ब्रिटेन: ब्रैड्फ़र्ड में दिखे लोकतंत्र के दो रंग

ब्रैड्फ़र्ड कॉलेज में आयोजित एक चुनावी सभा
    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, ब्रैड्फ़र्ड

ब्रिटेन में 12 दिसंबर को होने वाले आम चुनाव की मुहिम के दौरान हमने लोकतंत्र का सबसे अच्छा रूप देखा और सब से ख़राब भी. इसका अनुभव हमें पिछले हफ़्ते ब्रैड्फ़र्ड में हुआ.

एक तरफ़ लोकतांत्रिक परंपरा के अनुसार मतदाताओं ने ब्रैड्फ़र्ड कॉलेज में आयोजित एक चुनावी सभा में उमीदवारों के दावों और वादों को सख़्त चुनौती दी. दूसरी तरफ़ उम्मीदवारों से ग़ैर लोकतांत्रिक बिरादरी स्टाइल ऑफ़ वोटिंग को जड़ से ख़त्म करने का वादा नहीं लिया.

"हस्टिंज़" कही जाने वाली इस सभा में सबसे चुभते सवाल महिलाओं ने किए, लेकिन चुनाव में बिरादरी या क़बीले के प्रभाव को कम करने पर किसी ने सवाल नहीं किया. वहाँ बैठे कुछ लोग मायूस नज़र आए.

मौक़ा अच्छा था. मुद्दा पुराना है. इसने ब्रैड्फ़र्ड को एक बुरा नाम दिया है. महिलाएँ इससे अधिक प्रभावित हुई हैं.

मंच पर एक ही ज़िले में तीन अलग-अलग चुनावी क्षेत्र की तीन महिला उम्मीदवार अपने वोटरों से रूबरू थीं. ऐसा लग रहा था कि कॉलेज के छात्र संघ का चुनाव है. माहौल अनौपचारिक था.

उम्मीदवारों के आगे-पीछे ना कोई ख़ुशामद कर रहा था और ना ही उनके इर्द-गिर्द सुरक्षाकर्मी घूम रहे थे.

दरअसल जब तीनों उम्मीदवारों ने अपनी जगह ली तो हॉल में कोई हलचल नहीं मची. मुझे लगा अभी उम्मीदवार हाज़िर होने वाले हैं.

आम चुनाव के कारण चुनावी बैठकें ज़रूर हो रही हैं लेकिन आपको महसूस ही नहीं होगा कि चुनाव सिर पर सवार है.

सब कुछ सामान्य लग रहा है. चुनाव के कुछ पोस्टर ज़रूर मिल जाएँगे लेकिन इसकी चर्चा आम तौर से टीवी स्टूडियोज़ तक सीमित है.

ब्रैड्फ़र्ड की एक अलग दुनिया

सायरा शाकिर
इमेज कैप्शन, सायरा शाकिर, लीड्स ट्रिनिटी यूनिवर्सिटी

ब्रैड्फ़र्ड पश्चिम सीट से पिछले दो चुनाव जीतने वाली नाज़ शाह लेबर पार्टी की तरफ़ से एक बार फिर से चुनाव में उमीदवार हैं.

कंज़र्वेटिव पार्टी की लिंडन केमाकरण और लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी की जेनेट संडरलैंड ब्रैड्फ़र्ड की अतिरिक्त दो सीटों से उम्मीदवार हैं.

बेरोज़गारी से लेकर युवाओं के भविष्य और महिलाओं के ख़िलाफ़ भेदभाव तक सभी मुद्दों पर सवाल किए गए.

एक ज़िले से तीन महिला उम्मीदवार शायद इस बात को दर्शाता है कि राजनीति में औरतों के साथ भेदभाव नहीं है. लेकिन सच तो ये है कि ब्रैड्फ़र्ड में महिलाएँ भेदभाव की शिकार हैं.

बिरादरी वोटिंग इसका एक उदाहरण है. साल 2015 में हुए चुनाव में लेबर पार्टी की उम्मीदवार अमीना अली ने उम्मीदवार चुने जाने के तीन दिन बाद इस्तीफ़ा दे दिया था.

उस समय उन्होंने बिरादरी नेताओं को इसका ज़िम्मेदार ठहराया था जो उनसे ख़ुश नहीं थे. उनकी जगह पर नाज़ शाह पार्टी की उम्मीदवार बनीं और चुनाव जीतीं. उस समय कहा गया कि शाह को बिरादरी नेताओं का समर्थन हासिल था.

बिरादरी स्टाइल ऑफ़ वोटिंग का "रोग" ब्रैडफर्ड के पाकिस्तानी समुदाय की पहली और दूसरी पीढ़ी में ज़माने से लगा है.

सवाल बिरादरी का

ब्रैड्फ़र्ड कॉलेज में आयोजित एक चुनावी सभा

इस सिस्टम के अंतर्गत बिरादरी या क़बीले के बड़े-बुज़ुर्ग उम्मीदवार चुनने में अहम भूमिका निभाते हैं. दूसरी तरफ़ अपने घरों में सभी सदस्यों के, ख़ासतौर से औरतों के वोट उनसे पूछे बिना ख़ुद वोट डाल आते हैं.

लेबर पार्टी की उम्मीदवार नाज़ शाह ब्रैड्फ़र्ड में इसी तरह के समाज में पली बढ़ी हैं.

वो कहती हैं, "बिरादरी स्टाइल की राजनीति एक ऐसा मुद्दा है जिसके बारे में मैं तबसे बात कर रहा हूं जबसे मैं साल 2015 में सांसद बनी. बल्कि उससे भी पहले से. मैं इस मुद्दे को अब भी उठाती हूँ क्योंकि यह अभी भी हमारे समुदायों के कुछ हिस्सों में प्रचलित है."

वो इस मुद्दे को एक रोग मानती हैं और कहती हैं, "यह लोकतंत्र के लिए एक ख़तरा है, यह एक कैंसर है जिसे जड़ से खत्म करने की जरूरत है."

ब्रैड्फ़र्ड की आबादी का 43 प्रतिशत हिस्सा दक्षिण एशिया मूल का है जिसमें बहुमत पाकिस्तानी कश्मीर से आए लोगों का है जहां समाज में कबीलों के बुज़ुर्गों की बात टालना बुज़ुर्ग की तौहीन के समान है.

पाकिस्तानी कश्मीर के एक परिवार की शगुफ़ता बीबी ने अपने परिवार में बिरादरी वोटिंग का असर देखा है. वो दबंग थीं लेकिन अंदर से डरी थीं. हिजाब में लिपटी वो कैमरे पर बात करने को इस शर्त पर राज़ी हुईं कि हम उनका खुला चेहरा केवल साइड से दिखा सकते हैं.

वो कहती हैं, "मैंने अपने घर में ऐसा होते देखा है. मुझे इस पर अपने परिवार से बहुत नाराज़गी थी. आप जानते हैं कि हमने वोट का अधिकार पाने के लिए कितना संघर्ष किया था और आप उन्हें ऐसे लोगों द्वारा छीन लेने देंगे जिन्हें आप फिर कभी नहीं देख पाएंगे. लोगों ने इस बात का कभी विश्लेषण नहीं किया और वोट लेने आने वाले बिरादरी के लोगों ने अपनी जेब भरने के अलावा कभी कुछ नहीं किया. ब्रैडफर्ड की जितनी भ्रष्ट राजनीति है, शायद भारत और पाकिस्तान की भी नहीं है."

यहाँ की मुस्लिम संस्थाएं महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं.

'भविष्य के बारे में आवाज़ उठा रहे हैं'

ब्रैड्फ़र्ड कॉलेज में आयोजित एक चुनावी सभा

मुस्लिम महिला परिषद, ब्रैड्फ़र्ड की ख़ालिदा अशर्फ़ी कहती हैं, "परिवार के लीडर की बात मानना एक इज़्ज़त की बात होती है. मेरे ख़याल में शिक्षा की कमी है. अगर हम औरतों और मर्दों को इस बात की शिक्षा देते हैं कि मत डालने का मक़सद सिर्फ़ ये नहीं है कि आप किसी का साथ दे रहे हैं बल्कि आप आने वाली नस्ल के भविष्य के बारे में आवाज़ उठा रहे हैं. मेरे विचार में इस मुद्दे से जूझने का ये बेहतर तरीक़ा है."

ब्रैडफ़र्ड की बेटी नाज़ शाह कहती हैं कि नयी पीढ़ी बिरादरी वोटिंग से प्रभावित नहीं हैं.

वो कहती हैं, "लोग अब इससे ऊब गए हैं. इस तरह की राजनीति के लिए पश्चिमी लोकतंत्र में कोई जगह नहीं है. युवा इस तरह की बिरादरी की राजनीति से पूरी तरह से दूर हो गए हैं. हम एक पश्चिमी देश में रहते हैं और हमें ऐसा ही व्यवहार करने की ज़रूरत है."

ब्रितानी सरकार ने इस परंपरा को रोकने के लिए कई कदम उठाए हैं. इसमें शामिल लोगों के ख़िलाफ़ अदालती कार्रवाइयाँ भी हुई हैं. साल 2005 के एक केस में चार व्यक्ति जेल की सज़ा भी काट चुके हैं.

कश्मीर से आकर बसने वाला पाकिस्तानी समुदाय अब शिक्षित है. नयी पीढ़ी बिरादरी वोटिंग को ठुकरा चुकी है. अब ये परंपरा टूट रही है.

लीड्ज़ विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर सायरा शाकिर कहती हैं, "मुझे खुद इस तरह का अनुभव नहीं हुआ है, लेकिन मुझे लगता है कि समय अब काफी बदल गया है. लोग अपनी मर्ज़ी से वोट डालने में सक्षम होने के लिए अधिक सशक्त महसूस करते हैं. वो ये फैसला ले सकते हैं कि वे किस राजनीतिक दल के लिए वोट करना चाहते हैं. "

वीडियो कैप्शन, ब्रिटेन के चुनाव में कश्मीर क्यों बना है मुद्दा?

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