ट्रंप से मिलने ISI और सेना प्रमुख को साथ क्यों ले गए इमरान ख़ान

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- Author, अभिजीत श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
प्रधानमंत्री बनने के बाद इमरान ख़ान पहली बार अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप से मिलने अमरीका गये हैं.
क़रीब चार साल में किसी भी पाकिस्तानी नेता की अमरीकी राष्ट्रपति से यह पहली मुलाक़ात है.
ऐसा माना जा रहा है कि इमरान ख़ान के अमरीकी दौरे में सेना की अहम भूमिका रहेगी क्योंकि उनके साथ सेना प्रमुख क़मर जावेद बाजवा और आईएसआई (इंटरसर्विसेज इंटेलिजेंस एजेंसी) प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद भी होंगे.
उनकी इस तीन दिवसीय यात्रा के एजेंडे में क्या-क्या है? इमरान आख़िर सेना और आईएसआई प्रमुख को अमरीका लेकर क्यों गये हैं?

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क्या इमरान ख़ान को व्हाइट हाउस आने का निमंत्रण देकर अमरीका, पाकिस्तान को यह संदेश देना चाहता है कि अगर पाकिस्तान चरमपंथ के संबंध में अपनी 'नीतियों को बदलता' है तो अमरीका से उसके संबंधों में सुधार आएगा.
अमरीका ने जनवरी 2018 में पाकिस्तान को सुरक्षा सहायता रोक दी थी और अभी तक इस रुख में कोई बदलाव नहीं आया है. क्या इस मुलाक़ात से अमरीका के रुख में बदलाव देखने को मिलेगा?

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सबसे बड़ा मुद्दा ताबिलान
पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त शरत सभरवाल कहते हैं कि पाकिस्तान बार-बार यह कहता रहा है कि वो कोई पैसा मांगने नहीं जा रहा. कहा जा रहा है कि व्यापार और निवेश सबसे प्रमुख एजेंडे में से होगा. लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में शांति बनाने का मुद्दा सबसे अहम रहेगा.
वो कहते हैं, "इस बातचीत में अमरीका के लिए सबसे अहम तालिबान है. जो अमरीकी सेना के ख़िलाफ़ अफ़ग़ानिस्तान में लड़ते रहे हैं. ओसामा बिन लादेन जब वहां बैठा था तो उसने अमरीका में हमला करवाया. तालिबान पर पाकिस्तान का कुछ प्रभाव है. लिहाजा वह चाहता है कि पाकिस्तान तालिबान के मुद्दे पर अमरीका से सहयोग करे."
सभरवाल कहते हैं, "कुछ दिनों पहले ही हाफ़िज़ सईद समेत कई लोगों पर मनी लॉन्ड्रिंग और चरमपंथ की फंडिंग को लेकर मामले दर्ज किये गये. सईद को गिरफ़्तार भी किया गया जिसका क्रेडिट ट्रंप ले रहे हैं."
सईद को मुंबई चरमपंथी हमले का 'तथाकथित मास्टमाइंड' बताते हुए ट्रंप ने ट्वीट किया कि 10 साल की तलाश के बाद उसे गिरफ़्तार किया गया है.
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हाफ़िज़ की गिरफ़्तारी को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की ट्रंप से मुलाक़ात से पहले पाकिस्तान का अमरीका के साथ संबंध बेहतर करने की कोशिश से भी जोड़ कर देखा गया.

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चरमपंथ दूसरा अहम मुद्दा
दक्षिण एशिया में अफ़ग़ानिस्तान के साथ-साथ चरमपंथ ट्रंप प्रशासन की मुख्य चिंताओं में से हैं और वह अफ़ग़ानिस्तान में सक्रिय तालिबान और हक्कानी नेटवर्क पर निर्णायक कार्रवाई करना चाहता है.
सभरवाल कहते हैं, "ट्रंप प्रशासन यह जानता है कि सेना के समर्थन के बिना पाकिस्तान में किसी भी बड़े फ़ैसले को लागू नहीं किया जा सकता है. पाकिस्तान में चुनी हुई सरकार और सेना के बीच एक तरह का अलगाव रहा है. कहा जाता रहा है कि विभिन्न मुद्दों पर दोनों की सोच अलग रही है."
इमरान ख़ान अपने इस दौरे के दौरान अमरीकी रक्षा मंत्री पैट्रिक एम शनहान, जॉइंट चीफ़ ऑफ़ स्टाफ जनरल मार्क मिले और कई अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से भी मुलाक़ात करेंगे.
इमरान ख़ान के साथ इस बातचीत के दौरान उनके सेना प्रमुख और आईएसआई के प्रमुख भी होंगे. पाकिस्तान के सेना प्रमुख बाजवा और आईएसआई प्रमुख हमीद को साथ बिठाकर अमरीका उनसे ठोस आश्वासन चाहेगा ताकि भविष्य में सरकार और सेना दोनों को जवाबदेह ठहराया जा सके.

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सेना और आईएसआई प्रमुख क्यों साथ गए ?
पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त शरत सभरवाल कहते हैं कि सेना प्रमुख और आईएसआई प्रमुख के वहां जाने में कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए.
सभरवाल कहते हैं, "इमरान ख़ान फ़ौज के बहुत क़रीब हैं. यह भी कहा गया कि उनके चुनाव में फ़ौज की अहम भूमिका रही, पाकिस्तान में भी इस पर बहुत विवाद हुआ था. वहां असली शक्ति तो फ़ौज के हाथों में है. नवाज़ शरीफ़ ने तो उनसे पावर लेने की कोशिश भी की थी लेकिन इमरान तो ये कोशिश भी नहीं कर रहे."
पूर्व उच्चायुक्त कहते हैं, "जब मैं पाकिस्तान में उच्चायुक्त था तो मैं देखता था कि अमरीका से आने वाले राजनयिक सरकार के साथ-साथ सेना के नेतृत्व से ज़रूर मुलाक़ात करते थे. उन दिनों सोच अलग थी. सरकार का कहना था कि भारत के साथ रिश्ते बेहतर किये जाएं लेकिन सेना उसके हक़ में नहीं थी. लेकिन अभी तक ऐसा लगता है कि इमरान ख़ान और सेना की सोच एक जैसी है."
सभरवाल कहते हैं, "अमरीकी शांति प्रयासों के तहत तालिबान को मनाने में सेना की अहम भूमिका होगी. लिहाजा यह अमरीका के लिए एक आश्वासन की बात होगी कि जो असली फ़ैसला करने वाले हैं वो यहां बातचीत की मेज पर हैं."

वहीं इंस्टीट्यूट ऑफ़ नेशनल सिक्यूरिटी स्टडीज से जुड़े पूर्व ब्रिगेडियर अरुण सहगल कहते हैं कि पाकिस्तान अमरीका के साथ अपने संबंधों को ठीक करना चाहता है. सेना और आईएसआई प्रमुख पेंटागन, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद और सीआईए से बात करेंगे. तालिबान पर जो बातचीत होगी उस पर वो पाकिस्तान की भूमिका को कम नहीं होने देना चाहेंगे.
वो कहते हैं, "पाकिस्तान के लिए उसकी आर्थिक और सामरिक रणनीति को लेकर अमरीका बहुत अहम है. इस बातचीत में सबसे बड़ा मुद्दा अफ़ग़ानिस्तान होगा. इस पर पाकिस्तान के सेना प्रमुख जावेद बाजवा और आईएसआई प्रमुख फैज हमीद अहम भूमिका निभाएंगे."
पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी भी कह चुके हैं कि, "आज सरकार और सेना के बीच कोई अलगाव नहीं है. सरकार और सेना दोनों देश के हितों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं."

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एफ़एटीएफ़ पाकिस्तान के गले की हड्डी
पाकिस्तान के लिए इस वक्त सबसे बड़ी मुसीबत एफ़एटीएफ़ बना हुआ है.
पाकिस्तान को वित्तीय अनियमितताओं, मनी लॉन्ड्रिंग और चरमपंथ के वित्तपोषण पर नज़र रखने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था फाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (एफ़एटीएफ़) ने अक्तूबर तक का वक़्त दिया कि वो चरमपंथ की फंडिंग को रोकने वाले अभियानों में सुधार लाए.
पाकिस्तान पहले एक जनवरी और फिर एक मई वाले टारगेट पूरा नहीं कर पाया है. अब उस पर दबाव है कि वो अक्तूबर तक अपनी कार्ययोजना पर तेज़ी से काम पूरा करे, नहीं तो एफ़एटीएफ़ उसके ख़िलाफ़ अगला कदम उठायेगा.
दुनियाभर में हो रही मनी लॉन्ड्रिंग से निपटने के लिए नीतियां बनाने वाली इस संस्थान ने साल 2001 में अपनी नीतियों में चरमपंथ के लिए वित्तपोषण को भी शामिल कर लिया था.
इंस्टीट्यूट ऑफ़ नेशनल सिक्यूरिटी स्टडीज से जुड़े पूर्व ब्रिगेडियर अरुण सहगल कहते हैं, "पाकिस्तान इस संस्थान की ग्रे लिस्ट में शामिल है और भारत चाहता है कि पाकिस्तान को इसकी ब्लैकलिस्ट में शामिल किया जाए."
सहगल कहते हैं, "अमरीका इसी एफ़एटीएफ़ के जरिए पाकिस्तान को कंट्रोल करना चाहते हैं. पाकिस्तान यह जानता है कि जब तक वो एफ़एटीएफ़ के मुद्दे में फंसा हुआ है, उसे आर्थिक मदद मिलना मुश्किल है. अमरीका के पास एफ़एटीएफ़ ऐसा हथियार है जिसे वो पाकिस्तान को घेरने के लिए ज़रूर इस्तेमाल करेगा."
वहीं सभरवाल कहते हैं, "पाकिस्तान की कोशिश होगी कि एफ़एटीएफ़एफ़ए की ब्लैकलिस्ट में जाने से बचा जाये और हो सके तो ग्रे लिस्ट से भी बाहर निकला जाये."

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पाकिस्तान के हक़ में क्या हुआ?
ब्रिगेडियर अरुण सहगल कहते हैं कि अमरीका ने बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) को चरमपंथी संगठनों की सूची में शामिल करके पाकिस्तान की सरकार, सेना और आईएसआई को एक लाइफ़लाइन दी है.
क्षेत्रफल के हिसाब से बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है. लेकिन गैस, कोयला और तांबा जैसे प्राकृतिक संसाधनों की भरमार होने के बावजूद यह पाकिस्तान का सबसे ग़रीब प्रांत है.
बलूचिस्तान में इसी बात को लेकर लोगों में बेहद नाराज़गी है और इस क्षेत्र को पाकिस्तान से अलग करने के लिए वहां बलूचिस्तान लिबेरशन आर्मी, बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट, यूनाइटेड बलोच आर्मी, लश्कर-ए-बलूचिस्तान, बलूचिस्तान लिबेरशन यूनाइटेड फ्रंट जैसे कई संगठन संघर्ष कर रहे हैं.
ब्रिगेडियर अरुण सहगल कहते हैं, "पाकिस्तान कहता है कि बलूचिस्तान में जो हो रहा है उसके लिए भारत ज़िम्मेदार है. वो कहते हैं कि हमारे यहां जो चरमपंथ गतिविधियां हो रही हैं उसे वो कंट्रोल करने में लगे हैं लेकिन उसके बावजूद चरमपंथी अपनी गतिविधियों में लगे हुए हैं."

सभरवाल कहते हैं, "अमरीकी रुख में बदलाव तो हुआ है. आईएमएफ़ ने पाकिस्तान को जो बेलआउट पैकेज दिया है उसे अमरीका रोक सकता था लेकिन उसने रोका नहीं. कुछ दिन पहले बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी को चरमपंथी संगठनों की सूची में शामिल किया है. अब पाकिस्तान चाहेगा कि एफ़एटीएफ़ पर अमरीकी रुख बदले."
कुल मिलाकर इमरान ख़ान का यह दौरा पाकिस्तान के लिए बहुत अहम है. पाकिस्तान की कोशिश होगी कि आपसी रिश्तों को पटरी पर वापस लाया जाये. अफ़ग़ानिस्तान पर कुछ सकारात्मक हो. एफ़एटीएफ़ पर अमरीकी रुख नरम हो.
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