क्या चीन ने सोलोमन के तुलागी टापू को ख़रीद लिया?

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- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, नई दिल्ली
चीन और सोलोमन के राजनयिक रिश्ते बहाल हुए महज़ एक महीने ही हुए हैं और अब ख़बर है कि चीन ने सोलोमन के तुलागी द्वीप को 75 साल के लीज़ पर लेने का समझौता किया है. इसे अमरीका के लिए झटके के तौर पर देखा जा रहा है.
प्रशांत महासागर के द्वीपीय देश सोलोमन की कैबिनेट ने पिछले महीने ताइवान से चीन के लिए राजनयिक संबंध ख़त्म करने के पक्ष में वोट किया तो ताइवान ने 36 साल पुराना औपचारिक संबंध रद्द करने का फ़ैसला ले लिया था.
ताइवान के विदेश मंत्री जोसेफ़ वु ने ये कहते हुए इस्तीफ़ा दे दिया था कि वो द्विपक्षीय संबंध को ठीक से हैंडल नहीं कर पाए.
सितंबर के दूसरे हफ़्ते में ताइवान और सोलोमन के रिश्ते ख़त्म हुए और पहले हफ़्ते में सोलोमन के विदेश मंत्री जेरेमिआह मैनेल ताइवान के दौरे पर आए थे. वे ताइवान से राजनयिक रिश्ते जारी रखने को लेकर बात करने आए थे लेकिन बात नहीं बनी थी.
ताइवान के विदेश मंत्री ने कहा था कि सोलोमन ने धोखा दिया है. उन्होंने इस रिश्ते को तोड़ने के लिए चीन को भी ज़िम्मेदार ठहराया था और कहा था कि चीन डॉलर डिप्लोमैसी के ज़रिए उसे अलग-थलग करने की कोशिश कर रहा है.
ताइवान के विदेश मंत्री वु ने आरोप लगाया था कि चीन ने सोलोमन की कैबिनेट को पैसे के दम पर सेट किया और ताइवान से राजनयिक रिश्ते ख़त्म करने के पक्ष में वोट करवाया. चीन के नेशनल डे एक अक्तूबर से पहले ताइवान और सोलोमन के रिश्ते ख़त्म हो गए थे. सोलोमन के हटने के बाद ताइवान के साथ महज़ 16 देश बच गए हैं जिनके राजनयिक रिश्ते सोलोमन से हैं.

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अमरीका ने ताइवान से 1979 में आधिकारिक रिश्ता ख़त्म कर लिया था. अमरीका ने ताइवान से रिश्ता तोड़ने के बाद चीन से राजनयिक संबंध बहाल किया था. हालांकि ताइवान अब भी अमरीका के लिए काफ़ी ख़ास है.
अनाधिकारिक रूप से पूर्वी एशिया में ताइवान अमरीका का अहम सहयोगी है. 2016 में जब साइ इंग-वेन ताइवान की राष्ट्रपति बनीं तब से अमरीका से संबंध और अच्छे हुए हैं.
चीन वन चाइना पॉलिसी के तहत ताइवान को अपना हिस्सा मानता है लेकिन ताइवान ख़ुद को संप्रभु देश कहता है. जब सोलोमन ने ताइवान से रिश्ता ख़त्म किया तब भी कहा जा रहा था कि यह अमरीका के लिए झटका है. प्रशांत महासागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी में सोलोमन का उसके साथ आना अमरीका हक़ में नहीं था.
रेडियो न्यूज़ीलैंड ने 14 अक्तूबर को पहली बार रिपोर्ट प्रकाशित किया कि सोलोमन तुलागी टापू को एक चीनी कंपनी के हाथों 75 साल के लीज़ पर देने के लिए सहमत हो गया है. हालांकि रेडियो न्यूज़ीलैंड ने ये भी कहा है कि इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है और सोलोमन की सरकार का कहना है कि क़रार पूरा नहीं हुआ है.

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रेडियो न्यूज़ीलैंड के अनुसार सोलोमन आईलैंड्स यूथ ग्रुप ने बीजिंग की कंपनी सैम ग्रुप के साथ तुलागी टापू को लेकर जो डील हुई थी उसके दस्तावेज़ को लीक कर दिया. रेडियो न्यूज़ीलैंड ने इस दस्तावेज़ की पुष्टि के लिए सरकार से बात की तो पता चला कि सोलोमन सेंट्रल प्रोविंस के प्रीमियर स्टैनली मैनेटिवा ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किया है.
स्टैनली ने ये भी कहा कि यह क़रार क़ानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है. स्टैनली ने ये भी कहा कि चीनी कंपनी पर स्थानीय क़ानून ही लागू होगा.
इसे लेकर 16 अक्तूबर को न्यूयॉर्क टाइम्स में भी रिपोर्ट छपी कि चीन ने सोलोमन के साथ तुलागी द्वीप को लीज़ पर लेने के लिए एक गुप्त समझौते पर हस्ताक्षर किया है.
न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, "बीजिंग की जिस कंपनी के साथ यह क़रार हुआ है वो चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ी हुई है. चीन के साथ हुए इस समझौते से तुलागी के लोग अचंभित हैं. इसके साथ ही यह अमरीका के लिए भी झटका है. चीन की इस हालिया डील से साफ़ है कि वो वैश्विक महात्वाकांक्षा को लेकर सफलता से आगे बढ़ रहा है."
चीन के ऐसे निवेश पर हमेशा आरोप लगते हैं कि वो जहां निवेश करता है वो देश क़र्ज़ के जाल में फंस जाता है. मिसाल के तौर पर श्रीलंका के हम्बनटोटा पोर्ट का ज़िक्र किया जाता है. चीन ने इसमें इतना पैसा लगाया कि श्रीलंका क़र्ज़ के दुष्चक्र में फंस गया. आख़िर में श्रीलंका को हम्बनटोटा पोर्ट चीन को 99 साल के लीज़ पर देना पड़ा.

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न्यूयॉर्क टाइम्स से न्यूज़ीलैंड के क्राइस्टचर्च में यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैंटबरी में चीनी मामलों स्कॉलर एन-मैरी ब्रैडी ने कहा, "भूगोल को देखें तो यह बहुत अच्छी लोकेशन है. चीन दक्षिणी प्रशांत महासागर में सैन्य मौजूदगी मज़बूत कर रहा है. चीन इस इलाक़े में और पोर्ट देख रहा है और वो हवाई ठिकाने भी विकसित करने की कोशिश कर रहा है. चीन चाहता है कि इस इलाक़े में कोई और अपनी मौजूदगी बढ़ाए उसके पहले वो ख़ुद को जमा ले. चीन ये भी चाहता है कि इस इलाक़े में जिन देशों के साथ ताइवान के राजनयिक रिश्ते हैं उन्हें ख़त्म कर दे."
एनवाईटी ने लिखा कि सोलोमन और चीन के बीच हुए स्ट्रैटिजिक कोऑपरेशन एग्रीमेंट की एक कॉपी उसके पास है और उसने इसकी प्रमाणिकता की जाँच कराई है. इससे पहले वानुआतु में चीन ने सैन्य ठिकाना बनाया था. न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार स्थानीय लोग इस क़रार को लेकर चिंतित हैं.
चीन की इस डील को लेकर ऑस्ट्रेलिया में भी चिंता जताई जा रही है. ऑस्ट्रेलियाई अख़बार फ़ाइनैंशियल रिव्यू ने लिखा है कि ताइवान से संबंध ख़त्म होने के बाद सोलोमन चीन के क़रीब आ रहा है.
फ़ाइनैंशियल रिव्यू ने लिखा है, "तुलागी को लेकर हुए समझौते के तहत चीन तेल और गैस टर्मिनल, फिशरी बेस और एयरपोर्ट बनाएगा. हालांकि इस डील को लेकर स्थिति अब भी साफ़ नहीं है. इस लीज़ को लेकर सोलोमन में विरोध है. प्रोविंस के प्रीमियर स्टैनली मैनेटिवा ने रेडियो न्यूज़ीलैंड से कहा है कि यह इस समझौते में कोई बाध्यता नहीं है."

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पिछले हफ़्ते ही सोलोमन आइलैंड के प्रधानमंत्री मनाशेह सोगावरे चीन के दौरे पर गए थे और बीजिंग में चीन ने उनका ज़ोरदार स्वागत किया था. इसी दौरे में सोलोमन ने चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना वन बेल्ट वन रोड में शामिल होने की हामी भी भरी थी.
इस रिपोर्ट को लेकर ऑस्ट्रेलिया में अभी चुप्पी है. फ़ाइनैंशियल रिव्यू ने इसे लेकर ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्री से संपर्क साधा लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. लेकिन पिछले साल जब चीन ने वानुआतु में सैन्य ठिकाना बनाया था तो पूर्व प्रधानमंत्री मैलकम टर्नबुल ने इसे चिंताजनक बताया था.
फ़ाइनैंशिय रिव्यू से ऑस्ट्रेलियन पॉलिसी इंस्टिट्यूट के निदेशक पीटर जेनिंग्स ने सोलोमन के साथ हुए नए क़रार को लेकर चेताते हुए कहा है, "इस समझौते के ज़रिए चीन ऑस्ट्रेलिया के दरवाज़े तक आ जाएगा. अगर सोलोमन चीन का क़र्ज़ चुकाने में नाकाम रहा तो यह और ख़तरनाक होगा. चीन जिस पैटर्न पर निवेश करता है उसी पैटर्न पर सोलोमन में भी किया है."
तुलागी सोलोमन में एक टापू है जो दो वर्ग किलोमीटर में फैला है. समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार यहां की आबादी 1,200 है. यहां जापान की नौसेना का दूसरे विश्व युद्ध में ठिकाना था. एएफ़पी की रिपोर्ट के अनुसार भी चीन और सोलोमन में यह समझौता हो गया है.
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