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गोटाभाया राजपक्षे: सफ़ेद रंग की वैन और डेथ स्क्वैड का वो दौर
- Author, बीबीसी मॉनिटरिंग
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
श्रीलंका के नए राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे एक ऐसे शख़्स हैं जिन्हें लेकर उनके मुल्क में लोगों की राय बंटी हुई है.
गोटाभाया के समर्थक अलगाववादी एलटीटीई के दमन के दौरान उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के लिए उनकी सराहना कर रहे हैं.
श्रीलंका का गृह युद्ध साल 2009 में ख़त्म हुआ था और गोटाभाया राजपक्षे तब श्रीलंका के रक्षा मंत्री हुआ करते थे.
वहीं, उन पर इस गृह युद्ध के दौरान मानवाधिकारों के दमन का भी आरोप है.
शनिवार को हुए चुनावों के बाद सत्ता में उनकी वापसी ने एक तबक़े में बेचैनी पैदा कर दी है. कुछ विश्लेषक नस्लीय तनाव की चिंता जता रहे हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जो गोटाभाया राजपक्षे के वादों से उम्मीद बंधाए हुए हैं.
पांच साल तक देश का नेतृत्व
श्रीलंका इसी साल ईस्टर के मौक़े पर हुए बम धमाकों के बाद आज भी इससे उबरने की कोशिश कर रहा है.
ये धमाके ख़ुद को इस्लामिक स्टेट कहने वाले चरमपंथी संगठन ने करवाये थे और इसमें 250 से ज़्यादा लोग मारे गए थे.
लेकिन ऐसे लोग भी हैं जिन्हें इस बात पर हैरत होती है कि क्या ये वही गोटाभाया राजपक्षे हैं जो अगले पांच साल तक इस द्वीपीय देश का नेतृत्व करेंगे.
इन लोगों की यादों में वो मनहूस दिन आज भी ताज़ा हैं जब राजनीतिक विरोध या एलटीटीई से सहानुभूति रखने के नाम पर किसी को भी अग़वा कर लिया जाता था.
अग़वा करने वाले गिरोह के लोग अनाम हुआ करते थे लेकिन इस तरह के अपहरण में हमेशा ही सफ़ेद रंग की वैन का इस्तेमाल किया जाता था.
ताक़तवर राजघराने से...
गोटाभाया राजपक्षे श्रीलंका के सबसे ताक़तवर राजघराने से ताल्लुक़ रखते हैं. उनके पिता सांसद और कैबिनेट मंत्री भी रहे थे.
उनके बड़े भाई महिंदा राजपक्षे दो बार देश के राष्ट्रपति रह चुके हैं. पिछली सरकारों में गोटाभाया के दो और भाई भी बड़े ओहदों पर रह चुके हैं.
नौ भाई-बहनों में पांचवें नंबर के गोटाभाया का जन्म 1949 में हुआ था और वो श्रीलंका के बहुसंख्यक सिंहला समुदाय से आते हैं.
साल 1971 में गोटाभाया सेना में शामिल हो गए और श्रीलंका मिलिट्री अकादमी से ट्रेनिंग लेने के बाद वो 20 साल सर्विस में रहे.
सेना की नौकरी छोड़कर उन्होंने आईटी सेक्टर का दामन थामा. 1998 में राजपक्षे परिवार अमरीका चला गया. 2005 में वापसी के बाद उसी साल महिंदा राजपक्षे राष्ट्रपति बने.
गृहयुद्ध और दमन का दौर
महिंदा ने गोटाभाया को अपनी सरकार में पहले 2005 में और फिर 2010 में रक्षा मंत्री बनाया. इस रोल में गोटाभाया ने श्रीलंका के इतिहास में एक अहम भूमिका निभाई.
दोनों भाइयों की निगरानी में चली सैन्य कार्रवाई का नतीजा साल 2009 में तमिल अलगाववादी संघर्ष की समाप्ति के साथ आया.
कहा जाता है कि 25 सालों तक चले इस संघर्ष में एक लाख लोगों ने अपनी जान गंवाई.
गृह युद्ध ख़त्म होने के बाद श्रीलंका में ज़्यादातर लोगों ने जश्न मनाया लेकिन बहुत से सवाल आज तक जवाब का इंतज़ार कर रहे हैं.
अलग तमिल राष्ट्र की मांग कर रहे एलटीटीई के दमन के दौरान हज़ारों लोग ग़ायब हो गए. इनमें से बहुत से लोगों के बारे में कहा जाता है कि उन्हें यंत्रणा दी गई या फिर मार दिया गया.
मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप
युद्ध ख़त्म होने के बाद भी लोगों के अचानक ग़ायब होने का सिलसिला रुका नहीं.
कारोबारी लोग, पत्रकार, ऐक्टिविस्ट, राजपक्षे की सरकार के विरोधी के तौर पर देखे जाने वाले लोग उठा लिए गए और वो फिर कभी दिखाई नहीं दिए.
हालांकि राजपक्षे सरकार ने इन मामलों की किसी भी तरह की संलिप्ता के आरोपों से इनकार किया था.
लेकिन इस घटनाक्रम के समय रक्षा मंत्री रहे गोटाभाया राजपक्षे पर मानवाधिकार उल्लंघन के सीधे आरोप लगे थे.
साथ ही ये भी माना जाता है कि एक दशक पहले गृह युद्ध के दौरान सुरक्षा के मुद्दे पर उनके इसी कड़े रुख़ का फ़ायदा उन्हें 2019 के चुनावों में मिला.
नागरिकता विवाद
चुनाव प्रचार के दौरान गोटाभाया ने कहा भी था, "हम इस बात की गारंटी देते हैं कि इस देश में चरमपंथ के लिए ज़रा सी भी गुंजाइश नहीं छोड़ेंगे. ठीक उसी तरह जैसे हमने अतीत में चरमपंथ ख़त्म कर दिया था."
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि चुनावी मैदान में केवल एक वही हैं जो देश की सौ फ़ीसदी सुरक्षा करने में समर्थ हैं.
लेकिन कथित युद्ध अपराध ही ऐसी एक वजह नहीं थी जिसे लेकर गोटाभाया राजपक्षे सुर्ख़ियों में आए.
इस साल हुए चुनाव की शुरुआत में राजनीतिक विरोधियों ने उनकी नागरिकता का सवाल भी उठाया. हालांकि गोटाभाया बार-बार ये कहते रहे हैं कि उन्होंने अपनी अमरीकी नागरिकता छोड़ दी है.
अगस्त, 2016 में उन पर सरकारी हथियारों की हेरा-फेरी को लेकर भ्रष्टाचार के आरोप लगे पर गोटाभाया इससे इनकार करते हैं.
विकीलीक्स का रहस्योद्घाटन
कोलंबो में एक अमरीकी कूटनयिक के भेजे संदेश के आधार पर विकीलीक्स ने ये दावा किया था कि साल 2009 में कथित तौर पर तमिलों की बड़ी संख्या में हत्या के पीछे श्रीलंकाई राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे का हाथ था.
श्रीलंका में अमरीकी राजदूत पेट्रिशिया बूटेनिस ने अपने संदेश में कहा था, "श्रीलंका की स्थिति और भी जटिल है क्योंकि कई कथित अपराधों का दोष देश के नेताओं और सेना के ज़िम्मे है जिसमें महिंदा राजपक्षे, उनके भाई गोटाभाया राजपक्षे और जनरल सनथ फॉनसेका शामिल हैं."
जनरल सनथ फॉनसेका ने 2009 के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान अपने प्रचार में दावा किया था कि "राष्ट्रपति के भाई और रक्षा मंत्री गोटाभाया राजपक्षे ने आत्मसमर्पण की कोशिश करने वाले तमिल चरमपंथियों को भी गोली मारने का आदेश दिया था."
हालांकि तब श्रीलंका की सरकार ने ये कहा था कि इन चरमपंथियों को दूसरे सशस्त्र विद्रोहियों ने मारा है.
सफ़ेद रंग की वैन और डेथ स्क्वैड
गृह युद्ध की समाप्ति के तीन साल बाद भी 2012 में लोगों के अग़वा किए जाने का सिलसिला थमा नहीं था. उस समय कोई अज्ञात स्क्वैड सफ़ेद रंग की वैन में लोगों को उठा लिया करता था.
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना था कि अक्तूबर 2011 से फ़रवरी 2012 तक उत्तरी श्रीलंका में कोलंबो के नज़दीक इस तरह से 32 लोगों को उठाया गया था. इनमें अधिकतर पीड़ित तमिल, मुस्लिम और सिंहला थे.
इसके बाद फ़रवरी में 10 अज्ञात शव बरामद किए थे. हालांकि, यह साफ़ नहीं था कि इनमें से कितने लोगों का अपहरण किया गया था.
इस दौरान वो लोग ग़ायब हुए जिनकी प्रशासन से सीधे भिड़ंत हुई थी. इसमें मानवाधिकार कार्यकर्ता और आम व्यवसायियों समेत वो लोग ग़ायब हुए थे जो एक व्यवस्थित आपराधिक नेटवर्क चलाया करते थे.
इसके ख़िलाफ़ आवाज़ मुखर करने वाले कार्यकर्ताओं ने इसके पीछे सरकार समर्थित ताक़तों और सुरक्षा अधिकारियों का हाथ बताया था. उस समय गोटाभाया ही देश के रक्षा मंत्री थे.
2009 में प्रबागरन नाम के एक व्यवसाई को पुलिस ने गिरफ़्तार किया था. एक सैन्य अफ़सर ने उन पर तमिल लड़ाकों से संबंध होने का आरोप लगाया था हालांकि उन्होंने इन आरोपों से इनकार किया था.
ज्यूडिशियल मेडिकल अफ़सर को अक्टूबर 2009 में सौंपी गई एक रिपोर्ट में पाया गया था कि प्रबागरन को एक डंडे से नंगा करके पीटा गया था, उनके गुप्तांगों को चोट पहुंचाई गई थी और उनके नाख़ून निकाल लिए गए थे.
मार्च 2012 में एक शख़्स ने सार्वजनिक रूप से बताया था कि उसका अपहरण करने की कोशिश की गई थी जबकि कुछ हफ़्तों पहले उसके भाई को उठाया गया था.
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