अच्छी ज़िंदगी के लिए उत्तर कोरिया से दक्षिण कोरिया पहुंची, पर मिली मौत

- Author, लउरा बिकर
- पदनाम, बीबीसी न्यूज, सियोल
उस दिन 42 साल की हन सुंग-ओक सब्जी मंडी में सलाद की हर पत्ती को कुछ इस तरह देख रही थीं जैसे वो सभी खरीदना चाहती हों.
वो हर एक पत्ती को उलट-पलट कर देख रही थीं.
पास में ही उनका छह साल का बेटा खेल रहा था और बहुत मुश्किल से पास की एक बाड़ पर चढ़ पाया था.
दक्षिण सियोल की एक बस्ती में सब्जी बेचने वाली एक महिला उन्हें ऐसा करता देख नाराज़ हो रही थी. उसके लिए वो एक नखरेबाज़ ग्राहक थीं, जो हर सब्जी को गौर से देखती-परखती तो हैं पर लेती सिर्फ़ एक या दो ही हैं ताकि उन्हें कम से कम पैसे ख़र्च करने पड़ें. इस बार उसने सिर्फ़ 500 वोन यानी 0.40 डॉलर ख़र्च किए.
कुछ शब्द बड़बड़ाते हुए हन सुंग-ओक पैसे देती हैं और अपने बेटे के साथ चली जाती हैं.
कुछ हफ़्तों बाद दोनों मर जाते हैं.
खाने-पीने की कमी से जूझते अपने देश उत्तर कोरिया को छोड़ कर नए सिरे से ज़िंदगी जीने की आस में हन सुंग-ओक अपने बेटे के साथ एशिया के सबसे धनी शहरों में से एक सियोल पहुंची थीं. यह समझा जा रहा है कि उन दोनों की मौत भूख की वजह से हुई है.
दोनों की लाशें दो महीने तक उनके कमरे में पड़ी रही क्योंकि किसी को पता भी नहीं था कि उनकी मौत हो चुकी है.
उनकी मौत के लगभग दो महीने बाद पानी का मीटर चेक करने आए एक शख़्स ने अजीब सी बदबू महसूस की, तब उन दोनों की मौत का पता चल सका.
मां और बेटा फ़र्श पर अलग-अलग पड़े थे. उनके छोटे से किराए के मकान में खाने-पीने की सिर्फ़ एक ही चीज थी और वो था एक थैला जिसमें सिर्फ़ लाल मिर्च थी.

काश...
उन्हें आख़िरी बार देखने वाले कुछ लोगों में से एक थी वही सब्ज़ी बिक्रेता, जो उनके अपार्टमेंट परिसर के बाहर सड़क पर अपनी दुकान लगाती थी. उसने हन सुंग-ओक को अंतिम बार वसंत के मौसम में देखा था. पुलिस के मुताबिक़ यह ठीक वही समय था जब उन्होंने अंतिम बार अपने बैंक अकाउंट से बची हुई राशि लगभग तीन डॉलर निकाले थे.
उसने कहा,"ये सब बहुत ही हैरान कर देने वाला है. पहले तो मैं उसे नखरेबाज़ होने की वजह से नापसंद करती थी. पर अब सोचती हूं तो बुरा लगता है."
"अगर वो अच्छी तरह से मुझसे कुछ खाने को मांगती तो मैं शायद उसे कुछ सलाद की पत्तियां दे देती."
ये सब्जी वाली उन कई लोगों में से एक थी, जिसके पास अब सिर्फ़ एक शब्द बचा है..."काश"
काश... उनकी दुर्दशा पर अधिकारियों ने ग़ौर किया होता. काश... सरकार ने भगोड़ों की मदद करने के लिए कुछ और किया होता. काश उसने मदद मांगी होती.
उन दोनों की मौत की वजह से लोग आक्रोशित हैं.
एक करोड़ लोगों के इस शहर में हन सुंग-ओक बिल्कुल अकेली थीं. बहुत कम लोग उन्हें जानते थे. जो लोग जानते थे वो बताते हैं कि वो बहुत कम बोलती थीं और लोगों की नज़रों से बचने के लिए आसपास के इलाक़े में टोपी पहन कर घूमती थीं.
लेकिन अब यह पूरा शहर उन्हें जान गया है.

उत्तर कोरिया से भागना कितना मुश्किल
सियोल के बीचों बीच ग्वांगह्वामुन में श्रद्धांजलि सभा में उनकी तस्वीर फूलों और उपहारों के बीच रखी हुई है. शोक जताने आए दर्जनों लोग उनका नाम लाउडस्पीकर पर पुकार रहे हैं, पर सच तो यह है कि बहुत कम लोग ही उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानते थे.
उस जगह पर शोक जताते हुए एक भगोड़े ने हमें बताया, "यह समझ में नहीं आता है कि इतनी कठिनाइयों से गुज़रने के बाद और चुनौतियों का सामना करने के बाद वो दक्षिण कोरिया आयी थीं और उनकी मौत भूख से हो जाती है. इस घटना ने मेरा दिल तोड़ दिया है. जब मैंने पहली बार ये ख़बर सुनी तो विश्वास करना बहुत ही मुश्किल था."
"यह दक्षिण कोरिया में नहीं हो सकता है. उनके मरने तक किसी को इस बारे में कुछ पता क्यों नहीं था?"
लेकिन एक कारण कोई नहीं जानता है कि हन सुंग-ओक सबसे छिपकर रहना चाहती थीं.
उत्तर कोरिया से भागना आसान नहीं है.
अगर आप सीमा पर सैनिकों से बच भी जाते हैं तो भागने वालों को चीन से होकर हज़ारों मील की यात्रा करनी होती है.
भागने वालों का उद्देश्य किसी तीसरे देश में दक्षिण कोरियाई दूतावास में पहुंचना होता है. आमतौर पर थाईलैंड, कंबोडिया या वियतनाम के दक्षिण कोरियाई दूतावास देश से बाहर इनका पहला ठिकाना होते हैं.
लेकिन चीन से होकर गुज़रना आसान नहीं होता है. बहुत बड़ा जोख़िम उठाना पड़ता है. अगर आप पकड़े जाते हैं तो आपको उत्तर कोरिया वापस भेज दिया जाता है और लौटने के बाद वहां की कुख्यात जेलों में जीवन बिताना पड़ता है.
वहां से भागने की चाहत रखने वाली महिलाएं दलालों को पैसा देती हैं, लेकिन कई बार वो धोखाधड़ी की शिकार हो जाती हैं. कई बार उन्हें जेल हो जाती है तो कई बार वो दुल्हन या फिर यौनकर्मी के रूप में बेच दी जाती हैं.
हन सुंग-ओक के मामले में इस बात की पुष्टि करना मुश्किल है कि उन्होंने उत्तर कोरिया कब और कैसे छोड़ा था. उनसे बात करने वाले दो भगोड़ों का दावा है कि उन्हें एक चीनी व्यक्ति के हाथों दुल्हन के रूप बेच दिया गया था, जिससे उन्हें एक बेटा भी हुआ. हम इस बात की पुष्टि नहीं कर सकते हैं.

लेकिन वो 10 साल पहले सियोल अकेली पहुंची थीं और निश्चित रूप से हनवॉन केंद्र में अपने सहपाठियों से बहुत ज़्यादा घुली-मिली नहीं थीं.
उत्तर कोरिया से भाग कर दक्षिण कोरिया पहुंचे लोगों को हनवॉन जैसे केंद्रों में 12 सप्ताह की बुनियादी ट्रेनिंग दी जाती है ताकि वो दक्षिण कोरिया में आसानी से घुल मिल सकें.
केंद्र की स्थापना के बाद हन सुंग-ओक की कक्षा सबसे बड़ी कक्षा थी. इसमें 300 से ज्यादा लोग थे. वे सभी जानते थे कि चीन से गुज़रना कितना कठिन था.
उनकी एक सहपाठी ने हमें बताया, "मुझे पता था कि वो पहले चीन गई थीं. वो हंसती थी लेकिन उसका एक स्याह पक्ष भी था."
"मैंने उससे पूछा था कि क्या ग़लत हुआ था पर वो मेरी बातों को टाल जाती थीं."
"मैं व्यक्तिगत मामलों में बहुत ज़्यादा घुसने की कोशिश नहीं करती हूं, इसलिए मैंने उससे कहा था कि जब तक कड़ी मेहनत करेंगी तब तक आप एक अच्छा जीवन जी सकती हैं. मैंने उन्हें कहा था कि तुम एक जवान और सुंदर महिला हो, तुम्हें जीवन में बहुत परेशानी नहीं होगी."

हन सुंग-ओक की शुरुआत
शुरुआत में हन सुंग-ओक अपने नए जीवन में बेहतर कर रही थीं.अधिकारियों ने भगोड़ों को सब्सिडी वाले घर खोजने में भी मदद की. वो अपने छह सहपाठियों के साथ एक जगह पर रहने लगी थीं.
उनकी एक सहपाठी ने कहा, "वो बहुत प्यारी और सुंदर थी. मुझे लगता है कि मेरी कक्षा में मेरे बाद वो नौकरी पाने वाली दूसरी लड़की थी. सबसे पहले उसने कुछ समय के लिए सियोल विश्वविद्यालय के कॉफी शॉप में काम किया. जहां तक मैंने सुना था उसने वहां अपनी एक अच्छी छवि बनाई थी. हम सोचते थे कि वो ऐसी है जो ख़ुद की देखभाल करने में सक्षम है."
"ऐसा होगा हमें इसकी उम्मीद नहीं थी."
यह पता लगाना मुश्किल है कि इस आशाजनक शुरुआत का अंत इतना बेसहारा क्यों हुआ.
उनके अपार्टमेंट परिसर में रहने वाले दो उत्तर कोरियाई लोगों ने हमें बताया कि उन्हें लगता है कि उन्होंने अपने चीनी पति को दक्षिण कोरिया आने के लिए मना लिया था. उनके पति के आने के बाद वो तोंग्योंग के दक्षिण में रहने चली गई थीं, जहां उनके पति एक शिपयार्ड में काम करते थे. उनको दूसरा बेटा भी हुआ था जिसे कुछ परेशानियां थीं.
ऐसा समझा जाता है कि उनके पति उनके बिना ही चीन वापस चले गए और सबसे बड़े बेटे को अपने साथ ले गए. वो यहां अपने विकलांग बच्चे के साथ अकेली रह गईं. उनके पास जॉब भी नहीं थी.
उनके पड़ोसियों का कहना है कि वो अपने बड़े बेटे को बहुत याद किया करती थीं.
वो बाद में उसी जगह पर लौट गईं, जहां से उन्होंने दक्षिण कोरियाई जीवन की शुरुआत की थी. उसी सब्सिडी वाले अपार्टमेंट में.
उन्होंने पिछले साल अक्तूबर के महीने में सामुदायिक केंद्र में मदद के लिए आवेदन किया था और हर महीने उन्हें अपने बच्चे के पालन-पोषण के लिए पैसे मिलते थे.
जितना उन्हें भत्ता मिल रहा था वो उससे अधिक के लिए दावा कर सकती थीं. सिंगल पैरेंट हर महीने छह से सात बार उस राशि का हक़दार होता है. लेकिन इसके लिए तलाक प्रमाण पत्र की ज़रूरत होती है. हमारी समझ से उनके पास वो नहीं था.
शरणार्थियों की परेशानियां
सामुदायिक केंद्र के कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने अप्रैल में वार्षिक जांच के लिए उनके अपार्टमेंट का दौरा किया था लेकिन वो उस वक़्त घर पर नहीं थीं. उन्हें उनके बेटे की स्थिति के बारे में पता नहीं था. उन्होंने कुछ समय से सब्सिडी वाले अपार्टमेंट का किराया और दूसरे बिलों का भुगतान नहीं किया था.
उत्तर कोरिया से आने वाले लोगों को पांच सालों तक सरकार मदद करती है. हन सुंग-ओक के लिए यह अवधि समाप्त हो गई थी.
जहां हन सुंग-ओक को श्रद्धांजलि दी जा रही थी, वहां उनकी मुस्कुराती हुई तस्वीर के सामने उत्तर कोरिया से भाग कर आए लोगों के बीच बहस जारी थी.
"यह कैसी विडंबना है कि भूख मिटाने के लिए एक उत्तर कोरियाई नागरिक दक्षिण कोरिया आता है और यहां भूख से मर जाता है."
"दक्षिण कोरियाई सरकार ने क्या किया? यह मौत अकेलेपन की वजह से हुई है."
"सिस्टम कहां है, पुलिस कहां है?"
उनके पड़ोसियों से हन सुंग-ओक के बारे में हमें जो कुछ पता चला उससे अंदाज़ा लगता है कि वो बैचेन और चिंतिंत थीं.
हन सुंग-ओक ने कभी भी मदद के लिए नहीं कहा, लेकिन क्या मदद उनके पास नहीं आनी चाहिए थी?
मनोचिकित्सकों और भाग कर आए लोगों के मुताबिक़ उत्तर कोरियाई शरणार्थियों के लिए मानसिक स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में सुधार किया जा सकता है.
अधिकतर भगोड़े कई तरह की तकलीफों से गुजर चुके होते हैं. मानवाधिकार उल्लंघन, अत्यधिक भूख, यौन उत्पीड़न से लेकर सार्वजनिक फांसी तक देख चुके हुए होते हैं.
कोरिया के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के एक अध्ययन के मुताबिक चीन से होकर आने वाले शरणार्थियों को मनोवैज्ञानिक परेशानियां ज़्यादा होती हैं.

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सामजाकि स्थिति
नेशनल सेंटर फॉर मेंटल हेल्थ के डॉ. जुन जिन-योंग का कहना है कि भगोड़ों का अवसाद, चिंता जैसे अन्य मानसिक रोग से ग्रस्त होना आम बात है. लेकिन उत्तरी कोरिया में मानसिक रोग को लेकर कई गलत अवधारणाएं है जिसकी वजह से लोगों को पता ही नहीं चल पाता कि वो इन बीमारियों से जूझ रहे हैं, या इनका इलाज मुमकिन है.
मानसिक बीमारी से जूझने वाले लोगों को उत्तर कोरिया में एक पहाड़ी क्षेत्र के एक अस्पताल में भेजा जाता है.
डॉ. जुन कहते है, "हमें ऐसी सेवाओं की आवश्यकता है जो भगोड़ों के लिए ख़ास तौर पर बनाई गई हों. हमें उन्हें इनके बारे में बताना होगा."
उत्तर कोरिया से आए हुए लोगों के मुकाबले दक्षिण कोरिया के लोग मानसिक स्वास्थ्य के बारे ज़्यादा जागरुक हैं क्योंकि उत्तर कोरिया के लोगों में इसे लेकर ग़लत अवधारणाएं हैं.
एक सर्वेक्षण के मुताबिक़ 15 प्रतिशत उत्तर कोरियाई शरणार्थियों ने माना कि उन्हें आत्महत्या का ख्याल आया है, जो औसतन दक्षिण कोरियाई लोगों से 10 प्रतिशत ज़्यादा है.
उनमें से अधिकतर लोगों का कहना है कि पैसे की कमी इसकी मुख्य वजह है.
उत्तर कोरिया में मिलजुल कर रहने की संस्कृत है. हमें बताया गया कि उत्तर कोरिया में हन सुंग-ओक और उनके बेटे को अकेले रहने की इजाज़त नहीं दी गई होती.
दक्षिण कोरिया की संस्कृति बिल्कुल अलग है.
15 साल पहले उत्तर कोरिया से दक्षिण कोरिया भाग कर आए जोसेफ पार्क ने बताया, "दक्षिण कोरिया एक ऐसा समाज है जहां आप रिश्तों के बिना रह सकते हैं. उत्तर कोरिया में जीने के लिए रिश्तेदारों की ज़रूरत होती है."
"मुझे लगता है कि यह बड़ा अंतर है. दक्षिण कोरिया में आप अपने पड़ोसी से बात किए बिना भी जी सकते हैं लेकिन उत्तर कोरिया में आपको अपने पड़ोसी से ताल्लुकात रखने ही होते हैं और सिस्टम इसके लिए आपको मजबूर कर देता है."
हज़ारों उत्तर कोरियाई लोग दक्षिण कोरिया में बेहद सफल और अच्छा जीवन जी रहे हैं. इसके लिए उन्होंने खुद में कई बदलाव लाए हैं.
कई अध्ययनों में भगोड़ों ने कहा है कि उन्हें अलग-थलग महसूस कराया जाता है और भेदभाव का सामना करना पड़ता है.
हन सुंग-ओक और उसके बेटे की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ज़ल्द ही आने की उम्मीद है. वहीं दूसरी तरफ दक्षिण कोरिया का सरकारी विभाग हन सुंग-ओक की मौत के मामले की जांच कर रहा है. यह उम्मीद है कि जो कुछ भी सामने आएगा, उसे सबक लेकर आगे की बेहतरी की जा सकेगी.
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