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ब्रेक्सिट को लेकर ब्रिटेन की सरकार में उथल-पुथल
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सोमवार को दो मंत्रियों के इस्तीफ़े के बाद ब्रिटेन में एक बड़ा राजनीतिक संकट पैदा हो गया है, जिससे ख़ुद ब्रितानी प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे की कुर्सी ख़तरे में नज़र आ रही है.
ब्रेक्सिट यानी यूरोपीय संघ से अलग होने के लिए हुए जनमत संग्रह के बाद की प्रक्रिया को लेकर सत्तारूढ़ कंज़र्वेटिव पार्टी की सरकार और प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे की कैबिनेट में फूट पड़ गई है.
ब्रेक्सिट पर सख़्त लाइन लेने वाले गुट का आरोप है कि ब्रिटेन के अलग होने का प्रधानमंत्री का फ़ॉर्मूला देश को यूरोपीय संघ से पूरी तरह से अलग करने में नाकाम रहेगा.
कंजर्वेटिव पार्टी के दो उपाध्यक्षों मारिया कॉलफील्ड और बेन ब्रैडले ने भी इसी मुद्दे पर इस्तीफा दे दिया है. दोनों ने चेताया है कि ब्रेक्सिट का वादा पूरा न कर पाने की स्थिति में वे अपनी सीटें नहीं जीत पाएंगे.
मारिया कॉलफील्ड ने कहा कि प्रधानमंत्री मे की योजना देश और पार्टी दोनों के लिए बुरी होगी.
उनके अनुसार कई क्षेत्रों में ब्रिटेन और संघ के बीच पुराने रिश्ते जारी रहेंगे. उनका कहना है कि जनमत संग्रह में लोगों ने संघ से पूरी तरह से अलग होने का फ़ैसला दिया था ना कि अधूरे तौर पर.
उनका आरोप है कि प्रधानमंत्री के फ़ॉर्मूले से ये महसूस होता है कि ब्रिटेन का एक पैर संघ के अंदर होगा और एक बाहर.
पीएम के फ़ॉर्मूले पर फूट
प्रधानमंत्री के फ़ॉर्मूले के पक्ष में राय रखने वाले इसे आज की परिस्थितियों में सबसे अच्छा सूत्र मानते हैं.
वो कहते हैं कि आज की परस्पर निर्भर अर्थव्यवस्था में कोई देश पड़ोसियों से अलग-थलग नहीं रह सकता.
दो दिन पहले टेरीज़ा मे के मंत्रिमंडल ने अपनी एक एक बैठक में यूरोपीय संघ से अलग होने के उनके फ़ॉर्मूले को स्वीकृति दे दी थी.
लेकिन इसके बाद विदेश मंत्री बोरिस जॉनसन और ब्रेक्सिट मामलों के मंत्री डेविड डेविस ने इस्तीफ़ा दे दिया. ये दोनों उस गुट के नेता हैं, जो ये सोचते हैं कि ब्रिटेन को यूरोपीय संघ से पूरी तरह से अलग होना चाहिए.
विदेश मंत्री बोरिस जॉनसन ने इस्तीफ़ा देते हुए कहा कि ब्रेक्सिट का सपना मर रहा है. उन्होंने प्रधानमंत्री मे को इसका ज़िम्मेदार ठहराया.
बोरिस मानते हैं कि प्रधानमंत्री का फ़ॉर्मूला स्वीकार किया गया तो ब्रिटेन यूरोपीय संघ की एक कॉलोनी बन कर रह जाएगा.
पार्टी और सरकार के अंदर आए संकट को देखते हुए विपक्ष ने प्रधानमंत्री के नेतृत्व पर सवाल खड़ा कर दिया है.
ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ से बाहर निकलने की औपचारिक बातचीत की प्रक्रिया शुरू की थी लेकिन समझौते में देरी हो रही है.
ब्रिटेन 29 मार्च 201 9 को यूरोपीय संघ छोड़ रहा है लेकिन दोनों पक्षों के बीच अब तक इस बात पर सहमति नहीं बन पाई है कि इसके बाद ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के बीच रिश्ते कैसे होंगे और व्यापार कैसे काम करेगा.
समझौते में देरी का कारण ये बताया जा रहा है कि ब्रेक्सिट की रणनीति को लेकर कंज़र्वेटिव पार्टी में असहमति है.
देरी की एक और वजह ये भी बताई जा रही है कि ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के बीच ब्रेक्सिट के बाद रिश्ते किस तरह के हों, इस पर कई तरह के विवाद है. उदाहरण के तौर पर दोनों पक्ष अब तक ये तय नहीं कर सके हैं कि आपसी व्यापर पहले की तरह फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट के अंतर्गत होगा या नहीं.
अनिश्चितता का माहौल
ब्रेक्सिट ने ब्रिटेन में अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है. ब्रिटेन जब संघ से अलग होगा तो क्या उसकी अर्थव्यवस्था कमज़ोर हो जाएगी? यूरोप के देशों से आकर ब्रिटेन में रहने वालों की नागरिकता क्या होगी?
उन्हें ब्रिटेन में रहने की अनुमति होगी या नहीं? और यूरोप में ब्रिटेन के नागरिकों को रहने की इजाज़त होगी या नहीं? क्या दोनों पक्षों के देशों के नागरिकों को बग़ैर वीज़ा के प्रवेश करने की आज़ादी होगी? इन सब मुद्दों पर समझौते के लिए दोनों पक्षों में बातचीत होनी है.
उधर ब्रिटेन लगातार ये कोशिश कर रहा है कि ब्रेक्सिट के बाद इसके रिश्ते अहम देशों से अच्छे बनें.
भारत के साथ रिश्ते
प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे और उनके मंत्रिमंडल के कई मंत्रियों ने भारत का दौरा किया है ताकि दोनों देशों के बीच रिश्ते और गहरे हों, ख़ास तौर से व्यपारिक रिश्ते. ब्रिटेन भारत को एक बड़े बाज़ार की तरह से देखता है. वर्ष 2000 से अब तक ब्रितानी कंपनियों ने भारत में 16 अरब डॉलर निवेश किया है जिसके कारण आठ लाख लोगों को नौकरियां मिली हैं.
भारत की 800 निजी कंपनियों ने ब्रिटेन में पैसे लगाए हैं. जिनसे एक लाख से अधिक नौकरियों के अवसर उपलब्ध हुए हैं.
दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक रिश्ते भी हैं. भरतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले चार सालों में दो बार ब्रिटेन का दौरा कर चुके हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिटेन को यूरोपीय संघ से अलग होने के बाद भारत जैसे देशों की सख्त ज़रूरत पड़ेगी.
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