विवादित ज़मीन मुस्लिम पक्ष को मिलती तो...-वुसअत का ब्लॉग

अयोध्या
    • Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
    • पदनाम, पाकिस्तान से, बीबीसी हिंदी के लिए

राम मंदिर या बाबरी मस्जिद जो भी आप कह लें उसके फ़ैसले पर अब तक टीवी चैनलों पर 3000 घंटे की टिप्पणियां हो चुकी हैं.

सरकार समेत सभी को थोड़ा अंदाज़ा था कि किस तरह का फ़ैसला आने वाला है. वैसे भी जो झगड़ा 164 वर्ष में कोई न तय कर पाया उसका उच्चतम न्यायलय से जो भी फ़ैसला आता उसे ठीक ही होना था.

पर सोचिए कि अगर पाँच जजों की बेंच बाबरी मस्जिद की ज़मीन सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के हवाले कर के गिरी हुई मस्जिद को दोबारा बनाने के लिए एक सरकारी ट्रस्ट बनाने और निर्मोही अखाड़े और राम लला को मंदिर के लिए अलग से पाँच एकड़ ज़मीन अलॉट करने का फ़ैसला देती तो क्या होता?

क्या तब भी सब यही कहते कि ये एक ऐतिहासिक फ़ैसला है जिसका पालन हर नागरिक और सरकार के लिए लाज़मी है. और अगर बाबरी मस्जिद नहीं ढहाई गई होती तब सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला क्या होता?

बहरहाल, ये फ़ैसला उस दिन आया जिस दिन करतारपुर कॉरिडोर का उद्घाटन हुआ. हालांकि ये एक ऐतिहासिक पल था जिसकी सबसे ज़्यादा कवरेज पाकिस्तानी चैनलों पर हुई. जिस तरह अयोध्या फ़ैसले का कवरेज भारतीय चैनलों पर हुआ.

अयोध्या पर कोर्ट का फैसला

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जिस वक़्त कोर्ट रूम खचा-खचा भरा हुआ था उस समय करतारपुर में भी ज़बरदस्त भीड़ थी अभी पाकिस्तानी चैनलों पर इस बारे में और बात होती अगर पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की बीमारी और इलाज के लिए उन्हें लंदन रवाना करने के मामले में ख़ामख़ां की अड़चने न पैदा होती.

अदालत ने नवाज़ शरीफ़ को इलाज के लिए बाहर जाने की अनुमति दे दी है मगर इस समय ये बहुत बीमार शख्स गृहमंत्रालय और नेशनल अंकाउटेबिलिटी ब्यूरो के दौरान फ़ुटबॉल बना हुआ है.

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क्योंकि जब तक नवाज़ शरीफ़ का नाम देश से बाहर जाने वाले लोगों पर लगी पाबंदी की लिस्ट से नहीं निकलता वो जहाज़ पर सवार नहीं हो सकते. सरकार कह रही है कि उसे लिस्ट से नाम निकालने में कोई दिक़्क़त नहीं है लेकिन ये भी नहीं बता रही कि अगर उसे दिक़्क़त नहीं तो दिक़्क़त किसे है.

जो कोई भी टांग अड़ा रहा है उसे पता होना चाहिए कि नवाज़ शरीफ़ की ज़िंदगी इस समय एक कच्चे धागे से अटकी हुई है.

नवाज़ शरीफ

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अगर शासन नवाज़ शरीफ़ के रूप में एक और ज़ुल्फ़ीक़ार अली भुट्टो पंजाब को तोहफ़े में देना चाहते हैं तो वो अलग बात है. दूसरी ओर मौलाना फज़लुर्रहमान का राजधानी इस्लमाबाद में धरना दूसरे सप्ताह में दाख़िल हो गया है.

अगर नवाज़ शरीफ़ को कुछ हो गया तो धरने में एक नई जान पड़ सकती है और सरकार को वाक़ई जान के लाले पड़ सकते हैं. अगर ये बात भी इस्लामाबाद के मुन्ना भाई एमबीबीएस को पल्ले नहीं पड़ रही तो उनकी बुद्धि को बधाई हो.

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