पाकिस्तानी मुक्केबाज़ जिन्हें धर्म बचाने को देश छोड़ना पड़ा

    • Author, ननचनोक वॉन्गस्मुथ
    • पदनाम, बीबीसी थाई सेवा

ये कहानी थाईलैंड में पिछले चार साल से शरणार्थी के दर्जे का इंतज़ार कर रहे एक पाकिस्तानी खिलाड़ी की है.

54 साल के ये खिलाड़ी अपना नाम बॉक्सर बताते हैं. वे ईसाई हैं और पाकिस्तान के नेशनल लेवल के खिलाड़ी रहे हैं.

उनका कहना है कि पाकिस्तान में उन्हें ओलंपिक खेलों में हिस्सा लेने से सिर्फ़ इसलिए रोका गया क्योंकि वे ईसाई थे.

बॉक्सर के मुताबिक़ चार साल पहले पाकिस्तान में उनके परिवार पर हमला हुआ था, जिसके बाद वे लोग थाईलैंड आ गए.

क्या पाकिस्तान में ईसाइयों को दिक्कत होती है. थाईलैंड में बना पाकिस्तानी दूतावास इससे इनक़ार करता है. उनके मुताबिक़ पाकिस्तान में ईसाइयों को सताए जाने का कोई मामला सामने नहीं आया है.

पत्नी को जेल में डाला

बॉक्सर बैंकॉक में जिस घर में रहते हैं, वो इतना छोटा है कि चार लोगों का उनका परिवार बमुश्किल वहां रह पा रहा है.

मेरी उनसे मुलाक़ात इसी घर में हुई. बॉक्सर के मुताबिक़, 'मैं ईसाई पैदा हुआ था, ईसाई ही मरूंगा.'

बॉक्सर के पास आमदनी का कोई नियमित ज़रिया नहीं है. उनकी पत्नी पिछले ढाई साल से जेल में हैं और गंभीर रूप से बीमार हैं. उन्हें ज़रूरी दस्तावेज़ न होने के कारण हिरासत में लिया गया था.

बॉक्सर और उनके बेटे ने बीबीसी की थाई सेवा से इस शर्त पर बात करने की मंज़ूरी दी कि उनकी मौजूदा तस्वीर नहीं ली जाएगी और असली नाम भी नहीं बताया जाएगा.

'पापा ने कहा विदेशी बॉक्सर से मत लड़ो'

लाहौर में पैदा हुए बॉक्सर ने 13 साल की उम्र में ही बॉक्सिंग शुरू कर दी थी.

उन्होंने वे तस्वीरें और अख़बारों में छपी रिपोर्ट दिखाईं जिनमें उनके जीतने की ख़बर छपी थी.

ये तस्वीरें बॉक्सर की यादों का एक छोटा सा हिस्सा है क्योंकि ऐसी ज़्यादातर तस्वीरें और अख़बारी कतरनें उनके लाहौर वाले घर में छूट गई थीं.

वे बताते हैं, ज़्यादातर बॉक्सर दूसरे राउंड में ही रिंग से बाहर हो गए थे. मैंने कड़ी मेहनत की और आख़िरकार नेशनल चैम्पियन बना. कई ट्रॉफ़ी जीतीं. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने भी मुझे सम्मानित किया था.

1979 में बॉक्सर को विदेशी मुक्केबाज़ों से भी भिड़ने का मौक़ा मिला.

इस अनुभव के बारे में बॉक्सर ने बताया कि, ''मेरे पिता ने कहा था कि विदेशी बॉक्सर बेहद ताक़तवर है, उनसे मत लड़ो लेकिन मैंने कहा कि मैं उसका घमंड चूर-चूर कर दूंगा.''

'पाकिस्तान ने इस्लाम अपनाने का दबाव बनाया'

बॉक्सर ने उस विदेशी मुक्केबाज़ को हरा भी दिया. हज़ारों लोगों ने वो मुक़ाबला देखा और उनकी लोकप्रियता बढ़ गई.

मुक्केबाज़ी में उनके सीनियर्स ने उन्हें कई बार इस्लाम अपनाने की सलाह दी लेकिन वे नहीं माने.

1984 के लॉस एंजिलिस ओलंपिक खेलों में पाकिस्तान की सेलेक्शन कमिटी ने बॉक्सर का नाम लॉस एंजिलिस जा रहे खिलाड़ियों की लिस्ट से हटा दिया.

बीबीसी थाई सेवा ने अपनी जांच में पाया कि बॉक्सर उस साल के ओलंपिक खेलों में हिस्सा नहीं ले पाए थे.

साल 2005 में बॉक्सर ने मुक्केबाज़ी छोड़ कोचिंग शुरू की.

बॉक्सर का कहना है कि पाकिस्तान में उन पर ईसाई धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने के लिए दबाव बढ़ता चला गया.

थाईलैंड को ही क्यों चुना?

शुरू में कुछ लोगों ने उनका साथ दिया लेकिन एक वक़्त ऐसा आया जब वे अकेले पड़ गए. उन्होंने चर्च से मदद मांगी.

लेकिन वे थाईलैंड ही क्यों आए?

इस सवाल के जवाब में बॉक्सर का कहना है कि थाईलैंड का वीज़ा आसानी से मिल गया था.

साल 2014 में वे परिवार के साथ थाईलैंड आ गए और उन्होंने यूनाइटेड नेशनल ह्यूमन राइट्स कमिशन से मदद मांगी.

यूएनएचसीआर ने उनके परिवार को रिफ्यूजी दर्जा देने से इनकार कर दिया. इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील लंबित है.

यूएनएचसीआर की दक्षिण एशिया मामलों की प्रवक्ता विवियन तान ने बॉक्सर के बारे में पूछे जाने पर कहा कि 'वे लोग निजी जानकारी नहीं देते हैं लेकिन थाईलैंड में बहुत से पाकितानी शरणार्थी हैं.'

'थाईलैंड में रहना सस्ता पड़ता है'

बॉक्सर अपने परिवार के इकलौते ऐसे सदस्य हैं जिनके पास थाईलैंड में रहने के लिए वीज़ा है जिसे वे हर साल रिन्यू कराते हैं.

उनकी पत्नी दूसरे शरणार्थियों के बच्चों को पढ़ाती थीं लेकिन 10 सितंबर, 2015 को पड़े छापे के बाद से वे जेल में हैं.

बॉक्सर के आरोपों पर थाईलैंड स्थित पाकिस्तानी दूतावास के प्रवक्ता ने कहा कि वे पाकिस्तान से ईसाइयों के थाईलैंड आने की वजह आर्थिक मानते हैं.

प्रवक्ता के मुताबिक़ थाईलैंड में यूरोप की तुलना में लिविंग कॉस्ट कम है.

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