कंपनियों में ऐसे रुकेगा महिलाओं का यौन शोषण

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"मैंने अभी-अभी अपना घर शिफ़्ट किया है. क्या तुम मेरे यहां आकर मेरा बिस्तर आज़माना चाहोगी?"
शारलेट एक वकील हैं और उन्हें ये मैसेज उनके ही एक क्लाइंट ने भेजा था. ये अकेला मौक़ा नहीं है जब उन्हें अपने करियर के दौरान अनचाहा सेक्शुअल अटेंशन मिला हो.
वे बताती हैं, "सबसे बुरा तो तब था जब मेरे एक शादीशुदा सीनियर ने ऐसा किया. हम एक इवेंट में थे और हमने काफ़ी शराब पी रखी थी. वो उस हाथ से मेरे बालों पर हाथ फेर रहा था जिसमें उसने शादी की अंगूठी पहन रखी थी. वो कह रहा था कि मैं बहुत ख़ूबसूरत हूं.''
शारलेट ने बताया, "वो बहुत सीनियर हैं, उनकी बहुत इज़्ज़त है और उन्हें एक 'फ़ैमिली मैन' के तौर पर जाना जाता है. चूंकि कंपनी में भी उनका क़द बहुत ऊंचा है इसलिए मेरे लिए उनकी शिक़ायत करना बहुत मुश्किल था."
जो शारलेट के साथ हुआ, वो तक़रीबन हर इंडस्ट्री में होता है.

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#MeToo
हॉलीवुड में हार्वी वाइन्सटन मामला सामने आने के बाद और सोशल मीडिया में #MeToo मुहिम के बाद यौन शोषण की वो कहानियां सामने आईं, जिनके बारे में कभी बात भी नहीं की जाती थी.
ऐसे में अब कंपनियों और बिज़नेस की दुनिया पर यौन शोषण रोकने का दबाव है और वो इससे जूझ भी रहे हैं.
वर्कप्लेस और कंपनियों में यौन शोषण रोकने के लिए कुछ तरीके हैं जो कारगर साबित हो सकते हैं, जैसे:
ट्रेनिंग
अमरीका में यौन उत्पीड़न से निबटने के लिए 1990 से ट्रेनिंग दी जा रही है और अब ये चलन यूरोप में बढ़ रहा है. हर बीतते दिन के साथ ये और ज़्यादा पॉपुलर हो रहा है.
रिपोर्टिंग
लोगों को ट्रेनिंग देने आसान होता है लेकिन शिक़ायत करने के लिए तैयार करना मुश्किल क्योंकि ज़्यादातार मामलों में पीड़िता/पीड़ित बोलने से कतराते हैं.

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'कंपनियां पीड़ितों से 'सही' सवाल नहीं पूछती'
एंप्लॉयमेंट लॉयर कैरेन जैक्सन ने नौकरी छोड़कर ख़ुद की प्रैक्टिस शुरू की क्योंकि वे ख़ुद भी यौन शोषण का शिकार हुई थीं.
वे कहती हैं, "मेरे पास कई ऐसे कई क्लाइंट्स आते हैं जो अपनी कहानी मुझसे भी शेयर नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें ख़ुद पर शर्म आती है."
इससे निबटने के लिए कई कंपनियां फ़ोन हेल्पलाइन का सहारा ले रही हैं. ये फ़ोन लाइन्स स्वतंत्र हैं और किसी भी तरह के दबाव से मुक्त हैं.
डॉ. जूलिया शॉ ने यौन शोषण की शिक़ायत को आसान बनाने के लिए 'टॉक टू स्पॉट' नाम का एक ऐप बनाया है.
ये एक चैटबोट है जो पीड़ित से सवाल पूछता है और जवाबों के रिकॉर्ड सुरक्षित रखता है ताकि ज़रूरत पड़ने पर उन्हें पेश किया जा सके.
जूलिया का कहना है कि ज़्यादातर कंपनियां पीड़ितों से 'सही' सवाल नहीं पूछती.

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ऐसे मामलों का ऑडिट रखें कंपनियां
अगर कोई हिम्मत करके शिक़ायत करता भी है तो कॉर्पोरेट की दुनिया में यौन शोषण के मामले अक्सर 'समझौते' पर खत्म हो जाते हैं और पीड़ित को एनडीए (नॉन डिस्क्लोज़र एग्रीमेंट) साइन करना पड़ता है यानी उसे इस बात के लिए राज़ी कर लिया जाता है कि कि वो अपने साथ हुए यौन शोषण के बारे में किसी को नहीं बताएंगे.
यही वजह है कि ये पता ही नहीं चल पाता कि असल में यौन शोषण की कितनी घटनाएं होती हैं.
इसलिए एक्सपर्ट्स कंपनियों को ऐसे मामलों का ऑडिट रखने की सलाह देते हैं.
कंपनियों में महिलाओं और पुरुषों का एक सही अनुपात होना ज़रूरी है. ज़्यादातर संस्थाओँ में ऊंचे पदों पर पुरुषों का वर्चस्व है और ऐसे में एक महिला के लिए यौन शोषण की शिक़ायत कर पाना बेहद मुश्किल होता है.
अगर वो ऐसा करती है तो ऑफ़िस के 'बड़े लोगों' का उसके ख़िलाफ़ जाने का डर होता है.

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अगर कंपनियां अपने कर्मचारियों को यौन शोषण से निबटने के लिए सही तरीके की ट्रेनिंग दें,
शिक़ायत के करने के लिए सुरक्षित माहौल दें और ऐसे सभी मामलों का रिकॉर्ड रखें तो निश्चित तौर पर सकारात्मक नतीजे सामने आएंगे.
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