरह, हम एक बार फिर से किसी संकट का सामना करने वाले पहले मोर्चे के योद्धाओं के निस्वार्थ भाव और बहादुरी का दीदार कर रहे हैं.

नर्सें, डॉक्टर, मेडिकल सपोर्ट स्टाफ़ और एंबुलेंस के ड्राइवर…सब के सब उसी जनहित के जज़्बातों के साथ काम करने पहुंच गए. ठीक उसी तरह जैसे दूसरों की भलाई की भावना दिखाते हुए फ़ायर ब्रिगेड के कर्मचारियों ने दिखाई थी. जब वो न्यूयॉर्क में ट्विन टॉवर पर आतंकवादी हमलों के बाद आग बुझाने और लोगों की मदद के लिए पहुंचे थे.

हमने एक बार फिर स्कूलों की चतुराई और क्रिएटिविटी देखी, जो बिना एक भी पल गंवाए, हर छात्र को दूरस्थ शिक्षा दे रहे हैं. और, ऑनलाइन माध्यमों से बच्चों को पढ़ाने का सिलसिला जारी रखे हुए हैं.

हमने लोगों का मुसीबत का सामना करने का जज़्बा, तब भी देखा, जब लोगों ने अपने स्टोर खुले रखे. उनमें सामानों की पर्याप्त मात्रा उपलब्ध कराई और खाना लोगों के घरों तक पहुंचाया. दूसरे शब्दों में कहें तो, अमरीकी नागरिकों ने ठीक वैसे ही गुणों का मुजाहिरा किया है, जैसी भावना वायरस के प्रकोप से ग्रस्त किसी अन्य देश के नागरिकों ने दिखाई है.

अमरीकी

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कुछ अमरीकियों की ग़लत चीज़ें भी देखी गईं

और, हमने कुछ अलग तरह के अमरीकी बर्ताव के अपवाद के भी दीदार किए हैं. जिससे हमारा सिर शर्म से भी झुका है. जिस तरह बंदूकों की दुकानों के आगे लंबी क़तारें लगी दिखीं. हथियारों की ऑनलाइन बिक्री में जिस तरह इज़ाफ़ा हुआ-ammo.com की बिक्री 70 फ़ीसद बढ़ गई है.

कई ईसाई कट्टरपंथियों ने इस महामारी के संक्रामक होने से ही इनकार कर दिया है. अरकंसास राज्य के एक पादरी ने ये साबित करने के लिए कि कोई वायरस नहीं है, कहा कि उसके यहां आने वाले श्रद्धालु फ़र्श को अपनी जीभ से चाट कर साफ़ करने को तैयार हैं.

एक बार फिर से विकसित देशों के बाशिंदों के पास वही पुराना सवाल खड़ा है कि आख़िर दुनिया के सबसे अमीर मुल्क़ों के नागरिकों के लिए कोई सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था क्यों नहीं है? ओबामा केयर बिल पास होने के दस साल बाद आज भी ढाई करोड़ से ज़्यादा अमरीकी नागरिकों के पास स्वास्थ्य बीमा नहीं है.

इस संकट के समय, एकजुट होने के बजाय आज अमरीकी जनता को ये एहसास हो रहा है कि वो तो पिछले कई दशकों से सियासी क़िस्म की सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर रहे थे.

अमरीका में कट्टरपंथियों और उदारवादी समूहों के लोग झुंड की तरह अपने जैसी विचारधारा रखने वाले समुदायों के आस-पास ही रहते आए हैं. इसकी वजह ये है कि उन्हें अपने से अलग या विरोधी राजनीतिक विचारधारा रखने वाले हमवतनों के साथ रहना तक गवारा नहीं.

दो ध्रुवों में बंटा अमरीकी समाज

एक बार फिर से हमारे सामने वही दो ध्रुवों में बंटा हुआ अमरीकी समाज है. इस संकट को लेकर भी हमें अमरीका में वही क़बीलाई सोच वाली प्रतिक्रियाएं दिख रही हैं, जिनसे हम पहले भी वाबस्ता रहे हैं. आज भी रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक यही मानते हैं कि कोरोना वायरस के संकट को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया जा रहा है.

वहीं, ऐसा मानने वाले डेमोक्रेटिक पार्टी के सदस्यों की तादाद रिपब्लिकन्स के मुक़ाबले आधी से भी कम है. रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक, दो तिहाई अमरीकी नागरिकों को राष्ट्रपति से मिल रही जानकारी पर पूरा भरोसा है. वहीं, डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक ऐसे केवल आठ फ़ीसद अमरीकी नागरिक हैं, जो ट्रंप की बातों पर यक़ीन करते हैं.

जैसा कि रेवरेंड जोश किंग ने बड़ी निराशा से वॉशिंगटन पोस्ट से कहा कि, 'आप सियासी तौर पर रुढ़िवादी क्षेत्रों की बात करें, तो वो लोग इस तालाबंदी को अपनी सेहत का ख़याल करना नहीं मानते. वो तो ये सोचते हैं कि ये तो उदारवाद है जो उनके दरवाज़े पर आ खड़ा हुआ है.'

यहां तक कि जब 13 मार्च को CDC ने ये आशंका जताई कि 21.4 करोड़ अमरीकी नागरिक कोरोना वायरस से संक्रमित हो सकते हैं. तब, दक्षिण पंथी वेबसाइट 'द फ़ेडरलिस्ट' के संस्थापक शॉन डेविस ने ट्वीट किया कि, 'कॉरपोरेट सियासी मीडिया आपसे नफ़रत करता है. वो इस देश से घृणा करता है. और वो तब तक नहीं रुकेंगे, जब तक वो सत्ता पर दोबारा क़ाबिज़ नहीं हो जाते. अगर इसका मतलब है कि वो ख़ौफ़ का ऐसा माहौल बनाएं, जिससे अर्थव्यवस्था तबाह हो जाए, तो उन्हें वो भी मंज़ूर है. क्योंकि वो उस कम्युनिस्ट देश के इशारे पर ये सब कर रहे हैं, जहां से इस संकट की शुरुआत हुई थी.'

वीडियो कैप्शन, कोरोना वायरस: इटली और चीन से आगे निकला अमरीका

कहां पर है ट्रंप की लोकप्रियता

आज कोरोना वायरस के इस संकट के सामने अमरीका किस क़दर बंटा हुआ है, इसकी मिसाल है, हालिया गैलप पोल.

इसके अनुसार, रिपब्लिकन पार्टी के 94 फ़ीसद समर्थक, इस संकट से निपटने के ट्रंप प्रशासन के तौर-तरीक़ों से पूरी तरह संतुष्ट हैं.

वहीं, केवल 27 प्रतिशत डेमोक्रेट समर्थकों को ही ट्रंप के कोरोना वायरस से निपटने के तरीक़ों पर भरोसा है. लेकिन, कुल मिलाकर हर दस में से छह नागरिक इस मामले पर ट्रंप के साथ खड़े हैं. जिससे आज भी ट्रंप की लोकप्रियता की रेटिंग 49 प्रतिशत है. जो उनके शासन काल के उच्चतम स्तर के ही बराबर है.

जैसा कि पहले के संकटों जैसे 9/11 के साथ हुआ था, आम अमरीकी नागरिक, किसी भी राष्ट्रीय संकट के समय अपने राष्ट्रपति के साथ ही खड़ा होता है. जबकि, डोनाल्ड ट्रंप, बेहद विभाजनकारी नेता के तौर पर जाने जाते हैं. 11 सितंबर के अमरीकी हमले के बाद जॉर्ज डब्ल्यू. बुश की लोकप्रियता की रेटिंग 90 प्रतिशत से भी ऊपर थी.

अमरीका का राजनीतिक भूगोल, लाल और नीले प्रांतवादी बंटवारे के तौर पर बिल्कुल साफ़ नज़र आता है. और इस राजनीतिक विभाजन से ये भी तय होता है कि किस पार्टी के समर्थकों को कोरोना वायरस का संक्रमण होने का ख़तरा ज़्यादा है.

डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक आमतौर पर शहरी इलाक़ों में ज़्यादा रहते हैं. डेमोक्रेट समर्थकों की घनी बस्तियों ने उनके बीच संक्रमण का ख़तरा बढ़ा दिया है. वहीं, रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक कम घनी आबादी वाले ग्रामीण इलाक़ों में दूर-दूर फैल कर ज़्यादा रहते हैं. जहां पर वायरस का प्रकोप उतना भयंकर नहीं है. यानी कि इस महामारी के दौरान भी अमरीका का सियासी ध्रुवीकरण ज़ाहिर हो रहा है.

'ब्लू अमरीका' यानी डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थकों वाले राज्यों को ट्रंप प्रशासन से ज़्यादा अपने-अपने सूबे की सरकारों से अच्छे नेतृत्व की उम्मीद है. उनका भरोसा, डेमोक्रेटिक पार्टी के गवर्नरों जैसे कि न्यूयॉर्क के एंड्र्यू कुओमो (जिनके बारे में ट्रंप ने ट्वीट किया कि उन्हें वायरस से निपटने के लिए और प्रभावी क़दम उठाने चाहिए.), कैलिफ़ोर्निया के गवर्नर गैविन न्यूसोम (जिनकी ट्रंप ने तारीफ़ की है) और वॉशिंगटन राज्य के जे इनस्ली (जिन्हें ट्रंप ने तब सांप कहा था, जब वो सीडीसी के दौरे पर गए थे.) पर ट्रंप से ज़्यादा है.

डॉ. एंथनी फ़ॉची और ट्रंप

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एक मसीहा का उदय

इस संकट के समय अमरीकी उदारवादियों के लिए, डॉक्टर एंथनी फ़ॉची एक ऐसे मसीहा के तौर पर उभरे हैं, जो ट्रंप प्रशासन की सत्ता को चुनौती दे रहे हैं.

डॉक्टर फ़ॉची नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एलर्जी ऐंड इन्फ़्केशस डिज़ीज़ेज़ के निदेशक हैं. पोस्ट ट्रुथ के दौर के ट्रंप शासनकाल में डॉक्टर फ़ॉची, इसका टीका मुहैया कराने वाले विशेषज्ञ के तौर पर मशहूर हो रहे हैं. जिन्होंने वायरस के प्रकोप को लेकर ट्रंप के ढुलमुल रवैये को बार-बार ख़ारिज किया है और इसकी भयंकरता के बारे में अमरीकी जनता को आगाह किया है.

आज डॉक्टर एंथनी फॉची, आम अमरीकियों के बीच ठीक उसी तरह लोकप्रिय होते जा रहे हैं, जैसी शोहरत एक ज़माने में सुप्रीम कोर्ट की उदारवादी जज रूथ बैडेर गिंसबर्ग की थी.

तय है कि इस नए कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते, अमरीकी संसद में लंबे समय से चल रहा सियासी टकराव और व्यवधान अस्थायी तौर पर ही सही, मगर ख़त्म हो जाएगा. देश के सांसदों के पास क़ानून बनाने के सिवा कोई और विकल्प नहीं है. क्योंकि, कोरोना वायरस के प्रकोप से जितना बड़ा आर्थिक संकट खड़ा हुआ है, उसे कई विशेषज्ञ इक्कीसवीं सदी की भयंकर मंदी कह रहे हैं.

फिर भी, अमरीकी अर्थव्यवस्था को मदद देने के लिए एक स्टिमुलस पैकेज को संसद से मंज़ूरी देने की दो कोशिशें नाकाम रही थीं. इसकी वजह वही सियासी गोलबंदी और राजनीतिक संघर्ष और दूसरे को हर मोर्चे पर पटखनी देने की आदत थी.

रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद इस बात पर उलझे हुए थे कि इस पैकेज के दायरे में छुट्टियों के लिए भुगतान और बेरोज़गारी के भत्ते को भी शामिल किया जाए या नहीं. और डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों का आरोप है कि सरकार की तरफ़ से दी जा रही ये मदद, अमरीकी कंपनियों के लिए आसानी से उपलब्ध ऐसा फ़ंड होगा, जिसके दुरुपयोग की पूरी आशंका है.

अमरीकी संसद के नाकारेपन भरे बर्ताव ने एक बार फिर दिखाया है कि वो किस संस्थागत और संक्रामक बीमारी की शिकार है.

ये आर्थिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य का जितना बड़ा संकट है, उसमें बस यही उम्मीद की जा रही है कि दोनों दलों के सांसद, उसी द्विपक्षीय एकजुटता और राष्ट्रवादी सोच के साथ काम करेंगे, जैसी व्यापक सियासी सहमति, अमरीका ने पिछली सदी के पांचवें और छठे दशक की शुरुआत में देखी थी.

उस दौर में दोनों दलों के आपसी सहयोग से दूसरे विश्व युद्ध के बाद के उस दौर में कई महत्वपूर्ण सुधारवादी क़दम उठाए गए थे. जैसे कि, अंतरराज्यीय हाइवे व्यवस्था और आम नागरिकों के लिए मील का पत्थर साबित होने वाला सिविल राइट्स एक्ट पास किया गया था.

वैसे भी, इतिहास के सबक़ हमें बताते हैं कि अमरीकी राजनेता तभी आपसी समन्वय के साथ काम करते हैं, जब उनका सामना किसी साझा दुश्मन से होता है. फिर चाहे वो शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ हो या फिर 9/11 के हमले के बाद के दिनों में अल-क़ायदा का ख़तरा हो.

लेकिन, कोरोना वायरस के प्रकोप से निपटने में कैपिटॉल हिल या अमरीकी संसद ने जैसा रवैया अपनाया है, वो हौसला बढ़ाने वाला तो क़तई नहीं दिखता. और अगर पार्टियों के दायरे से आगे बढ़कर आपसी सहयोग होता है, जो आख़िर में जाकर होना ही है, तो ये किसी देशभक्ति से भरपूर आपसी सहमति का नतीजा नहीं होगा. बल्कि, खीझ पैदा करने वाले राजनीतिक विभाजन का नतीजा होगा. ठीक वैसा ही, जैसे कि आम लोग संकट के समय हड़बड़ी में ज़रूरत से ज़्यादा सामान ख़रीद डालते हैं.

यहां अमरीकी सांसदों के सामने खड़ा विरोधाभास ये है कि इस संकट ने राजनीतिक दर्शन की विभाजनकारी रेखा को मिटा दिया है. जैसा कि 2008 में हुआ था, वैचारिक रूप से रुढ़िवादी अब रातों-रात व्यवहारिक उदारवादी बन गए हैं. जो लोग आमतौर पर सरकार को नापसंद करते हैं, वो इस मुश्किल वक़्त में सरकार के ही भरोसे हैं. कॉरपोरेट अमरीका, जो आम तौर पर संघीय सरकार की दख़लंदाज़ी से डरता है, वो अब सरकारी आर्थिक मदद के लिए बेक़रार है.

इन कंपनियों में सरकार के स्टिमुलस पैकेज को लेकर बेक़रारी इस क़दर है कि, जो कंपनियां आमतौर पर आपूर्ति करने में कंजूसी बरतती आई हैं, वही अब खुले दिल से ख़र्च कर रही हैं. यहां तक कि सबके लिए बुनियादी आमदनी के जिस विचार को डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार एंड्र्यू यांग ने प्रस्तावित किया था. वो आज सबको स्वीकार्य लग रहा है. अब अमरीकी सरकार, देश के हर नागरिक को 1200 डॉलर देने का इरादा रखती है.

इस संकट के समय जब राष्ट्रव्यापी क़दम उठाने की मांग हो रही है. ऐसे में हमें याद रखना चाहिए कि किस तरह पिछले चालीस वर्षों में संघीय सरकार को लगातार नीचा दिखाया गया है. ख़ासतौर पर तब से जब से रोनाल्ड रीगन सत्ता में आए थे और उनका सियासी विरोध करना, सरकार के अधिकारों की मुख़ालफ़त बन गया था.

2018 में किसी महामारी के वक़्त ज़िम्मेदारी उठाने वाली राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की विशेष टीम को भंग कर दिया गया था. ऐसे में, महामारी की रोकथाम के लिए सबसे ज़रूरी क़दम यानी, पर्याप्त मात्रा में टेस्ट कर पाने में नाकामी का सीधा संबंध स्वास्थ्य एवं मानवीय सेवाओं के विभाग को फ़ंड की कमी से है.

वीडियो कैप्शन, जंग से बेहाल सीरिया के 10 लाख लोग अपने घर बार से दूर कैंपों में रह रहे हैं.

अमरीका कई बार जांच चुका था अपनी ताक़त

जैसा कि 11 सितंबर 2001 के आतंकवादी हमले से पहले हुआ था, इस बार भी सरकार ने कोरोना वायरस के प्रकोप को लेकर बार-बार दी गई चेतावनियों को अनदेखा किया. हाल के वर्षों में, किसी महामारी से लड़ने की अमरीका की तैयारी कितनी अच्छी है, इसका अंदाज़ा लगाने के लिए कई बार टेस्ट किए गए हैं.

इनमें से एक परीक्षण में चीन में पैदा हुए ऐसे वायरस को लेकर भी स्वास्थ्य सेवाओं की तैयारी का परीक्षण किया गया था, जो इंसान के सांस लेने के सिस्टम पर हमला करता था. इस टेस्ट के दौरान अमरीका की तैयारियों में वही कमियां सामने आई थीं, जो अब सामने आ रही हैं. जैसा कि समुद्री तूफ़ान कैटरीना के दौरान हुआ था.

केंद्रीय आपातकालीन प्रबंधन एजेंसी यानी FEMA मौजूदा संकट से निपटने में अब भी संघर्ष कर रही है. हमेशा की तरह, अब भी हम केंद्रीय एजेंसियों और राज्य स्तरीय सरकारी संगठनों के बीच खींच-तान होते देख रहे हैं. सरकार का जिस तरह से संस्थागत पतन हुआ है, इसका नतीजा एकदम साफ़ दिखता है.

सरकारी व्यवस्था के स्तर में गिरावट की वजह से ही आज बहुत से अमरीकी नागरिक, व्यवस्था से अधिक एक व्यक्ति यानी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर ज़्यादा भरोसा करते हैं. फिर चाहे मास्क और सुरक्षात्मक गाउन की कमी हो. या फिर शुरुआत में वायरस की टेस्टिंग करने वाली की किट की कमी.

इसी वजह से दुनिया का सबसे अग्रणी देश होने के दावे पर आज यक़ीन करना मुश्किल हो रहा है. जहां तक इससे पहले आए संकटों की बात है, तो दुनिया की सबसे शक्तिशाली महाशक्ति उससे निपटने के लिए पूरी दुनिया को एकजुट करके उसकी अगुवाई करने में सफल रही थी.

लेकिन, अब कोई भी अमरीका से इसकी उम्मीद ही नहीं करता. अलग-थलग रहने की, और अमरीका पहले की तीन साल पुरानी नीति के कारण एक ऐसी भूराजनीतिक परिस्थिति पैदा हुई है. जिसमें तमाम देश, अमरीका से सोशल डिस्टेंसिंग कर रहे हैं. और इस संकट ने हमें याद दिलाया है कि अटलांटिक पार के अमरीका के सबसे क़रीबी सहयोगियों से भी हमारे मज़बूत संबंधों में दरार आ गई है.

यूरोपीय देशों से आवाजाही पर पाबंदी को ही लीजिए. राष्ट्रपति ट्रंप ने इसकी घोषणा अपने ओवल ऑफ़िस से राष्ट्र के नाम संदेश में की. इससे पहले उन्होंने अमरीका की इस पाबंदी से प्रभावित होने वाले देशों को आगाह भी नहीं किया. यूरोपीय यूनियन ने इसकी शिकायत एक सार्वजनिक बयान के ज़रिए की, जो अमरीका और यूरोप के संबंधों के लिहाज़ से एकदम असामान्य बात थी. यूरोपीय यूनियन ने अपने बयान में, डोनाल्ड ट्रंप के इस फ़ैसले को, 'इकतरफ़ा और बिना सलाह-मशविरे के लिया गया निर्णय' करार दिया था.

न ही अमरीका ने अब तक दुनिया के सामने इस बात की मिसाल पेश की है कि कोरोना वायरस के प्रकोप से कैसे निपटा जाए. जबकि, अपने व्यापक परीक्षण के माध्यम से दक्षिण कोरिया और जापान इस संकट से निपटने की मिसाल पेश कर चुके हैं.

चीन ने भी, सख़्त लॉकडाउन के माध्यम से अपनी तानाशाही प्रशासनिक व्यवस्था के फ़ायदों की मिसाल दुनिया के सामने रखी है. चीन का उदाहरण तब और चिंता का विषय बन जाता है, जब हम पश्चिमी देशों की उदारवादी व्यवस्था को लड़खड़ाते देख रहे हैं.

उम्मीद यही की जानी चाहिए कि कोई भी इस बात को न भूले कि चीन ने किस तरह कई हफ़्तों तक वायरस के प्रकोप को छुपाने की कोशिश की. और जिन लोगों ने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई, उन्हें उस वक़्त भी ख़ामोश कर दिया, जब वायरस का संक्रमण बड़ी तेज़ी से फैल रहा था.

इन क़दमों से चीन की तानाशाही व्यवस्था का बेहद बदनुमा चेहरा सामने आ गया है. लेकिन, जहां इस संकट से निपटने के लिए चीन ने केवल दस दिनों में एक अस्पताल बना डाला. वहीं, अमरीकी रक्षा मंत्रालय को नौसेना के अस्पताल वाले अपने एक जहाज़ को वर्जिनिया बंदरगाह से न्यूयॉर्क के पोर्ट तक लाने में ही कई हफ़्ते लग जाएंगे.

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वायरस अमरीका का इतिहास बदल देगा

राजनीतिक रूप से देखें, तो वायरस संकट के कई नतीजे देखने को मिलेंगे. उदाहरण के लिए जब जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने सरकारी रुढ़िवाद को बढ़ावा देना शुरू किया. या फिर बराक ओबामा, अश्वेतों के बजाय गोरों के हितों को तरजीह देते दिखे, तो उनके ख़िलाफ़, टी पार्टी के रूप में एक नया सियासी अभियान सामने आया था.

टी पार्टी का आधिकारिक इतिहास कहता है कि ये आंदोलन 3 अक्टूबर 2008 को तब शुरू हुआ था, जब राष्ट्रपति बुश ने ट्रबल्ड एसेट रिलीफ़ प्रोग्राम के क़ानून पर दस्तख़त किए थे. और इसके ज़रिए नाकाम हो चुके बैंकों को बचाने का काम अमरीकी सरकार ने किया था. टी पार्टी की नज़र में सरकार का ये क़दम, सार्वजनिक जीवन में दख़लंदाज़ी की ऐसी मिसाल थी, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता था.

इसी तरह, ये बात भी याद रखने लायक़ है कि इक्कीसवीं सदी के अमरीकी इतिहास में उठा-पटक की दो बड़ी घटनाएं हुईं.

पहली थी, न्यूयॉर्क के ट्विन टॉवर पर आतंकवादी हमला. और दूसरी थी, लेहमन ब्रदर्स बैंक का दिवालिया होना. इन दोनों घटनाओं के कारण अमरीकी राजनीति में ज़बरदस्त ध्रुवीकरण देखने को मिला था.

9/11 के हमले के बाद, अमरीका में जो सियासी एकजुटता देखने को मिली थी. वो बेहद नाज़ुक साबित हुई और इराक़ पर हमले के बुश प्रशासन के फ़ैसले के कारण टूट कर बिखर गई थी. इसी तरह 2008 के वित्तीय संकट ने टी पार्टी को जन्म दिया. साथ ही साथ इसने रिपब्लिकन पार्टी को और कट्टरपंथी झुकाव के लिए मजबूर कर दिया.

अब नए कोरोना वायरस के प्रकोप का इस साल होने वाले अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव पर क्या असर पड़ेगा? जिस तरह डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जो बिडेन का अभियान कमोबेश ख़त्म हो जाने के बाद फिर से जी उठा है, उससे संकेत साफ़ हैं कि डेमोक्रेटिक पार्टी के वोटर तो, ऐसे किसी बदलाव या क्रांति के लिए तैयार नहीं हैं, जिसका वादा बर्नी सैंडर्स कर रहे हैं.

डेमोक्रेटिक पार्टी के वोटर तो सामान्य सियासी व्यवस्था को ही चलने के पक्षधर मालूम होते हैं. 78 बरस के जोसेफ़ बिडेन का राष्ट्रपति चुनाव के लिए अभियान, कमोबेश पटरी से उतर ही गया था, क्योंकि वो किसी बड़े बदलाव के बजाय लीपा-पोती के साथ मौजूदा सियासी सिस्टम को चलाने की ही बातें कर रहे थे. लेकिन, जिस तरह उन्होंने मज़बूत उम्मीदवार के तौर पर वापसी की है, उससे साफ़ है कि हम सामाजिक तौर पर कितने अजब दौर से गुज़र रहे हैं.

बहुत से अमरीकी नागरिकों को ठीक उसी हमदर्दी और निजी गर्मजोशी की तलब महसूस हो रही है, जिसके लिए जोसेफ़ बिडेन जाने जाते हैं. यहां तक कि कोरोना वायरस के प्रकोप के शिकंजा कसने से पहले ही बिडेन ने अपनी पुनर्स्थापना या वापसी को अपनी सियासी धुन बना लिया था. ठीक उसी तरह जिस तरह का उनका जीवन रहा है.

बहुत से लोग ये भी चाहते हैं कि नया राष्ट्रपति ऐसा हो, जो पर्दे के पीछे से काम करने को तरज़ीह दे. व्हाइट हाउस के ओवल ऑफ़िस में ऐसा शख़्स बैठे, जो नौटंकी कम करता हो. जो शास्त्रीय संगीत जैसा मद्धम और सुरीला हो. न कि शोर मचाने वाला मेटल संगीत.

मतलब ये कि आज अमरीकी लोग सामान्य हालात की ओर वापसी करना चाहते हैं. लेकिन, मौजूदा हालात में कोई भविष्यवाणी करने का जोखिम कौन ले? कुछ हफ़्ते पहले की ही तो बात है, जब आयोवा कॉकस में हुआ हंगामा बहुत बड़ी ख़बर थी. जब हम जोसेफ बिडेन का सियासी करियर ख़त्म हो जाने का अंदाज़ा लगा रहे थे.

इसके अलावा, हम अगले कई महीनों तक हालात सामान्य होने की उम्मीद नहीं कर सकते. बल्कि हो सकता है कि इसमें बरसों लग जाएं. इसके बजाय, इस बात की संभावना ज़्यादा है कि कोरोना वायरस, अमरीकी राजनीति का रंग रूप ठीक उसी तरह बदल डाले, जैसे बदलाव हमने पिछली एक सदी में हुई ऐतिहासिक घटनाओं के कारण होते देखे हैं.

बीसवीं सदी के तीसरे दशक में आई महान मंदी से फ्रैंकलिन डिलानो रूज़वेल्ट की न्यू डील का जन्म हुआ था. और इसी के साथ, जन कल्याण के कार्यक्रमों और सामाजिक सुरक्षा के ज़रिए, अमरीकी सरकार की ताक़त का बड़े पैमाने पर विस्तार हुआ था.

महान मंदी या द ग्रेट डिप्रेशन के चलते, अमरीकी जन-जीवन में सरकार के व्यापक दख़ल की समर्थक, डेमोक्रेटिक पार्टी बेहद शक्तिशाली होकर उभरी थी. वर्ष 1932 के बाद से डेमोक्रेटिक पार्टी ने लगातार पांच राष्ट्रपति चुनावों में जीत हासिल की थी.

दूसरे विश्व युद्ध के कारण आए अन्य सामाजिक बदलावों के साथ-साथ अश्वेतों की समानता के आंदोलन को तेज़ी मिली थी. क्योंकि अफ्रीकी मूल के अमरीकी सैनिकों ने फासीवाद के ख़िलाफ़ उसी तरह ख़ून बहाया था, जिस तरह गोरों सैनिकों ने. फिर जब ये अश्वेत सैनिक अपने वतन लौटे तो उन्होंने अपने लिए बराबरी के नागरिक अधिकारों की मांग उठाई.

1937 में कैलिफ़ॉर्निया में एक प्रवासी मज़दूर

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इमेज कैप्शन, 1937 में कैलिफ़ॉर्निया में एक प्रवासी मज़दूर

इसी तरह 11 सितंबर 2001 के आतंकवादी हमले ने बहुत से अमरीकियों को अप्रवासियों के आगमन और धार्मिक विविधता के ख़िलाफ़ कर दिया. और, 2008 की भयंकर आर्थिक मंदी ने अमरीकन ड्रीम पर से लोगों के भरोसे को झकझोर डाला था.

कोरोना वायरस के प्रकोप से अमरीका में क्या बदलाव आएंगे, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि अमरीका इस संकट का सामना कैसे करता है.

उदारवादियों को शायद ये उम्मीद है कि इस संकट से सबके लिए स्वास्थ्य व्यवस्था के क़ानून की ज़रूरत, अमरीकी नागरिक और शिद्दत से महसूस करेंगे. उन्हें ये अपेक्षा होगी कि इससे अमरीकी पूंजीवाद के परिदृश्य पर सरकार का उसी तरह विस्तार होगा, जैसा हमने पिछली सदी के चौथे दशक में न्यू डील के ज़रिए होते देखा था. जिसमें तथ्यों पर आधारित राजनीति पर ज़ोर होगा. जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए और सख़्त क़दम उठाए जाएंगे. क्योंकि ग्लोबल वॉर्मिंग एक ऐसा संकट है, जिसमें पूरी दुनिया की व्यवस्था को चरमरा देने और संकट में डुबो देने की शक्ति है.

वहीं, कट्टरपंथी शायद ये नतीजा निकालें कि सरकार के बजाय निजी क्षेत्र में ऐसे संकटों का सामना करने की ताक़त ज़्यादा है. जिससे सरकार के विस्तार के ख़िलाफ़ उनकी आवाज़ और बुलंद होगी. वो ये भी तर्क देंगे कि बंदूक रखने के क़ानूनों में और छूट दी जानी चाहिए. ताकि, आम अमरीकी नागरिक अपनी हिफ़ाज़त और बेहतर ढंग से कर सकें. और, उनका ये भी मानना होगा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सरकार का शिकंजा और उसकी निगरानी नहीं बढ़ेगी.

हर रोज़ जब मैं काम के लिए अपने घर से निकलता था, तो मैं उस स्मारक से होकर गुज़रता था, जहां पर कभी न्यूयॉर्क के वो ट्विन टावर बुलंदी से खड़े थे, जो 9/11 के आतंकी हमले में ध्वस्त हो गए थे.

वहां से गुज़रते हुए मैं बहुत से लोगों को स्मारक पर फूल चढ़ाते और ख़ामोशी से दुआएं मांगने देखता आया था. कई बार मेरे ज़हन में ख़याल आता था कि क्या मैं कभी, दुनिया को बदल डालने वाली इससे भी बड़ी घटना की कवरेज करूंगा. और आज जब मैं अपनी खिड़की से बाहर सन्नाटे भरे शहर की भयावाह तस्वीर देखता हूं, तो मुझे लगता है कि ये न्यूयॉर्क नहीं कोई भुतहा शहर है. और ऐसे डरावने मंज़र को देखते हुए मुझे ये एहसास होता है कि शायद हम दुनिया को बदल डालने वाले 9/11 से भी बड़ी घटना के गवाह बन रहे हैं.

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