ब्लॉगः वो मुस्कुरा कर बोला, "सऊदी अरब बदल रहा है"

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सऊदी अरब में महिलाओं को ड्राइविंग की इजाज़त का ऐलान वहां की औरतों के लिए अच्छी ख़बर है लेकिन वहां काम कर रहे दक्षिण एशिया के 10 लाख ड्राइवरों के लिए बुरी ख़बर.
अगले साल जून से जब महिलाएं खुद अपनी कार ड्राइव करने लगेंगी तो भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के लाखों ड्राइवरों की नौकरियां चली जाएंगी.
दूसरे क्षेत्रों में भी भारत और अन्य देशों से आकार काम करने वाले लोगों की नौकरियां जा रही हैं. सऊदी सरकार अपने नागरिकों को नौकरियों में पहले तरजीह दे रही है. सऊदी अरब में प्रशिक्षित और कुशल श्रमिकों की एक बड़ी फ़ौज तैयार है. वो जो पहले काम नहीं करना चाहते थे अब करने पर मजबूर हैं. हालात बदल रहे हैं.

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बदलाव की धीमी हवा
एक ज़माने से अपरिवर्तित सऊदी समाज अब बदलाव की धीमी हवा के लपेट में है. इसका अंदाज़ा मुझे हाल में एक सऊदी युवा से मिलकर हुआ. इस युवा से मेरी मुलाक़ात हाल में लंदन के एक कैफ़े में हुई. ये अनजान युवा हुलिए और पहनावे से किसी पश्चिमी देश का एशियाई नज़र आ रहा था. मुझसे अच्छी अंग्रेज़ी में बातें कर रहा था.
मैंने बातों के दौरान मन ही मन में उसकी नागरिकता पर गेस करना शुरू कर दिया. "ये भारतीय है या पाकिस्तानी? लेबनान का भी हो सकता है..." आख़िर उसकी शहरियत मैंने पूछ ही डाली और जब उसने कहा कि वो सऊदी अरब से है तो मैं हैरान रह गया.
एक सऊदी नागरिक की छवि से अलग वो खुले ज़हन का पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित एक युवा अधिक नज़र आ रहा था.
मैंने पूछा लंदन में पढ़ाई कर रहे हो तो उसने कहा लंदन वो शॉपिंग करने आया है. उसने आगे बताया वो एक सिविल इंजीनियर है और सऊदी में बिनलादिन कंस्ट्रक्शन कंपनी में काम करता है. उसने कहा उसने अपनी सारी पढ़ाई अपने देश में की है.

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लैंगिक समानता की हिमायत
मेरी हैरानी को देखते हुए वो मुस्कुराया और कहा भाई हैरान ना हों. "हमारा देश बदल रहा है. अब हम जैसे युवा मैकडॉनल्ड्स और केएफसी जैसी जगहों पर काम कर रहे हैं, जो कुछ साल पहले तक सोचा भी नहीं जा सकता था."
मैंने पूछा तो भाई इतनी अच्छी अंग्रेज़ी कहां सीखी, वो कहने लगा अपने देश में. "अंग्रेजी सीखने के लिए हमें लंदन या न्यूयॉर्क जाने की ज़रूरत नहीं. हम यहाँ आने के बजाए अंग्रेज़ी टीचरों को अच्छी पगार पर अपने देश ही बुला लेते हैं."
उस युवा का नाम तो अब याद नहीं रहा लेकिन उसकी कूल पर्सनालिटी, उसका आत्मविश्वास, लैंगिक समानता पर उसकी हमसे मिलती जुलती राय और खुली सोच ने हमें बहुत प्रभावित किया.
वो सऊदी अरब में शुरू हुए सामाजिक और सियासी बदलाव का एक चलता-फिरता उदाहरण था. इसीलिए जब हाल में वहां महिलाओं को वाहन ड्राइव करने की इजाज़त से लेकर उन्हें खेल के स्टेडियम में जाने की अनुमति तक की ख़बरें सुनी तो हमें अधिक हैरानी नहीं हुई. उस सऊदी युवा ने मुझ से कहा था कि उसके देश का समाज बदल रहा है.

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बदलाव की राह में रोड़े भी
अगर आप गहराई से सोचें तो बदलाव या परिवर्तन एक शक्तिशाली शब्द महसूस होगा. और अगर बदलाव सकारात्मक हो तो ये किसी क्रांति से कम नहीं होता. सऊदी अरब में महिलाओं को दिए जाने वाले अधिकारों को वहां के समाज के परिप्रेक्ष्य में रखें तब ही इसकी अहमियत का सही अंदाज़ा होगा.
सऊदी सरकार के इन क़दमों पर टिप्पणी करते हुए एक स्थानीय धर्म गुरु ने कहा कि महिलाओं को ये अधिकार नहीं देने चाहिए क्यूंकि वो आधे दिमाग़ की होती हैं. इस बयान पर सऊदी नागरिकों ने उनकी जम कर खिंचाई की. ये है परिवर्तन में आने वाली दिक़्क़तें.
परिवर्तन अपने आप नहीं हो रहा है बल्कि बदलाव लाया जा रहा है और इसका श्रेय सऊदी अरब के 32 वर्षीय राजकुमार मुहम्मद बिन सलमान को जाता है जिन्होंने कुछ दिन पहले ये वादा किया कि उनका देश अब उदारवादी इस्लाम को अपनाएगा.

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पहले की तुलना में कहीं अधिक आज़ादी
उनके बदलाव का सपना 'विज़न 2030' में दर्ज है, जिसके अनुसार सऊदी अरब को एक आधुनिक राज्य बनाया जाएगा और इसे एक वहाबी इस्लाम वाले समाज से उग्र इस्लाम वाले समाज में बदला जाएगा.
इस दस्तावेज़ के मुताबिक़ सऊदी अरब की तेल निर्यात पर निर्भरता ख़त्म की जाएगी और इसकी अर्थव्यवस्था को ठोस आर्थिक योजनाओं से मज़बूत किया जाएगा.
पूरी तरह से बदलाव आने में एक-दो पीढ़ी का समय लग जाएगा. भारत को इसका अनुभव है. देश में आर्थिक उदारीकरण 1991 में शुरू हुआ लेकिन इसके परिणाम आते-आते सालों लग गए. आज हमारा समाज 1970 और 1980 के दशकों से कितना अलग है.
मुझे भारत के दोनों समाज में रहने का अनुभव है. मैं पहले वाले समाज की मासूमियत और सरलता को बहुत मिस करता हूँ लेकिन आज के भाग दौड़ वाले जीवन से भी खुद को अलग नहीं कर सकता.
हमें आज पहले की तुलना में कहीं अधिक आज़ादी है. हम आर्थिक रूप से पहले से बेहतर हैं और हमने पिछले 20-25 सालों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी साख जमाई है.
भारत के इस परिवर्तन को मैंने न केवल महसूस किया है बल्कि इसकी अपनी पत्रकारिता में एक जगह भी बनायी है. बदलाव के दौरान सामाजिक और सियासी उथल-पुथल होने का डर रहता है.
सऊदी अरब 1931 में अपने जन्म से ही वहाबी इस्लाम के काफी क़रीब रहा है. अगर वहाबी मुल्लाओं ने साथ दिया तो सऊदी सरकार बदलाव लाने में पूरी तरह से कामयाब हो सकती है.
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