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कोरोना वायरस का कहर अब डीज़ल-पेट्रोल की क़ीमतों पर
कोरोना वायरस से उपजे संकट का असर अब दुनिया के तेल बाज़ार पर भी दिख सकता है.
माना जा रहा है कि दुनिया के बड़े तेल उत्पाद इस वजह से अपने उत्पादन में कटौती कर सकते हैं.
अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल क़ीमतों को बरकरार रखने की मांग के मद्देनज़र तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक और उसके सहयोगियों की इस सप्ताह एक बैठक होने की संभावना है.
कच्चे तेल की साल भर की क़ीमतों के लिहाज से देखें तो इस समय कच्चे तेल की क़ीमतें अपने निम्नतम स्तर पर हैं.
जनवरी से इसकी क़ीमत में 20 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गई है.
क्यों गिर रही है तेल की क़ीमतें?
कोरोना वायरस संक्रमण की वजह से चीन के बड़े हिस्से में नए साल की छुट्टियां बढ़ा दी गई हैं और साथ ही यात्रा प्रतिबंध भी लागू हैं.
इसी वजह से फ़ैक्ट्रियां, दफ़्तर और दुकान बंद हैं. इसका एक मतलब ये भी है कि दुनिया में कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीददार अब कम तेल खरीद रहा है.
चीन सामान्य तौर पर हर दिन औसतन एक करोड़ चालीस लाख बैरल तेल खपत करता है. लेकिन अभी ऐसा होना मुश्किल है.
चीन में यात्रा प्रतिबंध लागू हैं और सड़कों पर यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ है. कोरोना संकट की वजह से हवाई जहाजों के काम आने वाले जेट फ़्यूल भी कम खपत हो रही है. साथ ही अंतरराष्ट्रीय विमान सेवाओं में भी कटौती की जा रही है.
तेल की मांग में कमी
इस हफ़्ते आई ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक़ चीन में कच्चे तेल की खपत में 20 फ़ीसदी की गिरावट आई है.
चीन की घरेलू खपत में ये गिरावट उतनी ही है जितनी इटली और ब्रिटेन को मिलाकर तेल की ज़रूरत पड़ती है.
एशिया की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी सिनोपेक ने कच्चे तेल की प्रोसेसिंग में 12 फीसदी यानी छह लाख बैरल प्रतिदिन की कटौती की है.
चीन की सरकारी स्वामित्व वाली इस कंपनी की पिछले एक दशक में ये सबसे बड़ी कटौती है.
शिकागो में मौजूद ऑयल कंसल्टेंट फिल फ़्लिन के अनुसार इस कटौती का झटका पूरी दुनिया के तेल बाज़ार को लगा है.
वो कहते हैं, "हमने मांग में इतने बड़े पैमाने पर इतनी जल्दी पहले कभी ऐसी कमी नहीं देखी थी."
कोरोना संकट का दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर?
चीन में व्यापारिक गतिविधियों में आई गिरावट का नतीज़ा साफ़ तौर पर तेल की मांग में कमी के रूप में देखा जा सकता है.
ये चीन के आर्थिक विकास के रफ़्तार के बारे में भी काफी कुछ कहता है जो पहले से ही पिछले तीन दशक के अपने सबसे निचले स्तर पर है.
माना जा रहा है कि इस घटना से चीन की अर्थव्यवस्था में और सुस्ती आ सकती है.
चीन में सरकार समर्थक थिंक टैंक चाइनीज़ अकैडमी ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के अर्थशास्त्री झांग मिंग का कहना है कि कोरोना वायरस की वजह से देश की अर्थव्यवस्था साल के पहले तीन महीने में पांच फीसदी से कम हो सकती है.
चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. इस लिहाज से दुनिया की अर्थव्यवस्था में जो तरक्की हो रही है, चीन की उसमें एक अहम भूमिका है.
इसलिए अगर चीन पर कोरोना वायरस के संकट का नकारात्मक असर पड़ता है तो इसका झटका दुनिया भर में यकीनन महसूस किया जाएगा.
इस हफ़्ते अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जिवा ने कहा था कि कोरोना संकट की वजह से थोड़े समय के लिए ही सही पर वैश्विक अर्थव्यवस्था के सुस्त पड़ने की संभावना है.
हालांकि उन्होंने एहतियात बरतते हुए ये भी कहा कि आगे के बारे में ज़्यादा कुछ कहना फिलहाल जल्दबाज़ी होगी.
तेल उत्पादक क्या कर सकते हैं?
दुनिया के बड़े तेल उत्पादक तेल उत्पादन में कटौती पर चर्चा कर रहे हैं. सोमवार को ओपेक के सदस्य देश ईरान ने तेल क़ीमतों को स्थिर रखने की सार्वजनिक तौर पर मांग की है.
ऐसी ख़बरें हैं कि रूस समेत ओपेक प्लस के देश इस हफ़्ते होने वाली एक बैठक में तेल उत्पादन में पांच लाख से दस लाख बैरल प्रति दिन की कटौती करने के बारे में बात करेंगे.
कंसल्टेंसी फर्म सीएमसी मार्केट्स के मार्ग्रेट यांग का कहना है कि ऊर्जा बाज़ार पांच लाख बैरल प्रति दिन के दर उत्पादन में कटौती की उम्मीद कर रहा है.
वो कहती हैं, "अगर हालात और बिगड़े तो हम तेल उत्पादन में और कटौती की संभावना से इनकार नहीं करेंगे."
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