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उत्तर कोरिया का वो गुप्त शहर जिससे है ख़ौफ़?
उत्तर कोरिया में हाशिये के शहर हमहुंग राजधानी प्योंगयांग से बिल्कुल अलग-थलग है. यह शहर ऊंचे और नुकीले पर्वतों से घिरा हुआ है.
कहा जा रहा है कि उत्तर कोरिया का यहां एक गुप्त केमिकल प्लांट है और मिसाइल को विकसित करने में इस प्लांट की अहम भूमिका है. इसी शहर से मिसाइलों को ईंधन मुहैया कराया जाता है.
शोधकर्ताओं का कहना है कि रॉकेट में जिस यूडीएमएच ईंधन का इस्तेमाल किया जाता है, उसका उत्पादन इसी प्लांट में होता है. यहीं से लंबी दूरी की मिसाइलों को लॉन्च किया जाता है. अमरीका और उत्तर कोरिया में बढ़ते तनाव के बीच इस प्लांट का महत्व बढ़ गया है.
उत्तर कोरिया पर नज़र रखने वालों के लिए यह शहर अब चर्चा के केंद्र में आ गया है. दूसरी तरफ़ यह भी कहा जा रहा है कि उत्तर कोरिया ईंधन का उत्पादन नहीं कर सकता है.
बताया जा रहा है कि उत्तर कोरिया रूस और चीन से ईंधन का आयात करता है. इधर बीच दोनों देशों पर दबाव है कि उत्तर कोरिया को ऐसी आपूर्ति करना बंद करे. अगर रूस और चीन ईंधन की आपूर्ति नहीं करेंगे तो उत्तर कोरिया की मिसाइल काम नहीं करेगी.
हालांकि अब मिडलबरी कॉलेज में जेम्स मार्टिन सेंटर फोर नॉनप्रोलिफ़िरेशन स्टडीज का दावा है कि उत्तर कोरिया में यूडीएमएच ईंधन के उत्पादन की क्षमता है. उत्तर कोरिया लगातार अपने मिसाइल प्रोग्राम को आगे बढ़ा रहा है. इससे पहले उत्तर कोरिया के बारे में कहा जाता था कि वो ईंधन के लिए दूसरे देशों पर आश्रित है.
अब कुछ विश्लेषकों का कहना है कि उत्तर कोरिया को लंबे समय तक ईंधन के मामले में दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना होगा. मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलाजी के प्रोफ़ेसर विपिन नारंग ने परमाणु मुद्दों को लेकर अध्ययन किया है. उन्होंने कहा कि उत्तर कोरिया के मामले में यह अध्ययन काफ़ी महत्वपूर्ण है.
उन्होंने कहा कि उत्तर कोरिया अगर इस मामले में दूसरे देशों पर निर्भर नहीं है तो यह बहुत महत्वपूर्ण बात है. नारंग ने कहा कि इस सूरत में उत्तर कोरिया पर तमाम प्रतिबंधों का कोई मतलब नहीं रह जाएगा.
उन्होंने कहा कि उत्तर कोरिया को इस क्षमता के साथ विनाशकारी बनने से कोई रोक नहीं सकता है.
उत्तर कोरिया के बारे में यह नई बात सैटलाइट तस्वीरों के आधार पर कही जा रही है. इन तस्वीरों के आधार पर यूडीएमएच प्रोडक्शन का विश्लेषण किया गया है. इसे लेकर एक उत्तर कोरियाई अधिकारी से सूचना भी मिली है लेकिन उसमें कई खामियां भी हैं. जो दस्तावेज मिले हैं उन्हें अधूरा बताया जा रहा है.
मिडलबरी के ईस्ट एशिया नॉनप्रोलिफ़िरेशन प्रोग्राम के निदेशक जेफ्री लुविस उत्तर कोरिया में यूडीएमएच की मौजूदगी को लेकर अध्ययन कर रहे थे. उन्होंने इसे लेकर कहा, ''यहां अभी कुछ भी ज़मीन पर नहीं है. ज़ाहिर है कि अभी संकेत मिले हैं. ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है कि इसे सामान्य केमिकल क्लोरिन और अमोनिया से कई तरीक़ों से 1906 में विकसित किया गया था.
भारत ने बड़े शांत तरीक़े से 1970 के दशक में मिसाइल प्रोग्राम विकसित कर लिया था. भारत ने यूडीएमएच चीनी के पुराने कारखानों से विकसित किया था. उत्तर कोरिया से इसके संकेत तब मिले जब मिडलबरी की टीम ने उत्तर कोरियाई साइंस जर्नल में उच्चस्तरीय तकनीकी लेखों को पढ़ा. यह जर्नल केमिस्ट्री और केमिकल साइंस को लेकर निकलता है, जिसने ईंधन होने की बात कही थी.
ये लेख 2013 से 2016 के बीच के हैं. इन आलेखों में ज़हरीले गंदे पानी की बात है जो कि यूडीएमएच उत्पादन की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण समस्या है. लुविस ने कहा कि वे इन अटकलों और प्रारंभिक कोशिशों को बहुत तवज्जो नहीं देते हैं. वे इस रूप में देखते हैं कि जो किया जा रहा है उससे समस्या पैदा होगी.
उन्होंने कहा कि समस्या तब होगी जब व्यापक पैमाने पर ईंधन का उत्पादन होगा. उन्होंने कहा कि जो दस्तावेज़ हैं उनके आधार पर इस नतीजे तक पहुंचना कि उत्तर कोरिया के पास ईंधन उत्पादन की क्षमता है तो यह धोखा होगा.
हमहुंग बहुत ही जटिल इलाक़ा है. यहां उच्चस्तरीय रॉकेट ईंधन के लिए उतरते हैं. इस प्लांट से सामान्य तौर पर सस्ते सिंथेटिक मटीरियल का उत्पादन होता है. उत्तर कोरिया में इसका इस्तेमाल कपड़ों में किया जाता है. हालांकि लुविस का कहना है कि उनकी प्राथमिकता में यूडीएमएच का उत्पादन है.
लुविस का कहना है कि हमहुंग उनकी टीम के निशाने पर सैटेलाइट तस्वीर और कई तरह की निगरानी के बाद आया. हाशिये के इस इलाक़े में ज़ाहिर है कि कोई संवेदनशील सैन्य ठिकाना नहीं है. हालांकि उत्तर कोरियाई अधिकारी को चों-सोंग ने 2001 में में एक किताब में संकेत दिया था कि यहां पर एक गुप्त केमिकल सेंटर है.
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