सोने के दाम बढ़ रहे हैं, ख़रीदना फ़ायदेमंद या बेचना

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- Author, श्रीकांत बक्शी
- पदनाम, बीबीसी तेलुगू
अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में डॉलर की तुलना में रुपये की क़ीमत गिर रही है. सोने के लिए देश पूरी तरह आयात पर निर्भर है लिहाजा जब डॉलर की क़ीमत बढ़ती है तो सोने के दाम भी बढ़ने लगते हैं.
सोने की क़ीमत जिस रफ़्तार में बढ़ रही है, वैसी रफ़्तार पहले कभी देखने को नहीं मिली थी. आठ अगस्त को महज एक दिन में 24 कैरेट सोने का दाम 1,113 रुपये प्रति दस ग्राम बढ़ा है.
सोने का कारोबार करने वालों के मुताबिक अगर रुझानों पर यकीन करें तो आने वाले दिनों में इसके दाम बढ़ेंगे. चांदी के दामों में भी वृद्धि देखने को मिल रही है. आठ अगस्त को एक किलोग्राम चांदी का दाम 650 रुपये बढ़ा है.
इंडस्ट्री से जुड़े सूत्रों के मुताबिक यही चलन कायम रहा तो इस साल के अंत तक 10 ग्राम सोने का दाम 40 हज़ार रुपये के आसपास होगा.

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क्यों बढ़ रहे हैं दाम?
एक तो सावन के महीने में बिक्री बढ़ने से भी सोने की क़ीमत बढ़ती है. लेकिन मौजूदा समय में इसके दाम बढ़ने के कई कारक मौजूद हैं. उदारीकरण के बाद वाले दौरन में सोने के दाम घरेलू आर्थिक वजहों के अलावा अंतरराष्ट्रीय कारणों से भी बढ़ते हैं.
मोदी सरकार की ओर से पेश किए गए पूर्ण बजट में भी सोने पर आयात शुल्क को 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 12.5 प्रतिशत कर दिया गया है. हाल ही में, भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने चौथी बार ब्याज दरों में कटौती की है.

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कारोबारी विश्लेषक सतीश मांडवा बताते हैं, "रेपो रेट में 35 बेस अंकों की कटौती से बैंकों और कर्ज लेने वालों को फायदा हुआ है लेकिन इससे सोने की कीमतें बढ़ी है."
रेपो रेट क्या है?
सतीस मांडवा कहते हैं, "यह वह ब्याज दर है जो आरबीआई से लोन लेने वालों को चुकाना होता है. इस रेट में कटौती का मतलब है कि बैंक अब आरबीआई से ज्यादा आसानी से लोन ले पाएंगे यानी बैंकों में पैसों का प्रवाह बढ़ेगा. फिर बैंक बाज़ार में लोन देगा."
वे कहते हैं, "पूरी अर्थव्यवस्था पैसों का प्रवाह बढ़ेगा. इसका नतीजा ये होगा कि संस्थाएं और आम लोग अपने पैसों का निवेश सोना खरीदने की ओर करेंगे. इससे सोने की मांग और कीमत दोनों बढ़ेगी."

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बजट के बाद की स्थिति
संसद में एनडीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के पहले बजट पेश किए जाने के बाद से स्टॉक मार्केट में मंदी का दौर देखने को मिल रहा है. बीते 30 दिनों में बाजार में निवेशकों के 13 लाख करोड़ रुपये डूब चुके हैं.
कारोबारी विश्लेषक सतीश मांडवा बताते हैं, "इन सबके अलावा केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 को खत्म करने का फैसला लिया है, जम्मू-कश्मीर को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के तौर पर दो केंद्रशासित प्रदेशों में बांटने का फैसला लिया है, कश्मीर में कर्फ्यू की स्थिति है, इन सबने भी निवेशकों के डर को बढ़ाया है."
"अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में डॉलर की तुलना में रुपये की कीमत गिर रही है. हमारा देश सोने के मामले में पूरी तरह आयात पर निर्भर है. डॉलर की कीमत बढ़ने से हमें सोने की खरीद के लिए कहीं ज्यादा पैसों का भुगतान करना पड़ रहा है. इसके चलते भी सोना महंगा हो रहा है. इन सबका असर है कि दो दिनों में सोने के दाम लगातार बढ़े हैं."
सतीश मांडवा के मुताबिक अगर कश्मीर की अस्थिरता बनी रही और अंतरराष्ट्रीय बाजार का आर्थिक परिदृश्य भी ऐसा ही रहा तो इस साल के अंत तक सोना का दाम 40 हज़ार रुपये प्रति दस ग्राम हो जाएगा.

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अंतरराष्ट्रीय वजहें
भारत में सोने के दाम बढ़ने में घरेलू कारणों के अलावा अंतरराष्ट्रीय वजहों की अहम भूमिका होती है.
अमरीका और चीन के बीच चल रहे ट्रेड वॉर का असर दुनिया भर के स्टॉक बाजारों पर देखने को मिल रहा है. बूलियन डेस्क के मुताबिक नैस्डैक और डाउ जोंस दोनों सोमवार से घाटे में कारोबार कर रहे हैं. निकेई, यूरो स्टॉक्स, हैंड सेंग और शंघाई कांपोजिट में भी गिरावट देखने को मिल रही है. आरबीआई के फैसले को चलते भारतीय शेयर बाजार सेंसेक्स और निफ्टी के सूचकांकों में भी बीते सप्ताह मंदी देखने को मिली है.
सतीश मांडवा के मुताबिक इन सबसे निवेशक भी डर रहे हैं. ऐसे में मौजूदा राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्यों को देखते हुए निवेशक सोने में निवेश कर रहे है. दुनिया के कई देशों की संघीय बैंकों ने भी सोने की ख़रीदारी शुरू कर दी है जिसके चलते सोने की मांग बढ़ गई है.

चीन भारत से आगे
सोने की खपत के मामले में चीन और भारत सबसे आगे हैं. उधर चीन की अमरीका को पीछे छोड़ने की लगातार कोशिशें भी कामयाब नहीं हुई हैं.
डॉलर की तुलना में चीनी मुद्रा युआन बीते दस सालों में अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है. बीबीसी बिजनेस के आंकड़ों के मुताबिक प्रत्येक अमरीकी डॉलर की तुलना में अब 7 युआन खर्च करना पड़ रहा है.
2008 की आर्थिक मंदी के बाद ये सबसे न्यूनतम दर है. उस वक्त एक डॉलर के लिए 7.3 युआन खर्च करना होता था.
अतीत के दिनों में चीन रणनीति के तौर पर भी अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करता आया है ताकि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में उसकी स्थिति मजबूत हो.

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ट्रेड वॉर का असर?
लेकिन हाल में अमरीका की ट्रंप सरकार ने चीन से आने वाले 300 बिलियन डॉलर के सामानों पर 10 प्रतिशत आयात शुल्क बढ़ा दिया है.
इसकी वजह से कारोबारी विश्लेषकों का अनुमान है कि आने वाले दिनों मे युआन की दर में 5 प्रतिशत की और गिरावट होगी और इस साल के अंत तक एक डॉलर के लिए 7.3 युआन खर्च करने होंगे.
बूलियन डेस्क के मुताबिक एक औंस यानी 28.34 ग्राम सोने की अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत 1497.70 डॉलर है. यह बीते छह सालों में सबसे ऊंची कीमत है. 2013 में इतने ही सोने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में 1696 डॉलर चुकाने पड़ रहे थे. उस वक्त भारतीय बाजार में सोने 35 हजार रुपये प्रति दस ग्राम तक पहुंचा था.

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सोना ख़रीदें या बेचें?
सोने के बढ़ते दामों ने आम लोगों को भी मुश्किल में डाल दिया है. जिन लोगों को अपने बच्चों की शादी या दूसरे मौके के लिए सोना खरीदना हो उन्हें तो तुरंत में फैसला लेने की जरूरत है.
2013 में ज्यादातर लोग तब सोना खरीदने बाजार पहुंचे थे जब उसकी कीमत 35 हजार रुपये प्रति दस ग्राम तक पहुंच गई थी. इसके ठीक बाद अंतरराष्ट्रीय वजहों से सोने के दाम लगातार घटते चले गए थे.
मौजूदा स्थिति में क्या करना चाहिए, इस बारे में कारोबारी विश्लेषक सतीश मांडवा बताते हैं कि बाज़ार की बढ़ती कीमत के बदले अपनी ज़रूरत को देखते हुए सोने की ख़रीदारी का फ़ैसला करना चाहिए.

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सतीश सलाह देते हैं कि जो लोग सोने की ख़रीद में निवेश कर रहे हैं वे लोग कोई भी फ़ैसला लेने से पहले अंतरराष्ट्रीय बाज़ार का विस्तृत अध्ययन और आकलन करें.
वहीं जो लोग कम मात्रा में सोना ख़रीदना चाहते हैं वे लोग अपनी ज़रूरत के हिसाब से ही ख़रीदारी करें.
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