ओपेक से अलग होकर क्या हासिल कर लेगा क़तर

क़तर

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'तेल' इस दुनिया का एक ऐसा तरल पदार्थ, जिससे दुनिया भर के वाहन ही नहीं सत्ताएं भी चलती हैं.

इस तेल पर जिन देशों का साम्राज्य है, वे इसे दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में निर्यात करते हैं और बदले में ढेर सारा मुनाफ़ा और कई दूसरे राजनीतिक-रणनीतिक लाभ पाते हैं.

तेल निर्यात करने वाले इन देशों का एक संगठन है जिसे आम भाषा में 'ओपेक' कहा जाता है. इस संगठन का एक सदस्य देश क़तर ने अलग होने की घोषणा की है.

वैसे ओपेक देश तेल का जितना उत्पादन करते है, क़तर की उसमें हिस्सेदारी महज़ दो फ़ीसदी ही रही है. लेकिन खाड़ी के इस छोटे से देश के ओपेक जैसे ताक़तवर संगठन से बाहर निकलने के फ़ैसले ने ओपेक के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं.

साल 2016 में क़तर के ऊर्जा मंत्री मोहम्मद सालेह अब्दुला अल सदा ओपेक के अध्यक्ष भी थे

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इमेज कैप्शन, साल 2016 में क़तर के ऊर्जा मंत्री मोहम्मद सालेह अब्दुला अल सदा (बीच में) ओपेक के अध्यक्ष भी थे

क्यों बाहर हुआ क़तर?

ओपेक संगठन साल 1960 में बना था और एक साल बाद क़तर इस संगठन का हिस्सा बन गया था.

क़तर के ऊर्जा मंत्री साद अल-काबी ने बीते सोमवार को यह घोषणा की कि आने वाले जनवरी माह में क़तर ओपेक को छोड़ देगा.

इस फ़ैसले के पीछे उन्होंने वजह बताई कि क़तर प्राकृतिक गैस की ओर अधिक ध्यान देना चाहता है.

क़तर की अर्थव्यवस्था में तेल से अधिक गैस का महत्व है. दोहा में साद अल-काबी ने कहा था , "क़तर ने ये तय किया है कि जनवरी, 2019 से वो ओपेक का हिस्सा नहीं रहेगा. इस फ़ैसले के बारे में ओपेक को बता दिया गया है."

काबी ने अपने आधिकारिक बयान में कहा था कि क़तर गैस उत्पादन की क्षमता को 77 मिलियन टन प्रतिवर्ष से बढ़ाकर 110 मिलियन टन करना चाहता है.

क़तर के ऊर्जा मंत्री ने इस फ़ैसले के पीछे किसी भी तरह की राजनीति से इनकार किया है. हालांकि फिर भी कई जानकारों का मानना है कि क़तर इस संगठन से इसलिए अलग होना चाहता था क्योंकि इसमें सऊदी अरब और दूसरे खाड़ी देशों का प्रभुत्व है.

सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने पिछले साल क़तर पर कई कड़े प्रतिबंध लगाए थे.

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इमेज कैप्शन, क़तर के ऊर्जा मंत्री

क़तर के बाहर होने का कितना असर?

ओपेक संगठन में क़तर की हिस्सेदारी बहुत कम थी. क़तर रोज़ाना 6 लाख बैरल तेल का उत्पादन करता है, यह मात्रा ओपेक के समूचे उत्पादन के दो प्रतिशत से भी कम है.

इसके मुक़ाबले सऊदी अरब अकेले प्रतिदिन एक करोड़ बैरल तेल का उत्पादन करता है. इस तरह कहा जा सकता है कि क़तर के ओपेक में रहने या ना रहने का तेल के बाज़ार पर बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ेगा.

वॉशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित जेफ़ डी कोलगेन के लेख में बताया गया है कि 1982 से अभी तक ओपेक अधिकतर मौक़ों पर अपने उत्पादन लक्ष्यों की प्राप्ती नहीं कर पाया.

कोलगेन अपनी एक रिसर्च का हवाला देते हुए लिखते हैं कि ओपेक अपने लिए ऐसे उत्पादन लक्ष्य तय करता है जो ख़ुद ही उसके प्रभाव को कम करते हैं.

कोई भी संगठन अपने लिए मुश्किल लक्ष्य तय करता है और संगठन के प्रत्येक सदस्य से उम्मीद करता है कि वह उसे पूरा करने में सहयोग दे जबकि ओपेक अपने लिए आसान लक्ष्य तय करने के बावजूद उन्हें पूरा नहीं कर पाता.

हालांकि इसके बावजूद वैश्विक तेल बाज़ार में ओपेक की स्वीकार्यता कम नहीं मानी जा सकती. आमतौर पर जब तेल के दाम बढ़ने लगते हैं तो ओपेक तेल का उत्पादन घटाने लगता है.

तेल

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वैसे, तेल के दामों और उत्पदान क्षमता के लिए पूरी तरह ओपेक को ही ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, यह प्रत्येक देश पर भी निर्भर करता है. ओपेक में भी बहुत अधिक शक्ति सऊदी अरब के पास है, इसलिए ओपेक के किसी भी फ़ैसले को सऊदी के रुख़ के तौर पर भी जाना जाता है.

क़तर के बाहर होने से ओपेक एक संगठन के तौर पर कमज़ोर हुआ है. वैसे इससे विश्व बाज़ार में तेल के दामों पर तो कोई बहुत अधिक असर नहीं पड़ेगा.

फ़िलहाल, तेल के दाम अमरीका और चीन के बीच जारी व्यवसायिक संबंधों पर अधिक निर्भर कर रहे हैं.

कुछ जानकार मानते हैं कि क़तर के इस फ़ैसले का आने वाले वक़्त में गैस के दामों पर असर पड़ता हुआ दिख सकता है. ख़ासतौर पर एशियाई देशों पर क्योंकि यहां गैस के दाम अब भी तेल के दामों के साथ जोड़े जाते हैं.

ओपेक

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क्या होगा राजनीतिक असर?

ओपेक संगठन की वैश्विक राजनीति में एक अच्छी पैठ समझी जाती है. 1970 में इस संगठन को वैश्विक पहचान मिल गई थी.

वॉशिंगटन पोस्ट के लेख के अनुसार, ओपेक यह भ्रम पैदा करने में कामयाब रहा कि वह दुनियाभर में तेल के बाज़ार को नियंत्रित करता है. इसी साख के दम पर इसके सदस्य देशों को अधिक राजनयिक महत्व मिलता है.

शायद यही वजह है कि क़तर के अलग होने के फ़ैसले पर ओपेक ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि यह संगठन को राजनीतिक तौर पर कमज़ोर करने की कोशिश है.

साल 2016 में मध्य अफ़्रीकी देश गेबोन दोबारा इस संगठन में शामिल हुआ. इसके अलावा हाल ही में साल 2017 में इक्वीटोरियल गीनिया और साल 2018 में कांगो गणराज्य भी इस संगठन का हिस्सा बन गए.

क़तर मध्य पूर्व का पहला देश है जो ओपेक संगठन से अलग हुआ है. ईरान के तेल मंत्री ने ओपेक से आग्रह किया है कि वे क़तर के इस फ़ैसले की समीक्षा करें.

इससे पहले साल 2009 में इंडोनेशिया ने भी इस संगठन को छोड़ दिया था. हालांकि साल 2016 में वह आंशिक रूप से इससे दोबारा जुड़ गया.

ओपेक

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क़तर का संगठन से बाहर होना यह दर्शाता है कि उसके लिए इस संगठन की राजनीतिक महत्ता कम हो गई थी. क़तर के पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हमाद बिन जासिम अल थानी ने कहा है, ''यह संगठन बेकार हो गया था, यह हमारे किसी काम का नहीं था.''

वहीं दूसरी तरफ़ अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप तेल की बढ़ती क़ीमतों के लिए लगातार ओपेक को निशाने पर लिए हुए थे. ऐसे में क़तर के लिए बेहद ज़रूरी था कि वह अमरीका के साथ खड़ा रहे क्योंकि साल 2017 में जब सऊदी क़तर पर हमले की तैयारी कर रहा था तब अमरीका ने ही सऊदी को रोका था.

क़तर के बाहर होने से मध्य पूर्व में पहले से चल रहे तनाव के बादल और ज़्यादा गहराने के आसार हैं. वैसे ओपेक सगंठन इस तनाव के बावजूद तमाम देशों के बीच निष्पक्ष भूमिका में रहा है.

जैसे, ओपेक के दो सदस्य देश इराक़ और ईरान 1980 में आठ साल लंबा युद्ध लड़ चुके हैं लेकिन इसके बावजूद वे दोनों संगठन का हिस्सा बने रहे.

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