इसराइल चुनाव के बारे में जानें पांच बातें

बेंजामिन नेतन्याहू

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इसराइल में मंगलवार को आम चुनाव हो रहे हैं. पिछले कई सालों में ऐसा पहली बार हो रहा है कि बिन्यामिन नेतन्याहू को विपक्ष से कड़ी चुनौती मिल रही है.

दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी के नेता, प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू पांचवें कार्यकाल के लिए इस चुनावी दौड़ में हैं.

इसराइल के आम चुनाव और इस बार के प्रतिद्वंद्वियों के बारे में आईए जानते हैं पांच बातें.

1-ऐतिहासिक रूप से कड़ी लड़ाई

बिन्यामिन नेतन्याहू अगर जीतते हैं तो वो इसराइल के संस्थापक डेविड बेन गूरिओन के सबसे अधिक समय तक प्रधानमंत्री रहने के रिकॉर्ड को पार कर जाएंगे.

हालांकि वो भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे हैं और उन्हें इतने सालों में पहली बार पूर्व सैन्य प्रमुख बेन्नी गैंट्ज़ से कड़ी चुनौती मिल रही है.

मध्यमार्गी ब्लू एंड व्हाइट अलायंस के प्रमुख गंट्ज़ सुरक्षा और राजनीति को साफ़ सुथरा करने के बुनियादी मुद्दों पर नेतन्याहू को चुनौती दे रहे हैं.

दो अन्य पूर्व सैन्य प्रमुखों और टीवी एंकर से राजनीतिज्ञ बने येर लैपिड के साथ मिलकर उन्होंने ये पार्टी बनाई, जिसका शुरू के ओपिनियन पोल में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी से अच्छा प्रदर्शन रहा.

59 साल के लेफ़्टिनेंट जनरल गंट्ज़ राजनीति में नए हैं और उन्होंने देश को एकता के सूत्र में बांधने का वादा किया है.

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2-सबसे अधिक सीट जीतना पीएम बनने की गारंटी नहीं

120 सदस्यों वाली इसराइल की संसद में अभी तक कोई भी पार्टी बहुमत हासिल नहीं कर पाई है और देश में हमेशा गठबंधन सरकारें बनीं हैं.

इसका कारण है देश में अनुपातिक प्रतिनिधित्व पार्टी सिस्टम का होना.

इसका मतलब है कि सबसे अधिक वोट पाने वाली पार्टी का नेता प्रधानमंत्री नहीं भी बन सकता है, बल्कि जो 120 सीटों में से 61 सीटें हासिल करेगा वो प्रधानमंत्री बनेगा.

चुनाव पूर्व सर्वे बताते हैं कि दोनों प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों के बीच कड़ी लड़ाई है और दोनों के 30-30 सीटें जीतने की संभावना है.

इसराइल के अनुपातिक प्रतिनिधित्व पार्टी सिस्टम में नेतन्याहू का पलड़ा भारी रहता है, जो इस बार भी गठबंधन सरकार बना लेने की उम्मीद लगाए हुए हैं.

प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने चुनावों से पहले कई कट्टरपंथी विचारधारा वाली पार्टियों से गठबंधन किए हैं.

फरवरी में उन्होंने एक अति चरमपंथी दक्षिणपंथी पार्टी से भी हाथ मिलाया, जिसके बारे में लोग मानते हैं कि वो नस्लवादी है.

1990 के दशक में फ़लस्तीनियों से शांति समझौता करने वाली इसराइल की लेबर पार्टी पर हाल के सालों में मतदाताओं का भरोसा कम हुआ है.

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3- फ़लस्तीन के साथ शांति समझौता प्रमुख मुद्दा नहीं

गज़ा में हाल के दिनों में इसराइली सुरक्षाबलों और फ़लस्तीनी लड़ाकों के बीच तनाव बढ़ा है.

ऐसा माना जा रहा है कि चुनाव के तुरंत बाद अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप लंबे समय से चले आ रहे विवाद को हल करने की अपनी योजना की घोषणा करेंगे.

हालांकि इस चुनाव में शांति प्रक्रिया कोई प्रमुख मुद्दा नहीं है.

नेतन्याहू अपनी चुनावी रैलियों में ऐसे संकेत दे रहे हैं कि अगर नई सरकार बनी तो वो कब्ज़ा किए गए पश्चिमी बैंक के यहूदी रिहाईश को इसराइल में मिला लेगी.

अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार ये बस्ती गैरकानूनी है जबकि इसराइल इस बात से इनकार करता है.

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इमेज कैप्शन, सेना में अनिवार्य सेवा की शर्तों से ऑर्थोडॉक्स पुरुषों को छूट दिए जाने से इसराइली यहूदियों में असंतोष है.

4- देश की जनसांख्यिकी की अहम भूमिका

देश में कुल मतदाताओं की संख्या 63 लाख है. चुनावों में सामाजिक, धार्मिक और जनजातियों के अलग अलग समूह प्रमुख भूमिका होती है.

कुल आबादी में इसराइली अरबों की संख्या 20 प्रतिशत है, लेकिन सर्वे बताता है कि इनमें आधे ही मतदान करने के योग्य हैं.

2015 में अरबों में मतदान का प्रतिशत बढ़ा था क्योंकि चार पार्टियों ने ज्वाइंट अरब लिस्ट के बैनर तले मैदान में थीं, उस समय इन्हें 13 सीटें मिली थीं.

धार्मिक हारेडी आबादी की संख्या 10 लाख है. परम्परागत रूप से ये यूरोपीय मूल के ऑर्थोडॉक्स यहूदी हैं और मतदान के लिए अपने रबी से सलाह लेते हैं.

हालांकि अधिकांश का झुकाव दक्षिणपंथी पार्टियों की ओर रहा है.

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5- इन चुनावों में किंगमेकर कौन?

अति राष्ट्रवादी जेहुत पार्टी के नेता मोशे फ़ीग्लिन गठबंधन की सूरत में किंगमेकर के रूप में उभर सकते हैं.

चुनाव पूर्व सर्वे के अनुसार, इस पार्टी को चार सीटें मिल सकती हैं. हालांकि मोशे नेतन्याहू और बेन्नी गंट्ज़ से समान दूरी रखने की बात करते हैं.

लेकिन फ़लस्तीन मसले पर उनका रुख कड़ा रहा है, वो मानते हैं कि पश्चिमी तट और गज़ा के कब्ज़े वाले हिस्से से फ़लस्तीनियों को चले जाना चाहिए.

मोशे तब सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने गांजे को कानूनी बनाने का आह्वान किया था.

इन चुनावों में सुरक्षा का मुद्दा अहम है और ऐसा लगता है कि पूर्व सैन्य प्रमुख गंट्ज़ इस मामले में नेतन्याहू को कड़ी टक्कर दे सकते हैं.

जबकि नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गठबंधन के प्रमुख सदस्य पश्चिमी तट में कब्ज़ा किए गए अधिकांश यहूदी बस्तियों को अलग कर इसराइल में मिला लेने का वादा कर रहे हैं और फ़लस्तीन राज्य के बनने का विरोध कर रहे हैं.

बेन्नी गंट्ज़ के प्रचार अभियान में फ़लस्तीन से 'अलग करने' का संदेश तो है लेकिन फ़लस्तीन के बारे में कोई स्पष्ट बात नहीं कही गई है.

गंट्ज़ का प्रचार अभियान एकीकृत येरूशलम को इसराइल की राजधानी बताता है जबकि फ़लस्तीन शहर के पूर्वी हिस्से को अपनी भविष्य की राजधानी होने का दावा करते हैं.

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