कन्नूर की हत्याएं: कहीं सीपीएम को महंगी न पड़ जाएं

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) ने कांग्रेस कार्यकर्ता की हत्या के अभियुक्त अपने चार कार्यकर्ताओं को पार्टी से निकालकर इस बात का संकेत दे दिया है कि अब पार्टी भी राजनीतिक हत्याओं को ख़त्म करने का दबाव महसूस कर रही है.
पार्टी ने शुरूआत में अपने कार्यकर्ताओं का बचाव किया जिन पर पिछले महीने कांग्रेस कार्यकर्ता एस एल शुऐब की कन्नूर में हत्या करने का आरोप लगा. ये वही कन्नूर ज़िला है जो पिछले 40 सालों से सीपीएम और आरएसएस के कार्यकर्ताओं की राजनीतिक हत्या के लिए कुख्यात है.
इस फ़ैसले की प्रासंगिकता को ऐसे भी समझा जा सकता है कि इन कार्यकर्ताओं को निकाले जाने का फ़ैसला कन्नूर की मीटिंग में लिया गया जहां खुद मुख्यमंत्री पिनराई विजयन और पार्टी के राज्य सचिव कोडियेरी बालकृष्णन भी मौजूद थे. ये दोनों नेता कन्नूर ज़िले से आते हैं.
सीबीआई जांच के मिले आदेश

इमेज स्रोत, Getty Images
इससे पहले राजनीतिक हत्याओं को लेकर इस तरह का कोई फ़ैसला नहीं लिया गया था. कन्नूर में राजनीतिक हत्याओं का इतिहास 40 दशक पुराना है और फ़िलहाल अनुमान लगाया जाए तो औसतन हर महीने एक राजनीतिक हत्या यहां हो रही है.
अगर मई 2016 से अब तक देखा जाए, जबसे विजयन सरकार ने सत्ता संभाली है, तो राजनीतिक हत्याओं की फ़ेरहिस्त में शुऐब का नंबर 21वां है. जनवरी में शुऐब ने कांग्रेस और सीपीएम के छात्र संगठनों के बीच झगड़े को रोकने की कोशिश की थी.
कुछ दिन बाद ही सीपीएम प्रदर्शनकारियों ने नारे लगाए कि शुऐब के दिन पूरे हो गए हैं. इसकी वीडियो भी स्थानीय चैनलों पर दिखाई गई. इसके कुछ दिन बाद 11 लोगों ने शुऐब पर हमला किया जिनमें से चार सत्ताधारी सीपीएम के सदस्य थे.
लेकिन सरकार को बड़ा झटका तब लगा जब केरल हाई कोर्ट ने शुऐब की हत्या के केस में सीबीआई जांच के आदेश दे दिए.
'आरएसएस में न जाने पर मिली मौत'
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता के के बलराम ने बीबीसी हिंदी को बताया,"जो लोग शुऐब के केस में शामिल हैं, वो बाकी कई आरएसएस कार्यकर्ताओं के केस में भी शामिल हैं. इसका मतलब है कि उन्हें ये करने के लिए पैसा दिया जाता है. इनमें से एक अभियुक्त आकाश, आरएसएस कार्यकर्ता विनीश की हत्या में भी शामिल है. कुछ अभियुक्त बाकी मुकदमों में भी शामिल हैं."

इमेज स्रोत, Getty Images
कांग्रेस नेतृत्व वाली यूडीएफ़ सरकार में मंत्री रहे के सुधाकरन ने कहा, "वे विपक्षी दलों को कुचलना चाहते हैं और लोकतांत्रिक गतिविधियों को भी बर्दाश्त नहीं करते. ऐसे 30-40 गांव हैं जहां कोई और पार्टी घुस भी नहीं सकती और ना अपना झंडा लगा सकती. वो तो पोलिंग बूथ में दूसरी पार्टी के एजेंटों को घुसने भी नहीं देते."
लेकिन सीपीएम के पूर्व मंत्री प्रोफ़ेसर एम ए बेबी ने कहा,"हमारी लेफ्ट सरकार इन हिंसक झगड़ों को रोकने के लिए प्रतिबद्ध है. मुख्यमंत्री ने शांति और समरसता बनाने के लिए सभी दलों की मीटिंग की पहल की है."
बलराम ने माना कि मुख्यमंत्री ने पहल की, "ये फ़ैसला किया गया था कि जब भी कोई भी छोटी घटना होगी, पार्टियां उस झगड़े को वहीं के वहीं सुलझा लेंगी. लेकिन ऐसा अब तक नहीं हो पाया."
प्रोफ़ेसर बेबी ने कहा कि इन राजनीतिक हत्याओं के बारे में बहुत ग़लत प्रचार हुआ है. उन्होंने आनंद नाम के व्यक्ति का उदाहरण दिया जिसे इसलिए मार दिया गया क्योंकि उसने आरएसएस की शाखा में जाना बंद कर दिया था.
उन्होंने कहा,"जैसे ही उसे लगा कि ये हिंसा की राजनीति है, उसने वहां जाना बंद कर दिया और उसकी हत्या हो गई."
प्रोफ़ेसर बेबी ने हिंसा के लिए मुख्य तौर से आरएसएस को ज़िम्मेदार ठहराया. ''मैं कसूर को बांटना नहीं चाहता. मेरी मंशा ये कहने की नहीं है कि हम ज़िम्मेदार नहीं."

इमेज स्रोत, Getty Images
राजनीतिक जानकार एम.जी. राधाकृष्णन ने बीबीसी हिंदी को बताया,"कोई बेकसूर नहीं है. चूंकि सीपीएम सत्ता में है तो उनकी ज़िम्मेदारी ज़्यादा बनती है कि ऐसा ना होने दें."
केरल विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शजी वार्के का कहना है, "थोड़ी हिंसा भी भाजपा को फ़ायदा पहुंचाएगी क्योंकि केरल शांतिप्रिय राज्य है जो बड़े स्तर की हिंसा को नहीं सह सकता."
हत्याओं का गढ़!
राधाकृष्णन ने कहा कि 'हिंसा उस स्तर पर पहुंच गई है जहां पार्टी नेतृत्व का अपने कार्यकर्ताओं पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया क्योंकि 'बदला' अपना रास्ता खुद चुन लेता है. अब ये 'फ्रेंकेन्सटीन' राक्षस बन गया है जो सीपीएम का अपना हाथ ही खा रहा है.'
राधाकृष्णन ने कहा कि, ''बदले के लिए की गई हत्याओं ने आरएसएस की छवि को सुधारने में मदद की जिससे उन्होंने पूरे देश में प्रचार किया कि केरल अब हत्याओं का गढ़ बन गया है, लेकिन जो लोग बीजेपी को क़रीब से देख रहे थे उन्हें पता है कि वे भी ज़िम्मेदार हैं. आखिरकार, इस पर लगाम लगाने की ज़िम्मेदारी सीपीएम की है."
प्रोफ़ेसर बेबी का कहना है कि उनकी पार्टी लोकतांत्रिक राजनीति के लिए है और वो हार सकते हैं.
इसका मतलब पार्टी को अंदेशा है कि वो मुसलमानों के एक धड़े का वोट खो सकते हैं जो 2016 विधानसभा चुनावों में उन्हें मिला था. जानकारों का मानना है कि ये सबसे बड़ा कारण है कि पार्टी नेतृत्व ने अपने कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई का फ़ैसला किया.

बलराम ने कहा, "अगर सीपीएम का नेतृत्व इसे नियंत्रित कर ले तो शांति बहाल हो सकती है. वर्ना, पुलिस को कार्रवाई के लिए आज़ादी देनी चाहिए. वो भी नहीं दी गई है."
सुधाकरन ने बताया कि बदले के लिए की गई राजनीतिक हत्याएं कांग्रेस-यूडीएफ़ की सरकार में कम होती थीं.
"एलडीएफ असामाजिक तत्वों को समर्थन देती है और पुलिस को कार्रवाई के लिए खुला हाथ नहीं देती.
कन्नूर में हिंसा का ऐसा माहौल बन गया है कि सीपीएम के अपने कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई के बाद भी पार्टी के छात्र संघ के नेता को पिछले शनिवार ही आरएसएस कार्यकर्ताओं के एक हमले में गंभीर चोटें आईं थीं.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)












