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अब भी कौन कौन है उत्तर कोरिया का मददगार
- Author, एलेक्स ओलिवर और युआन ग्राहम
- पदनाम, लोवी संस्था, बीबीसी हिंदी के लिए
वैसे तो उत्तर कोरिया आज दुनिया भर के अधिकांश देशों से कटा हुआ है, फिर भी बहुत सारे मुल्कों के साथ उसके कूटनीतिक संबंध आज भी कायम हैं.
करीब 50 देश आज भी इसके साथ अपने संबंध कायम रखे हुए हैं. ये कौन-कौन से देश हैं? और उत्तर कोरिया के साथ कितना नजदीकी संबंध रखते हैं?
हालांकि, उत्तर कोरिया से दूरी बनाने वाले देशों की संख्या में लगातार इजाफ़ा हो रहा है लेकिन इस अलगाव के बावजूद इतने देशों के साथ इसके राजनयिक संबंध आश्चर्यजनक हैं.
संबंध तोड़ने का दबाव
1948 में अपने गठन के बाद उत्तर कोरिया ने करीब 160 देशों के साथ अपने औपचारिक राजनयिक संबंध कायम किए. 55 देशों में इसके दूतावास और 48 देशों में वाणिज्य दूतावास हैं.
ब्रिटेन, जर्मनी, स्वीडन सहित करीब 25 देशों के राजनयिक अब भी उत्तर कोरिया में हैं.
उत्तर कोरिया के गठन के बाद इसके साथ सबसे पहले राजनयिक संबंध जोड़ने वाले इसके तत्कालीन कम्युनिस्ट पड़ोसी देश चीन और रूस थे.
अमरीका दुनिया भर के देशों पर उत्तर कोरिया के साथ संबंध तोड़ने का दबाव डाल रहा है. संयुक्त राष्ट्र में अमरीका की राजदूत निकी हेली ने "सभी देशों से संबंध तोड़ने को" कहा है.
स्पेन, कुवैत, पेरू, मैक्सिको, इटली और म्यांमार ने पिछले कुछ दिनों में अपने राजदूतों और राजनयिकों को वहां से हटा लिया है. तो पुर्तगाल, युगांडा, सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात और फ़िलीपींस ने भी सभी संबंध तोड़ दिये हैं.
लेकिन दुनिया भर में उत्तर कोरिया के कई दूतावास व्यापार के लिए खुले रहेंगे.
कुछ देश पहले से नज़दीक आए
इसी बीच कुछ देशों ने तो उत्तर कोरिया के साथ अपने संबंधों को पहले से और मज़बूत बनाया है. उत्तर कोरिया कई अफ्रीकी देशों के साथ निर्माण योजनाओं पर काम कर रहा है और ऊर्जा एवं कृषि क्षेत्र में भी बातचीत चल रही है.
हालांकि इनके राजनयिक संबंधों में कई ख़ामियां हैं.
उत्तर कोरिया में दुनिया भर के विकसित देशों के अंतरराष्ट्रीय संगठन आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) के 35 में से केवल छह देशों के दूतावास अब भी मौजूद हैं.
अमरीका, जापान और दक्षिण कोरिया ने उत्तर कोरिया के साथ कभी राजनयिक संबंध नहीं स्थापित किए.
इसका मतलब यह है कि अमरीका और इसके कुछ क़रीबी सहयोगी उत्तर कोरिया से बाहर आने वाली विचित्र ख़बरों के लिए अन्य देशों पर भरोसा करते हैं.
ये ख़बरें जर्मनी, ब्रिटेन और स्वीडन जैसे देशों से आती हैं, जिनके उत्तर कोरियाई दूतावास एक ही परिसर में हैं और ना तो इन्होंने अपने राजदूतों को वापस बुलाया और ना ही वहां के दूतावास को बंद किया है.
उत्तर कोरियाई दूतावास पर अवैध कमाई का आरोप
एशिया, यूरोप, मध्य पूर्व और अफ्रीका में उत्तर कोरिया के ये दूतावास आर्थिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण हैं. साथ ही संयुक्त राष्ट्र के एकतरफा प्रतिबंधों के जाल से बचने में भी इनका बेहद महत्व है.
ये दूतावास पैसों के लिए आत्मनिर्भर हैं और उन पर आरोप है कि वो अवैध कमाई करते हैं.
उत्तर कोरिया के यूरोपीय दूतावास के मेजबान ने दूतावास पर स्थानीय व्यापारियों के साथ अवैध बिज़नेस का आरोप लगाया.
उत्तर कोरिया के साथ सहानुभूति रखने वाला पाकिस्तान में उत्तर कोरियाई राजनयिक के घर पर हुई चोरी से संदेह हुआ कि वो बड़े स्तर पर शराब के अवैध निर्माण में लगा हो सकता है.
दोनों तरफ, खुफिया एजेंसियां एक दूसरे के अधिकारियों पर संदेह करते हैं. वो राजनयिकों पर बारीक नज़र रख रहे हैं और उनकी यात्राओं पर भी.
उत्तर कोरिया ने भी काउंटर इंटेलिजेंस के तहत अपने राजनयिकों को लगाया है. इस सभी समस्याओं को देखते हुए स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि इस कूटनीति से क्या हासिल होगा?
कुछ समाजावादी या कम्युनिस्ट देश जैसे, क्यूबा, वेनेजुएला और लाओस के साथ उत्तर कोरिया का संबंध परस्पर वैचारिक समर्थन जैसा दिखता है.
अमरीका विरोधी होने की वजह से एकजुट
लेकिन इन दिनों, इस तरह के कूटनीतिक रिश्ते परस्पर समान विचारधारा की बजाय अमरीका विरोधी होने की वजह ज़्यादा हैं. यही सीरिया और इरान के मामले में भी है.
चाहे वो जहां भी हों उत्तर कोरिया के राजनयिकों से सरकार के समर्थन में और विरोधी विचारों को जबाव देने की उम्मीद की जाती है.
कभी कभी इसके लिए वो किसी भी हद तक जाते हैं, उदाहरण के लिए किम जोंग-उन के बाल की आलोचना करने वाले नाइयों की पिटाई का मामला हो.
पश्चिमी देश जहां उत्तर कोरिया के दूतावास हैं और जिनकी उत्तर कोरिया में भी मौजूदगी है वो उसके साथ संबंध इसलिए बनाए रखना चाहते हैं क्योंकि उनका मानना है कि कोरियाई समस्या का सबसे अच्छा समाधान कूटनीति ही है.
ये दूतावास कभी कभी बहुत महत्वपूर्ण सेवाएं भी दे सकते हैं: जैसे स्वीडिश राजनयिकों को अमरीकी छात्र ओटो वार्मबियर से मिलने की इजाजत दी गयी थी. अमरीकी छात्र ओटो वार्मबियर को 2016 में उत्तर कोरिया में गिरफ़्तार किया गया था और अमरीका लौटने पर उनकी मौत हो गयी थी.
कम ख़र्च होते हैं उत्तर कोरियाई दूतावास पर
उत्तर कोरिया में एक पूर्व ब्रिटिश राजदूत कहते हैं कि वहां के दूतावास पर कम ख़र्च होते हैं और एक संभावित अस्थिर स्थिति में अतंरराष्ट्रीय समुदाय की आंख और कान के रूप में काम करने के लिए वो अच्छी स्थिति में होंगे.
अमरीकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने संकेत दिया कि अमरीका अब उत्तर कोरिया से बात करने के लिए तभी राजी होगा जब वो बातचीत की मेज पर आने के लिए तैयार हो.
लोवी इंस्टीट्यूट के राजनयिक संबंधों के मानचित्र से पता चलता है कि कुछ देश उत्तर कोरिया के साथ अपने संबंध कम कर रहे हैं.
वित्तीय संकट के बाद 43 ओईसीडी और जी20 देशों में से केवल आठ देशों ने पिछले दो सालों में उत्तर कोरिया में अपनी गतिविधियों में कमी लाई है.
इसके उलट हंगरी, तुर्की और ऑस्ट्रेलिया समेत 20 देशों ने अपने राजनयिक संबंधों में तेज़ी लाई है.
इससे यह साफ़ जाहिर है कि उत्तर कोरिया और दुनिया के बाकी देशों के बीच राजनयिक विकल्प अभी समाप्त नहीं हुए हैं.
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