बीबीसी विशेष: उत्तर कोरिया से बच भागे, लेकिन...

    • Author, नितिन श्रीवास्तव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, द. कोरिया के अनसन शहर से

बीस साल पहले उत्तर कोरिया के नागरिक किम सोक-चोल अपना देश छोड़कर इस आस में भागे थे कि दक्षिण कोरिया में शरण मिलेगी.

लेकिन उत्तर कोरिया के बहुत ही कम ऐसे नागरिक होंगे जिन्हें इतनी नाउम्मीदी का सामना करना पड़ा हो.

दक्षिण कोरिया के सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 1990 के दशक में उत्तर कोरिया में आए ज़बरदस्त सूखे और भुखमरी के प्रकोप से बचने के लिए 30 हज़ार से ज़्यादा लोगों ने भागकर शरण ली.

इनमें से ज़्यादातर इसके लिए उत्तर कोरिया में किम परिवार के 'कड़े और तानाशाही' वाले प्रशासन को भी ज़िम्मेदार मानते हैं.

लेकिन किम सोक-चोल इस कोशिश में आज भी नाक़ाम हैं.

उन्होंने बीबीसी हिंदी से आपबीती बयान की.

'मां महीनों जेल में रहीं'

मेरा जन्म उत्तर कोरिया के सा-रयु-वॉन शहर में हुआ था और मैं वहां तीस साल रहा.

दक्षिण कोरिया भागकर आए तीन साल हो चुके हैं लेकिन एक कागज़ न होने की वजह से मुझे धक्के खाने पड़ रहे हैं.

चार साल का था जब मेरे पिता, परिवार को लेकर चीन की तरफ़ भागे थे.

एक भाई और बहन के साथ वो तो सीमा पार कर गए लेकिन अपनी माँ और बड़े भाई के साथ मैं पकड़ा गया.

माँ को महीनों जेल में रहना पड़ा और स्कूल में मुझे 'गद्दार' होने के ताने सुनने पड़े.

'मुझे नौकरी से निकाल दिया गया'

ग्रेजुएशन के बाद मैं हा-रियोंग शहर की ट्रेन फ़ैक्ट्री में काम करने लगा.

कुछ साल बाद उत्तर कोरियाई सरकार ने मेरा तबादला एक वीरान इलाके की एक फ़ैक्ट्री में कर दिया.

मैं वहां नहीं जाना चाहता था लेकिन काम न करने पर सरकार मेरा राशन-पानी बंद कर देती.

आख़िरकार, मुझे नौकरी से निकाल दिया गया और मेरी हालत बिगड़ने लगी.

चीन में रह रहे बुज़ुर्ग पिता दूसरी शादी कर अपना नया परिवार बसा चुके थे.

'भागकर चीन पहुंचा, लेकिन मन नहीं लगा'

तरस खाकर, उन्होंने किसी तरह 'रिश्वत' देकर मेरे परिवार के लिए वहां की नागरिकता ख़रीदी.

किसी तरह, छिपते-छिपाते, हम चीन के यांबियान शहर पहुंचकर रहने लगे. मैंने उत्तर कोरिया से भागकर आई एक महिला से शादी कर ली और हमें एक बेटा हुआ.

सच ये है कि चीन में मेरा दिल कभी नहीं लगा और मैंने दक्षिण कोरिया में शरण लेनी की ठानी.

इंसानों की तस्करी कराने वाले एक ग्रुप ने हमें चीन से थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक पहुंचाया.

'दक्षिण कोरिया का शरण देने से इंकार'

लेकिन दक्षिण कोरियाई दूतावास ने मुझे शरण देने से मना कर दिया क्योंकि मेरे पास उत्तर कोरिया के कागज़ात नहीं थे.

दक्षिण कोरिया की नीति उन्हीं लोगों को शरण और नागरिकता देने की रही है जिनके पास अपने पुराने इतिहास के कागज़ हों और चीनी नागरिकों को वे इसमें शामिल नहीं करते.

हां, मेरी पत्नी और उसके साथ-साथ मेरे बेटे को शरण मिल गई क्योंकि उसका परिवार जब भागकर चीन आया था तब उनके पास पूरे प्रमाण थे.

मुझे फिर से चीन भेज दिया गया. इस बीच दक्षिण कोरिया के अनसन शहर में अपनी मां के साथ रह रहा मेरा बेटा बड़ा हो रहा था.

'दक्षिण कोरिया में मैं बाहरी हूं'

उसने उत्तर कोरिया से भागकर आई एक लड़की से शादी कर ली और मेरी एक पोती भी है.

2015 में मुझे दक्षिण कोरिया आने का वीज़ा इसलिए मिल सका क्योंकि मेरी पत्नी और बेटे अब यहां के नागरिक हैं.

लेकिन अफ़सोस कि मैं आज भी यहां के लोगों के लिए 'बाहरी' हूं और वे मुझे कम इज़्ज़त देते हैं.

न मैं नौकरी कर सकता हूँ और न ही किसी तरह से पैसे कमा सकता हूँ.

मेरी पत्नी बेटे की ट्रैवेल एजेंसी में मदद करती है जिससे घर चलता है और दक्षिण कोरिया की सरकार ने मेरी नागरिकता की गुहारों को ख़ारिज कर रखा है.

अब मैंने एक वकील की मदद ली है और आगे चलकर अदालत का दरवाज़ा भी खटखटाऊंगा.

मैं वापस उत्तर कोरिया जा नहीं सकता और दक्षिण कोरिया मुझे रखने को तैयार नहीं. आख़िर जाऊं तो जाऊं कहाँ?

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