अमरीका-ईरान के 'तलाक़' में सऊदी अरब ने कितना धन ख़र्च किया

    • Author, कीवान हुसैनी
    • पदनाम, बीबीसी फ़ारसी सेवा

आख़िरकार आख़िरी तारीख़ आ ही गई और पाबंदी का वो असली दौर फिर से शुरू हो गया जिसके लिए फ़्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी ने अनमने ढंग से हामी भरी. लेकिन इसराइल, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में कई लोगों के दिलों को चैन मिला.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के ईरान के परमाणु क़रार से बाहर निकलने के फ़ैसले पर इसराइल, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन ने शीघ्र और सकारात्मक प्रतिक्रिया दिखाई थी.

इन देशों में इसराइल का नज़रिया ईरान के परमाणु क़रार पर शुरू से ही साफ़ था और वो इस पर अपनी चिंताएं ज़ाहिर कर चुका था और इस क़रार के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचार करने वालों में वह सबसे आगे था.

लेकिन क्षेत्र के दूसरे देशों जैसे सऊदी अरब और फ़ारस की खाड़ी के देशों की स्थिति इसराइल जैसी नहीं थी.

इनमें सऊदी अरब ने तो एक समय परमाणु क़रार का समर्थन किया था, लेकिन आख़िर में वो इसका मुख्य विरोधी बनकर सामने आया और इसे तोड़ने और ईरान पर दोबारा पाबंदी लगवाने की कोशिश करने लगा.

लेकिन सवाल ये है कि ये कोशिशें कितनी गंभीर थीं और क्या सऊदी अरब का सही मायने में अमरीका के ईरान के परमाणु क़रार से बाहर निकलने और ईरान पर दोबारा पाबंदी लगाए जाने में बहुत बड़ा हाथ है?

परमाणु क़रार से पहले

सऊदी अरब सालों से ईरान के परमाणु मसले का बातचीत के ज़रिए और सियासी हल की वकालत करता आया था और उसके उच्च अधिकारियों ने इस समस्या के सैनिक समाधान के विरोध में वक्तव्य भी दिया था.

ईरान के साथ परमाणु वार्ता के शुरुआती दिनों में सऊदी अरब और ईरान न तो यमन में एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े थे और न ही सीरिया में 'प्रॉक्सी वॉर' लड़ रहे थे.

इसके अलावा, सऊदी अरब के पूर्व बादशाह मलिक अब्दुल्ला के समय इस देश की विदेश नीति 'आक्रामक' नहीं थी.

इसी तरह रियाद, तेहरान और अंकारा के बीच क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता खुलकर सामने नहीं आई थी.

इसी बीच जब ईरान के परमाणु कार्यक्रम का मामला सामने आया तो इराक़ में सद्दाम हुसैन का काम तमाम होने और अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की गतिविधि के असर में मध्य-पूर्व में अपने प्रतिद्वंद्वियों को मात देने की नीति चल पड़ी और धीरे-धीरे सऊदी अरब की सियासी चाल बदलने लगी.

वह भी ख़ासकर इसलिए कि बहुत जल्दी ईरान का इराक़ में प्रभाव एक हक़ीक़त के रूप में क़ुबूल कर लिया गया था.

अरब स्प्रिंग का जन्म

आख़िर में इस लड़ाई की चिंगारी ने 'अरब स्प्रिंग' का रूप ले लिया और दोनों पक्षों के दिल में अपने असर के दायरे को प्रतिबंधित सीमा से आगे तक फैलाने की लालसा पनपने लगी.

यही वजह थी कि साल 2015 में जब ईरान के परमाणु विवाद पर समझौता हो गया तो इस क्षेत्र के राजनीतिक विशेषज्ञों ने इस समझौते पर सऊदी अरब और उसके सहयोगी अरब देशों के संभावित विरोध का या तेहरान और वॉशिंगटन के बीच संबंध सुधरने की संभावना से इन देशों की मुकम्मल नाख़ुशी का बार-बार ज़िक्र किया.

फिर उस समय के अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पहल करते हुए ईरान के परमाणु क़रार पर हस्ताक्षर से दो महीने पहले सऊदी अरब समेत छह अरब देशों को अमरीका के कैंप डेविड में दावत दी और एक बैठक में उन सभी को यकीन दिलाया कि तेहरान के साथ समझौते के बाद वॉशिंगटन उनकी सुरक्षा को नहीं भुलाएगा.

आख़िरकार ईरान का परमाणु क़रार तय हो गया और इसके महज़ दस दिन से भी कम समय के अंदर सऊदी अरब के बादशाह सलमान ने भी तत्कालीन अमरीकी विदेश मंत्री एश्टन कार्टर के साथ एक मुलाक़ात में कहा कि उनका देश ईरान के परमाणु क़रार की हिमायत करता है.

इस संबंध में सऊदी अरब के दृष्टिकोण को ही बाक़ी छोटे-छोटे अरब देशों ने भी दोहराया.

सच्चाई ये है कि उन दिनों सऊदी अरब ने इस मसले पर ज़ाहिरी हामी भर दी और क्षेत्र में भी कोई तनाव पैदा नहीं किया और न ही अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा के साथ किसी प्रकार की खींचातानी में ही गया.

ईरान के साथ परमाणु क़रार के बाद

लेकिन इसी बीच परमाणु क़रार के बाद की घटनाओं और सऊदी अरब के अधिकारियों के यहां-वहां दिए गए बयानों से पता चलने लगा कि ये लोग शुरू से ही इस समझौते के विरोधी थे.

और सबसे महत्वपूर्ण ये कि इसके बाद क्षेत्र में बदलती सियासी तस्वीर ने भी सऊदी अरब और ईरान के बीच तनाव और बढ़ाया.

साल 2016 में शेख़ निम्र (शिया धर्मगुरु जिन्हें 'अरब स्प्रिंग' फैलने के बाद गिरफ़्तार कर लिया गया था) के फांसी के विरोध में हिज्बुल्लाह के लोगों द्वारा तेहरान में सऊदी अरब के दूतावास पर हमले के बाद इन दोनों देशों के बीच डिप्लोमैटिक संकट और गहरा गया जो आज तक जारी है.

इसके बाद से अरब देश शक्तिशाली शहर वॉशिंगटन डीसी की ओर चल पड़ा जिस पर सालों से तेहरान का सबसे बड़ा दुश्मन यानी इसराइल चलता आ रहा था.

इसमें अमरीकी अधिकारियों और राजनेताओं के साथ लॉबीइंग करना शामिल था ताकि ईरान के संदर्भ में इनके फ़ैसले पर असर डाला जा सके.

अमरीका के एफ़एआरए (फ़ॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट) के मुताबिक़, विदेशी सरकारों को अपने उस तमाम ख़र्च किए गए धन का ब्योरा अमरीकी सरकार को देना पड़ेगा जिसे उसने वॉशिंगटन के फ़ैसलों पर असर डालने के लिए और लॉबीइंग में इस्तेमाल किया है.

इन तमाम ख़र्चों की विस्तृत जानकारी अमरीकी कांग्रेस को दिए गए अमरीकी जस्टिस विभाग की रिपोर्ट में देखी जा सकती है.

इन दस्तावेज़ों से पता चलता है कि ईरान के परमाणु क़रार के बाद सऊदी अरब ने लॉबीइंग के ख़र्च में बहुत ज़्यादा इज़ाफ़ा किया है.

साल 2014 में उसने इस मद में छह मिलियन डॉलर ख़र्च किए थे जबकि उसका यही ख़र्च साल 2015 में लगभग 15 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया था.

अमरीका में लॉबीइंग पर ख़र्च

अमरीका में सऊदी अरब की लॉबीइंग कोई नई चीज़ नहीं है क्योंकि इसने खरबों डॉलर की हथियारों की ख़रीदारी के मौक़े पर अपने विचारों और दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने में अकसर जनसंपर्क कंपनियों, एजेंटों या लॉबीइंग करने वालों को भाड़े पर लिया है.

लेकिन दैनिक क्रिश्चियन साइंस मॉनीटर की साल 2016 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2015 में रियाद ने वॉशिंगटन में लॉबीइंग करने वालों को जो रक़म दी उसका अधिकांश हिस्सा मात्र एक लक्ष्य पर ख़र्च किया गया और वह लक्ष्य था ईरान के विरुद्ध सऊदी अरब के विचारों का प्रचार-प्रसार.

इस पर सऊदी अरब का तर्क यह था कि ईरान के परमाणु क़रार से उसकी विदेश नीति पर कोई असर नहीं पड़ा है और तेहरान पहले की तरह ही सीरिया, यमन, इराक़, बहरीन और लेबनान के आंतरिक सियासी झगड़ों में सक्रिय हस्तक्षेप करता रहा है.

लेकिन एक बात ये भी है कि इन तमाम झगड़ों में ख़ुद सऊदी अरब भी ईरान समर्थित गुटों के विरोधी गुटों को समर्थन देता आया है.

ईरान के विरुद्ध सऊदी अरब की लॉबीइंग का एक मुख्य निशाना ईरान का मिसाइल कार्यक्रम भी रहा है क्योंकि सऊदी अधिकारियों ने कभी खुले तौर पर तो कभी प्रोपैगेंडा द्वारा और कभी मीडिया के ज़रिये ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को उन पर सीधा ख़तरा दिखाया.

राष्ट्रपति ट्रंप का दौर

इन्हीं परिस्थितियों में अमरीका का राष्ट्रपति चुनाव भी पूरा हो गया और डोनल्ड ट्रंप की अप्रत्याशित जीत ने जैसे खेल का पासा सऊदी अरब के हक़ में पलट दिया.

अब इसराइल समेत ईरान के परमाणु क़रार के तमाम विरोधियों की कोशिशों ने ईरान के परमाणु क़रार से अमरीका के बाहर हो जाने के मुद्दे को 'मीडिया सवाल' में बदल दिया था. बात यहां तक पहुंच गई थी कि राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों खासकर रिपब्लिकन उम्मीदवारों को इस सवाल का सामना करना पड़ा कि वे ईरान के परमाणु क़रार के साथ क्या करेंगे.

दूसरे रिपब्लिकन उम्मीदवारों के मुक़ाबले डोनल्ड ट्रंप ने ईरान और उसके परमाणु क़रार के मामले में भी सख़्त विरोध का रास्ता अपनाया.

डोनल्ड ट्रंप का राष्ट्रपति बनना परमाणु क़रार के विरोधियों के लिए एक सुनहरा अवसर बन कर आया और इसमें सऊदी अरब भी पीछे नहीं रहा.

इसने वॉशिंगटन में लॉबीइंग के लिये पेचीदा और घुमावदार नेटवर्क को अपनाते हुए कई कंपनियों और संस्थानों को बड़ी भारी रक़म देकर अपने लिए इस्तेमाल किया.

बहस पर नियंत्रण

इस नेटवर्क ने जो रक़म सीधे रियाद से वसूल की और जिस रक़म का ब्योरा अमरीका के न्याय मंत्रालय को दिया गया, इन सबसे पता चलता है कि राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकाल के पहले साल में सऊदी अरब ने अमरीका में लॉबीइंग के खर्च को कई गुना बढ़ाते हुए अमरीकी कंपनियों को इस काम के लिए 27 मिलियन डॉलर चुकाया.

इस दस्तावेज़ से पता चलता है कि एमएसएल ग्रुप नाम की एक कंपनी ने परमाणु क़रार के बाद तीन साल में सऊदी अरब से छह मिलियन डॉलर हासिल किया और इसके बदले क्षेत्र में ईरान की गतिविधियों के विरुद्ध सामग्री तैयार करके इसे नियमित रूप से अमरीकी नेताओं को बांटा.

इसका एक नमूना जो अभी भी अमरीकी न्याय मंत्रालय की वेबसाइट पर मौजूद है, "एक प्रोपेगैंडा है जिसमें सऊदी अरब के नेताओं के हज़ारों खूबियां गिनाई गई हैं और ईरान को 'चरमपंथ का सबसे बड़ा समर्थक देश' बताया गया है."

एक और नमूना, "ये एक संक्षिप्त गोपनीय दस्तावेज़ है, ईरान की यमन में उपस्थिति और उसके मिसाइल कार्यक्रम के बारे जो एक लॉ फर्म 'होगन लॉज़' ने तैयार किया है. इस पांच पन्ने के दस्तावेज़ में इस लड़ाई में हूती समूह का मिसाइल से हमला, हूती का ईरान से संबंध और आख़िर में ईरान को इस क्षेत्र में अस्थिरता फैलाने वाली शक्ति के रूप में दर्शाया गया है."

इस प्रकार के दस्तावेज़ आम तौर पर रसूखदार अमरीकी राजनेताओं जैसे व्हॉइट हाउस और कांग्रेस के स्टाफ़ से लेकर सीनेट के अधिकारियों और सिनेटरों के बीच पहुंचाई जाती है ताकि ये रसूखदार लोग बहसों, मीडिया के साथ अपने साक्षात्कारों यहां तक कि अपने भाषणों में इन गुप्त दस्तावेज़ों का हवाला दे सकें.

साथ ही इस बात का भी ध्यान रखा जाता है कि ये सामग्री एक ही समय पर मीडिया में भी आए.

सऊदी अरब के अधिकारियों के वक्तव्य और भाषणों में ईरान के परमाणु क़रार का खुला विरोध शायद इस क़रार के विरुद्ध उस बड़े प्रोपेगैंडा का महज़ एक छोटा सा हिस्सा था जिसका सारा बोझ असल में इसराइल और वॉशिंगटन में उसके समर्थकों के कंधे पर था.

और आख़िरकार जब फ़ैसला लेने का समय आ गया तो ईरान पर पाबंदी के रहस्य की चाबी सऊदी अरब के बादशाह के हाथ में थी, और वह चाबी थी तेल!

और यह चाबी वॉशिंगटन के हवाले करने में उसे भी कोई कठिनाई नहीं थी.

इसी वजह से अंतिम चरण में सऊदी अरब ने ये एलान किया कि ईरान पर दोबारा पाबंदी के बाद वो तेल के उत्पादन में इज़ाफ़ा करेगा ताकि बाज़ार में स्थिरता क़ायम रहे और क़ीमत भी न बढ़े.

आख़िरकार अरब देश ईरान को इस क्षेत्र में पीछे धकेलने में कामयाब होंगे या नहीं, यह एक ऐसा सवाल है जिस के जवाब में अनेकों परस्पर विरोधी मत और विचार सामने आ सकते हैं.

लेकिन रियाद का वॉशिंगटन में थोड़े समय वाला राजनयिक लक्ष्य यानी ईरान के परमाणु क़रार को गंभीर रूप से कमजोर करना और ईरान पर दोबारा पाबंदी, सऊदी अरब की एक ऐसी जीत है जिसे उसने इसराइल समेत कुछ और भी देशों के साथ साझा किया है.

दूसरे शब्दों में ये कह सकते हैं कि सऊदी अरब जो दूसरे विश्वयुद्ध के बाद के सालों में लगातार अनेक दशकों तक वॉशिंगटन में इसराइल की डिप्लोमैटिक लॉबीइंग से पीड़ित रहा और इस खेल में अक़्सर तेल अवीव से हारता रहा, अब 21वीं सदी के शुरुआती दशकों में उसने ये साबित कर दिया कि आख़िर उसे वह दांवपेच याद है और वह अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संबंध में या कम से कम अमरीका में कामयाब हो गया है.

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