नज़रिया: ट्रंप ना भारत को नाराज़ कर रहे हैं और ना पकिस्तान को

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- Author, हारून रशीद
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, इस्लामाबाद से
राष्ट्रपति ट्रंप न तो तालिबान के साथ बातचीत को आगे बढ़ने दे रहे हैं और न ही कश्मीर पर मध्यस्थता पेशकश को. वो बहुत ही चालाकी से न तो भारत को नाराज़ कर रहे हैं और न ही पकिस्तान को.
जंग के मैदान अलग-अलग तरह के होते हैं. इनमें सबसे खतरनाक फौज़ों का अतीत में एक दूसरे के आमने सामने आ जाना हुआ करता था. इसमें अंधाधुंध संसाधनों का प्रयोग होता था, लेकिन फ़ायदा कम होता था. अब देशों के बीच इस क़िस्म का मैदान सजाने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती है.
अब युद्ध, मीडिया और तीसरी दुनिया के देशों में लड़ा जाता हैं. अमरीका में पकिस्तान और भारत के बीच चल रहे मतभेद को इसके एक बेहतर उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है. इसमें पक्षों का आमने-सामने होना ज़रूरी नहीं होता है. पाकिस्तानी मीडिया को देखें तो ऐसा लगता है कि मुल्क में तो और कुछ नहीं हो रहा है. सब टीवी लगा कर या फिर इंटरनेट पर अमरीका को देख रहे हैं.
इस्लामाबाद में बैठकर ऐसा महसूस होता है कि दुनिया में इस वक़्त कोई दूसरी समस्या ही नहीं है, न सऊदी अमरीकी गठबंधन का ईरान पर चढ़ाई करने का ख़तरा है, न पर्यावरण का बदलाव कोई बड़ा मुद्दा है और न ग़रीबी या आर्थिक स्थिति बिगड़ने की कोई चिंता है. अगर है तो सिर्फ़ कश्मीर अमरीका में छाया हुआ है और क्यों न हो, संयुक्त राष्ट्र के सत्र ने तो जैसे पकिस्तान की मुराद ही पूरी कर दी हो.
इस्लामाबाद जो कश्मीर को अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा साबित करने की आज कल पूरी कोशिश कर रहा है इसके लिए संयुक्त राष्ट्र जनरल असेंबली के सत्र का शायद इससे अच्छा मौक़ा कभी नहीं था. भारत प्रशासित कश्मीर में पाबंदिया अभी जारी हैं और शायद इस मुद्दे को हवा देने का इससे बेहतर मौक़ा पकिस्तान को कभी न मिले.
अमरीका में मोदी के विरोध में हुए प्रदर्शन की भरपूर मीडिया कवरेज के लिए न सिर्फ़ स्थानीय स्तर पर बल्कि पकिस्तान से भी दस्ते भेजे गए हैं. भेजी गयी टीमें ज़्यादा नहीं हैं लेकिन जो भेजे गए हैं वो मीडिया की ज़रुरत बड़ी आसानी से पूरी कर सकते हैं.
संयुक्त राष्ट्र में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब इन दोनों पड़ोसी देशों के बीच कूटनीतिक लड़ाई चल रही हो. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाउडी मोदी का ह्यूस्टन में बड़ा इवेंट आयोजित करके पकिस्तान पर वार भी किया है. न उन्होंने कश्मीर का नाम लिया और न पकिस्तान का लेकिन अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने का बचाव ज़रूर किया.
नीति या कूटनीति

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उन्होंने पकिस्तान पर वार करते हुए कहा कि इस फ़ैसले का विरोध करने वाला मुल्क वो है जो ख़ुद को नहीं संभाल पा रहा है. पकिस्तान और दुनियाभर में इन उम्मीदों के उलट कि वो (मोदी) कश्मीर का ज़िक्र नहीं करेंगे, लेकिन उन्होंने ऐसा कर दिया. इसका पकिस्तान में ये मतलब लिया जा रहा है कि शायद मोदी कश्मीर के फ़ैसले पर दबाव में हैं. इसी वजह से इसे अपना अंदरूनी मामला बताये जाने के बाद भी इन्हें ऐसा करना पड़ा.
ह्यूस्टन में मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के एक स्टेज पर होने को ,पकिस्तान अगले साल अमरीका में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में मदद के तौर पर देख रहा है. माना जा रहा है कि अमरीका ने भी इसके जवाब में कुछ आर्थिक मदद देने का वादा किया होगा.
राष्ट्रपति ट्रंप जिन्हें दोबारा राष्ट्रपति बनने के लिए किसी विदेश नीति में कामयाबी की उम्मीद है वो न तो तालिबान के साथ बातचीत को आगे बढ़ने दे रहे हैं और न ही कश्मीर पर मध्यस्ता पेशकश को.
लेकिन वो बहुत ही चालाकी से न तो भारत को नाराज़ कर रहे हैं और न ही पकिस्तान को. उन्होंने दोनों को ही ज़ाहिरी तौर पर गाड़ी की लाल बत्ती के पीछे लगाया हुआ है.
लगता है कि यदि कश्मीर पर मध्यस्ता की बात बनती है तो अच्छा, और अगर नहीं बनती तो अलग-अलग ही दोनों की गर्मजोशी से फ़ायदा हासिल कर लिया जाए. हाउडी मोदी को उन्होंने बहुत ही अच्छी तरह से पेश किया है. दूसरी तरफ़ भारत का भी इस दौरे में मुख्य केंद्र अर्थव्यवस्था है लेकिन ज़रुरत के मुताबिक़ कश्मीर पर भी डील करना होगा.
पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने भी ह्यूस्टन के बाद मोदी के ख़िलाफ़ बहुत ही सख़्त भाषा का प्रयोग किया है. लेकिन पकिस्तान में अक्सर लोग सोशल मीडिया पर या तो चुप रहे या फिर मोदी और ट्रंप को गालियां दी हैं. पाकिस्तानी राजनीतिज्ञों के लिए तो जैसे कुछ हुआ ही नहीं.
अब देखना यह है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के साथ मुलाक़ात में राष्ट्रपति ट्रंप क्या रंग दिखाते हैं. वह पहले ही कह चुके हैं कि अगर दोनों पक्ष तैयार हों तो वो मध्यस्ता के लिए तैयार हैं, जिसका मतलब यह लिया जा रहा है कि वह भारत की तरफ़ झुक रहे हैं. भारत ही किसी तीसरे पक्ष के दख़ल से इंकार करता आया है. ऐसे में मध्यस्ता सिर्फ़ बातों में ही रहने का अंदाज़ा है.
इमरान ख़ान ने इस बार तो किसी बड़ी सभा का बंदोबस्त नहीं किया लेकिन वो मुलाक़ातों और थिंक टैंक में भाषणों के द्वारा जवाबी हमले करेंगे. क्या वो पहले की तरह इल्ज़ामों तक ही सीमित रहेंगे या नहीं? और क्या वो जनरल काउंसिल के भाषण में कुछ नया करेंगे या नहीं, सब की नज़रें इसी पर जमी हुई हैं.
कोई उन्हें शिमला समझौते को भूल जाने का मशवरा दे रहा है तो कोई ज़्यादा सख़्त भाषा का इस्तेमाल करने का लेकिन सबको मालूम है कि 28 सितंबर को वो कम से कम इस दौरे में कश्मीर साथ लेकर नहीं आ रहे हैं.
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