ब्लॉग: 'भारत और पाकिस्तान में क्रिकेट पर पैसा क्या, जान भी कुर्बान है'

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, पाकिस्तान से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
रविवार रात पाकिस्तान सुपर लीग की आख़िरी गेंद पड़ते ही क्रिकेट का 104 डिग्री तक पहुंच जाने वाला बुख़ार अब आहिस्ता-आहिस्ता उतर रहा है.
हफ्ते की शुरुआत है और काम पर जाने वाला पाकिस्तान आधा जागता आधा सोता जा रहा है. जिन्हें कोई काम नहीं उनके लिए आज भी रविवार है.
कराची के जिस नेशनल स्टेडियम में 'पेशावर ज़ाल्मी' और 'इस्लामाबाद यूनाइटेड' का फ़ाइनल पड़ा वो मेरे घर से सिर्फ़ डेढ़ किलोमीटर दूर है.
चैंपियनशिप तो 'इस्लामाबाद यूनाइटेड' ने तीन विकटों से जीत ली मगर जिन ट्रकों, टैकरों और बसों को जिस तरीके से खड़ा करके सड़कें पैदल चलने वालों के लिए बंद की गई हैं, वो सड़कें पूरी तरह से सोमवार दोपहर तक ही अपने पैरों पर खड़ी हो पाएंगी.
आस-पास की सारी दुकानें और रेस्तरां भी बंद करवा दिए गए. जोश मे आकर वो सड़क भी आधी रात तक बंद रही जिस पर कराची के दो बड़े अस्पताल मौजूद हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images
पिछला पाकिस्तान सुपर लीग
कराची का ये फ़ाइनल, क्रिकेट बोर्ड और सरकार को मिल-मिलाकर लगभग 50 करोड़ रुपये में पड़ा. जिसमें से आप चाहें तो 27 हज़ार टिकट बेचकर मिलने वाले लगभग 3 करोड़ रुपये कम कर लें.
27 हज़ार लोग स्टेडियम के अंदर थे तो उतने ही पुलिस और पैरामिलिट्री जवान आधे शहर में पहरे पर थे. बाकी पाकिस्तान गलियों, मैदानों, होटलों, स्टूडेंट्स हॉस्टलों में बड़ी स्क्रीनें लगाकर चीख रहा था.
कल देशभर में कोई ऐसा ढोल वाला न था जिसने भीड़ को थाप पर न नचवाया हो.
पिछला पाकिस्तान सुपर लीग जब इसी माहौल में लाहौर में खेला गया को इमरान ख़ान ने कहा था कि ऐसे ही कड़े पहरे में खिलाना है तो क़ाबुल, बग़दाद और दमिश्क में भी मैच कराया जा सकता है.
पाकिस्तानी या हिंदुस्तानी

इमेज स्रोत, Getty Images
ज़ाहिर है इस पर ख़ान साहब को चौतरफ़ से बुरा-भला कहा गया जबकि ख़ान साहब से ज़्यादा किसे मालूम होगा कि भारत और पाकिस्तान में क्रिकेट खेल नहीं, धर्म का हिस्सा है और धर्म पर पैसा क्या जान भी कुर्बान है.
हालांकि मुझे क्रिकेट में उतनी ही दिलचस्पी है जितनी एक आम पाकिस्तानी या हिंदुस्तानी को आइस हॉकी में हो सकती है.
और मुझ जैसों को भी अच्छा नहीं लगता था कि नाम तो हो पाकिस्तान सुपर लीग और मैच सारे दुबई में हों.
किसी का क्या जाता है अगर कोई सट्टे पर कमा ले कोई लाइटों का ठेका ले ले, किसी को बिल बोर्ड्स और इश्तिहारों से कमाई हो जाए.
कोई टीवी के कवरेज राइट्स लेकर आगे बेच दे.

इमेज स्रोत, Getty Images
राजनीति और इल्ज़ामबाज़ी
आम लोगों को भी चंद घंटे की खुशी मिल जाए और कुछ देर के लिए ही सही, लेकिन सस्ती राजनीति और इल्ज़ामबाज़ी से छुटकारा भी पा जाए तो किसी के बाप का क्या जाता है.
रही बात सड़कें और अस्पताली रास्ते लंबे समय के लिए बंद होने से जनता की कठिनाई में और इज़ाफ़ा होने की तो जनता तो नाम ही कठिनाइयां झेलने का है.
ये मुश्किल न होगी तो कोई और मुश्किल होगी. बहरहाल इतने कामयाब और पुरअम्न पाकिस्तान सुपरलीग मैचों पर बधाई हो.















