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नेपाल छोड़ने को क्यों छटपटा रही हैं ये लड़कियां
नेपाल के लिए साल 2015 का भूकंप काफ़ी दर्दनाक रहा था. कई लोगों की ज़िंदगियां हमेशा के लिए बदल गईं. नेपाल में रहने वालीं लड़कियों की ज़िंदगियों पर इसका बेहद ख़राब प्रभाव पड़ा.
साल 2015 के बाद से नेपाल से लड़कियों की तस्करी अचानक से बढ़ गई और सोशल मीडिया ने तस्करों के काम को बेहद आसान कर दिया है. पत्रकार विकी स्प्राट इस मुद्दे की तहक़ीक़ात करने नेपाल पहुंचीं.
इस इमारत के आसपास हँसने और गानों की आवाज़ गूंजती है. धीरे-धीरे इनमें ट्रैफिक की आवाज़ भी शामिल हो जाती है.
नारंगी रंग में इस इमारत की दीवारें और फ़िरोज़ी, गुलाबी रंग के स्कार्फ़ को यहां रहने वाली महिलाओं की मानसिक स्थिति सुधारने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.
काठमांडू में स्थित ये इमारत देह व्यापार के चंगुल से बाहर निकालकर लाई गईं महिलाओं के लिए एक सुरक्षित घर की तरह है. यहां इन महिलाओं को उनकी ज़िंदगी में आगे बढ़ने के लिए समर्थन दिया जा रहा है.
मैं यहां 35 साल की चांदनी से मिलने आई हूं.
अब से लगभग एक साल पहले एक अजनबी ने उन्हें फ़ेसबुक पर रिक्वेस्ट भेजी थी. चांदनी ने ये फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली. इसके कुछ समय बाद दोनों लोग प्राइवेट मैसेज़ बॉक्स में एक दूसरे से बातचीत करने लगे. ये अजनबी शख़्स महिलाओं की तस्करी करने वाले गिरोह का एक एजेंट था.
चांदनी का इंतज़ार करते हुए मैं खिड़की से बाहर देखती हूं तो पीली सी धूल में लिपटी हुई बारिश की बूंदें सड़क पर गिरती दिखाई देती हैं.
नेपाल के उत्तरी सिरे से आगे पसरा हुआ हिमालय पर्वत धुएं और धुंध में छिपा नज़र आता है.
धुंध में खोए हिमालय की ओर देखते हुए मेरे पीछे से मेरी अनुवादक सुजाता की आवाज़ आती है.
वो कहती हैं, "इस शहर को एक बार फिर बनाया जा रहा."
2015 के भूकंप के बाद काठमांडू शहर तबाह हो गया था. ऐसा लगता है कि प्राकृतिक आपदाएं इमारतों को खड़ा करने वाली इंडस्ट्री के लिए मुफ़ीद साबित हुईं और महिलाओं की तस्करी करने वालों के लिए भी.
भूकंप से पहले ही काठमांडू में देह व्यापार फलफूल रहा था जो आज के जमाने में किसी दास प्रथा से कम नहीं है. भूकंप के बाद अपने परिवारों से बिछड़े हुए लोगों के लिए पैसा कमाना एक ज़रूरत बन गया.
भारतीय सीमा बल के मुताबिक़, भूकंप के बाद तस्करी का शिकार होने वाली महिलाओं की संख्या में 500 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है.
इस सेफ़ हाउस को चलाने वालीं चरिमाया तमांग मुझे बताती हैं कि 1990 में उन्हें भी तस्करी का शिकार होना पड़ा था.
नशे का सामान देकर उनका अपहरण कर लिया गया जिसके बाद उन्हें भारत के एक वेश्यालय में लाया गया.
चरमियां तमांग बताती हैं कि नई तकनीक ने इस व्यापार में नई जान फूंक दी है.
तमांग कहती हैं, "सोशल मीडिया ने एजेंटों की काफ़ी मदद की है. अब उन्हें लड़कियों की तलाश में गांवों में जाने की ज़रूरत नहीं है. वो इंटरनेट पर अपने संभावित शिकार तलाश सकते हैं और एक क्लिक से उन्हें अपने संदेश भेज सकते हैं."
हम बात ही कर रहे थे कि तभी दरवाज़ा खुलता है कि चांदनी मुझे देखते ही गले लगा लेती हैं.
चांदनी बताती हैं कि उनकी कहानी भी एक ऐसी फ्रेंड रिक्वेस्ट से शुरू हुई थी.
वो कहती हैं, "फ़ेसबुक पर एक व्यक्ति था जो मेरी बहन से बात करता था. उसने मुझे भी फ्रेंड के रूप में जोड़ा और हम बात करने लगे. इसके बाद उसने मुझे बताया कि मुझे इराक़ में एक बहुत ही बढ़िया तनख़्वाह वाली नौकरी मिल सकती है. मेरी और उसकी कभी मुलाक़ात नहीं हुई. लेकिन एक दिन उसने किसी को भेजकर मेरा पासपोर्ट और वीज़ा दिलवा दिया."
चांदनी के परिवार ने भूकंप में अपना घर खो दिया था. जब तस्करों ने उनके साथ बातचीत शुरू की तो उस वक्त वह एक अस्थायी शिविर में रह रही थीं.
ये एजेंट चांदनी की बहन से काफ़ी वक्त से बात कर रहा था और दोनों को तैयार करने की कोशिश भी कर रहा था.
भूकंप के बाद जारी आपाधापी में उसे एक ऐसा मौका मिला जब वो अपने मक़सद में कामयाब हो गया.
पासपोर्ट भिजवाने के बाद इस एजेंट ने चांदनी को बताया कि उनकी नौकरी तैयार है और एक शख़्स उन्हें इराक़ में घर की रखवाली करने वाली के रूप में रखने को तैयार है.
इसके बाद उसने चांदनी को दिल्ली तक बुलाने के लिए एक शख़्स को भेजा. इस एजेंट ने इस शख़्स को अपना भाई बताया.
दिल्ली पहुंचने पर इराक़ की फ़्लाइट पकड़ने की जगह चांदनी को 18 दूसरी महिलाओं के साथ कई हफ़्तों तक होटल के एक कमरे में बंद रखा गया.
चांदनी को सुनते हुए जब मैं उससे बारीक जानकारियां हासिल करने की कोशिश करती हूं तो चांदनी दूसरी ओर देखने लगती है.
उसकी आंखों में छलकते आंसू साफ़ दिखाई देते हैं. मैंने उससे पूछा कि जब वो उस कमरे में बंद थी तो उसके मन में क्या विचार आ रहे थे.
ये सवाल सुनकर चांदनी अपने आपको समेटते हुए कहती है..., "मुझे पता था कि मुझे बेचा जा रहा है."
दूसरी तमाम नेपाली लड़कियों की तरह चांदनी भी देह व्यापार की हिला देने वाली कहानियां सुनकर बड़ी हुई थी.
बड़ी होती हुई बच्चियों को हर हालत में इससे बचने की सलाह दी जाती है.
ये एक ऐसा ख़तरा है जिसे ये लड़कियां जानबूझकर उठाना चाहती हैं क्योंकि इससे उनकी और उनके परिवार की किस्मत बदलने का मौक़ा मिलता है.
नेपाल में काम की तलाश में अपना देश छोड़कर जाना कोई अजीब बात नहीं है. लेकिन लड़कियों के लिए अपना घर छोड़कर काम की तलाश में जाना जोखिम भरा हो सकता है.
ये इतना ख़तरनाक होता है कि एक विवादित क़ानून कहता है कि 30 साल से कम की महिलाएं अपने पति या घरवालों की इजाज़त के बिना बाहर नहीं जा सकती हैं.
चांदनी की तरह दूसरी कई युवतियां एक शानदार अवसर आने से पहले अवसरों की कमी से परेशान रही हैं.
वह बताती हैं, "मेरे परिवार में हर व्यक्ति खेत पर काम करता है. ये मुश्किल है और मुझे वो पसंद भी नहीं है. उस काम से मैं ज़्यादा पैसे भी नहीं कमा सकती है."
वह अब शादी भी नहीं करना चाहती हैं.
हंसते हुए चांदनी कहती हैं, "मेरे हिसाब से तो शादीशुदा महिलाओं का हाल भी कोई अच्छा नहीं है क्योंकि मैंने कई पुरुषों को दगाबाज़ी करते हुए देखा है."
मेरी अनुवादक सुजाता भी चांदनी के कहे लफ़्ज़ों को मेरे समझने लायक बनाते हुए मुस्कुराने लगती हैं.
मेरी आंखें आंसुओं से भीगी हैं लेकिन दोनों को हंसता हुआ देखकर मैं भी मुस्कुराने लगती हूं.
चांदनी कहती हैं कि उन्हें ये विचार ही पसंद नहीं है कि ज़िंदगी में आगे बढ़ने के लिए किसी पुरुष की ज़रूरत है.
मेरे इस सेफ़ हाउस से निकलने से पहले चांदनी खुलकर कहती हैं कि वह आगे भी विदेश जाकर नौकरी करने की कोशिश करेंगी...
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