#WomensDay: जब महिलाओं के विद्रोह का प्रतीक बना फैशन

दुनिया का इतिहास ऐसी कहानियों से पटा पड़ा है जब महिलाओं पर उनके कपड़ों और फैशन के लिए प्रतिबंध लगाए गए.
लेकिन, कई कहानियां ऐसी हैं जो बताती हैं कि महिलाओं ने कैसे इस तरह के प्रतिबंधों का मुक़ाबला किया.
पढ़िए महिलाओं के विद्रोह की पांच कहानियां जब उन्होंने फैशन के ज़रिए अपनी आवाज़ मुखर की.
दक्षिण कोरिया में चश्मा

दक्षिण कोरिया की न्यूज़ एंकर यिम ह्यून-जू ने 12 अप्रैल, 2018 को नौकरी शुरू की. उन्होंने अपने आईलैशेस और कॉन्टैक्ट लेंस छोड़ कर चश्मा अपना लिया. इस घटना ने विवाद का रूप ले लिया और सोशल मीडिया पर लोग इस पर बातें करने लगे. यहां माना जाता है कि महिलाओं को, ख़ास कर महिला न्यूज़ एंकर को खूबसूरत दिखना चहिए.
दक्षिण कोरिया की अन्य महिला न्यूज़ एंकरों की तरह उन्हें प्रतिदिन एक घंटे का वक्त मेकअप करने में लगता, वो भी स्टूडियो की चकाचौंध कर देने वाली लाइटों के नज़दीक बैठ कर. उन्हें रोज़ आईड्रॉप इस्तेमाल करने की ज़रूरत पड़ने लगी.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "प्रेज़ेन्टर के रूप में हमें अपने बाल, रंग सब का ख़याल रखना होता है, तंग सूट और हाई हील पहनना होता है. हमें सुंदर दिखने कि लिए ऐसा करना होता है और हम कुछ नहीं कर सकते. इस कारण तनाव भी होता है."
तीन सप्ताह तक वो लगातार ये सोचती रहीं कि वो चश्मा पहनें या नहीं. एक दिन उन्हें लगा कि उनके सहकर्मी उनके इस फै़सले से सहमत नहीं हैं. लेकिन एक दिन अपने एक इंटरव्यू के बाद कई आलोचकों ने उनके फ़ैसले की तारीफ की.
यिम को कतई इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि उनकी कहानी एक दिन महिलाओं के विद्रोह की कहानी बन जाएगी.
सोशल मीडिया पर एक महिला एन हाल में यिम के बारे में लिखा, "एक टैबू को तोड़ने के लिए शुक्रिया. मुझे आपसे प्रेरणा मिलती है और आपने मुझे उत्सहित किया है और मैं सालों बाद चश्मा पहनने वाली हूं."

कुछ वक्त बाद देश की एयरलाइन कंपनी जेजू ने भी महिला कर्मचारियों के चश्मा पहनने पर लगी रोक को हटा लिया.
इसके बाद देश में एक मुहिम शुरु हुई- 'एसकेप द कोर्सेट' (चोली को ना कहें) और पारंपरिक सुदरंता की धारणाओं को चुनौती देते हुए महिलाएं अपने सिर मुंडवा कर और बिना मेक-अप के घर से बाहर निकलने लगीं.
यिम कहती हैं, "जब मैं सुंदर दिखने के दबाव से बाहर निकली तभी मुझे मेरी असली पहचान का पता चला."



सूडान में पतलून
अक्तूबर 2018 में सूडान की गायिका मोना माग्दी सलीम को देश की पुलिस ने गिरफ्तार किया. मामला राजधानी खारतूम में एक संगीत समारोह में उनके प्रदर्शन से जुड़ा था जिसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही थीं.
मोना माग्दी सलीम की गुनाह क्या था? उन्होंने पतलून पहनी थी जो एक तरह से वहां की पब्लिक डीसेन्सी लॉ का उल्लघंन था.
सूडान में कानून की धारणा इस्लाम के शरिया पर आधारित है. इस्लाम में पवित्र मानी जाने वाली कुरान में कपड़े पहनने के संबंध में दिए गए नियमों को ही माना जाता है जिसका ज़ोर महिलाओं के शालीन कपड़े पहने पर है.
सूडान की क़ानून के अनुसार सलीम को 40 कोड़े, जुर्माना या फिर दोनों की सज़ा सुनाई जा सकती थी लेकिन कोर्ट ने उनके मामले को खारिज कर दिया.
यहां महिलाओं के हिजाब न पहनने पर, किसी ख़ास तरह का हेयर स्टाइल करने पर या मेकअप करने पर उनकी आलोचना होना आम बात थी. लेकिन कई आलोचक मानते हैं कि देश का क़ानून महिला विरोधी और पितृसत्तात्मक हैं.
बीते 28 सालों से देश में क़ानून है लेकिन अब तक इसमें ये स्पष्ट नहीं है कि शालीनता क्या है और इसका उल्लघंन आख़िर क्या पहनने से होता है. इस कारण फ़ैसला देने वाले के विवेक पर काफी कुछ निर्भर करता है. मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे महिला के ख़िलाफ़ हिंसा का बड़ा कारण मानते हैं.
सूडान के पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने सालों तक इस मुद्दे को सामने लाने की कोशिशें की हैं लेकिन 2009 में संयुक्त राष्ट्र की पूर्व कर्मचारी लुबना अहमद हुसैन की गिरफ्तारी ने पूरी दुनिया का ध्यान इस तरफ खींचा.
अदालत में सुनवाई के दौरान हुसैन ने वही कपड़े पहनने का फ़ैसला किया, जिनमें उन्हें गिरफ्तार किया गया था.

लुबना अहमद हुसैन ने बीबीसी को बताया, "ये दुर्भाग्य की बात है कि मेरे साथ हुई घटना के वक्त तक कई पीड़ित महिलाएं चुप रहना पसंद करती थीं, क्योंकि समाज उनके साथ कभी खड़ा नहीं होता था."
"मेरे साथ हुई घटना के बाद, अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में कहानी आई और मुझे महिलाओं और मानवाधिकार कर्यकर्ताओं का समर्थन मिला. इससे लोगों को इस बात के अहसास कराने में मदद मिली कि जिन महिलाओं को इस तरह के आरोपों में पहले गिरफ्तार किया गया था, वो वास्तव में अपराधी नहीं थीं."



ट्यूनीशिया में ढीला कुर्ता या चोगा
20 साल की सिवर टेबोरबी बीबीसी को बताती हैं, "ना तो इसमें फ़ैशन जैसा कुछ था न ही ये पहनने में मुश्किल था. लेकिन लड़कियों को ये पहनने की इजाज़त थी लेकिन लड़कों नो नहीं."
ट्यूनीशिया के अन्य स्कूलों की तरह टेबोरबी के हाईस्कूल में भी छात्रों के लिए कपड़ों को ले कर नियम था. लड़कियों को अपने कपड़ों के ऊपर नेवी ब्लू रंग का चोगा पहनना होता था. जहां प्राइमेरी स्कूल में लड़के और लड़कियों दोनों को ही चोगा पहनना होता था. हाई स्कूल में ये सिर्फ़ लड़कियों को पहनना होता था.
स्कूल प्रशासन के अनुसार लड़कियों का शरीर के कारण पुरुष छात्रों और टीचरों का ध्यान बंटता है.
टेबोरबी और उनके कुछ दोस्तों ने मिल कर फ़ैसला किया कि वो अब चोगा नहीं पहनेंगी. टेबोरबी कहती हैं, "स्कूल के आख़िरी साल में हमने ये पहनना बंद कर दिया."
स्कूल प्रशासन ने उन्हें और उनके दोस्तों को चेतावनी दी कि इस हरकत के लिए उन्हें स्कूल से निकाला जा सकता है. टेबोरबी और उनकी दोस्तों ने दूसरी लड़कियों को अपने साथ जोड़ा और 30 नवंबर 2017 को सभी टी-शर्ट पहन कर स्कूल पहुंची. उनकी टी-शर्ट पर लिखा था, "नो डिस्क्रीमिनेशन" यानी कोई भेदभाव नहीं.

इस मुहिम को उन्होंने नाम दिया- "मेनिश लैब-सेथा" यानी "मैं ये नहीं पहनूंगी."
टेबोरबी बताती हैं कि इसके बाद ट्यूनीशिया में कुछ और स्कूलों की लड़कियों ने भी इस मुद्दे पर विद्रोह किया. दुनिया के कई कोनों से लोगों ने उन्हें चिट्ठियां और ईमेल लिखे. कइयों ने उनकी आलोचना की और कहा कि देश के सामने कई समस्याएं हैं लेकिन आपको सिर्फ़ चोगा ही महत्वपूर्ण मुद्दा लगता है.
डेनमार्क में नकाब

डेनमार्क में रहने वाली सारा अली नकाब पहनती हैं, जिससे उनकी दोनों आंखों को छोड़ कर उनका पूरा चेहरा ढ़क जाता है. यहां सार्वजनिक जगहों पर नकाब पहनने पर रोक है लेकिन सारा नकाब पहनती हैं.
वो अपने बेटे को समझाती हैं, "अगर पुलिस हमें रोकती है, तो डरो मत. अन्य लोगों की तरह हमारे पास समान अधिकार नहीं हैं."
सारा बताती हैं, "डेनमार्क में केवल 30-50 महिलाएं हैं जो नकाब पहनती हैं. हममें से अधिकांश स्थानीय समुदायों में भी काफी सक्रिय हैं. लेकिन वो हमें हमारे पहनावे के लिए सज़ा देना चाहते हैं."
फ्रांस और बेल्जियम जैसे अन्य यूरोपीय देशों की तरह डेनमार्क ने भी महिलाओं के लिए ऐसे कपडों पर प्रतिबंध लगाया है जो उनके चेहरे को पूरा ढक देती हैं. ऐसा करने पर 1,000 डेनिश क्रोन (150 अमरीकी डॉलर) तक का जुर्माना हो सकता है.
डेनमार्क की संसद में इससे संबंधित कनून बहुमत के साथ पारित हुआ लेकिन इसने यहां के समाज को दोफाड़ कर दिया. कई लोगों ने नकाब को पितृसत्तात्मक मानते हुए इस क़ानून का समर्थन किया तो कईयों ने इसे नस्लवादी और मुस्लिम विरोधी कहा.
छह महीने के भीतर यहां इसके लिए केवल 13 महिलाओं पर जुर्माना लगाया गया. कई महिलाएं रोज़ाना इसका उल्लंघन करती हैं.

सारा अली, क्विंदर आई डायलॉग (वूमन इन डायलॉग) नाम की एक संस्था की संस्थापक सदस्य हैं जो महिलाओं की राय सुनने और उन्हें नकाब पहनने के लिए प्रोत्साहित करता है. उनका मानना है कि ये जानना बेहद ज़रूरी है कि नकाब पहनने वाली महिला उसके बारे में क्या सोचती है.
वो कहती हैं, "मुस्लिम महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार होता है. हमसे हमारे अधिकार छीन लिए जाते हैं. मैने कुछ भी नहीं किया लेकिन अचानक मेरा पहनावा ही ग़ैरकानूनी हो गया था."



ब्राज़ील में जंपसूट
एना पाउला डी सिल्वा ब्राज़ील के दक्षिणी राज्य सैंटा कैटरीना की नवनिर्वाचित विधायक थीं. शपथग्रहण से एक दिन पहले वो खरीदारी करने गईं. वो इस ख़ास दिन के लिए बहुत ख़ास कपड़े खरीदना चाहती थीं.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "मैंने कई कपड़े देखे. मुझ पर कुछ अच्छा नहीं लग रहा था. फिर मुझे एक जंपसूट पसंद आया.
उस दिन एना पाउला के भाषण की तस्वीरें वायरल हुईं, लेकिन ये उनके भाषण के कारण नहीं था बल्कि उनके पहनावे के कारण था. जब वो शाम को घर लौटीं तो उन्होंने पाया कि सोशल मीडिया पर उनके लिए हज़ारों संदेश थे.
वो कहती हैं, "मैं लोगों की नाराज़गी पर हैरान थी. लोग मुझे चरित्रहीन कह रहे थे. वो कह रहे थे कि मेरा बलात्कार हो जाए तो मुझे शिकायत नहीं करनी चाहिए."
वो कहती हैं कि उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि उनके पहनावे को लेकर ऐसी प्रतिक्रिया आ सकती है.

एना पाउला डी सिल्वा कहती हैं, "समस्या ये थी कि समारोह में 40 पुरुष और केवल पांच महिलाएं थीं. यही ब्राजील की राजनीति है. यदि यहां 20 महिलाएं होतीं तो आपको नहीं लगता कि थोड़ा क्लीवेज दिखाने से कोई फर्क नहीं पड़ता. मैं अपनी तस्वीरों को बार-बार देख रही थी और सोच रही थी कि मेरे कपड़ों में क्या खराबी है. मुझे नहीं लगता कि यह अनुचित था क्योंकि मेरे कपड़े प्रोटोकॉल के अनुसार ही थे."
ब्राज़ील संसद के प्रोटोकॉल के अनुसार महिलाओं को स्कर्ट या घुटने से छोटे कपड़े नहीं पहनने चाहिए और पुरुषों को शॉर्ट्स नहीं पहनने चाहिए. लेकिन नियमों में क्लीवेज दिखाने को लेकर कुछ नहीं कहा गया है.
वो कहती हैं कि फ़ैशन की बात करें तो देश में महिलाओं को पुरुषों के लिए समान विचार नहीं हैं. "अगर कोई पुरुष अपने कुरते का बटन खोल कर आए तो कोई कुछ नहीं कहेगा. कोई आलोचना करेगा तो भी उनके चरित्र पर उंगली नहीं उठाएगा."
"लोग ये कभी स्वीकार नहीं करेंगे कि वो सेक्सिस्ट हैं, लेकिन यह वाकया दिखाता है कि समाज में अभी भी सेक्सिज़्म है और छिपा हुआ है."

लेखक: लारा ओवन, मेघा मोहन, एस्थर ओगोला, माटिल्डा वेलिन, रेनाटा मेन्डोंका, अनास्तासिया एनिसिमोवा, कैथलीन हॉकिन्स
चित्रण: जिल्ला दात्माल्ची
प्रोड्यूसर: सारा बकले, जॉर्जिया पीयर्स
संपादिका: सारा बकले
तस्वीरें: सारा अली, सिवर टेबोरबी, एना पाउला डी सिल्वा
एजेंसी तस्वीरें: Getty, AFP

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