अफ़ग़ानिस्तान में 'सुनती हो' के ख़िलाफ़ फूटा ग़ुस्सा

    • Author, पैट्रिक इवांस
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

अफ़ग़ान समाज में सार्वजनिक रूप से महिलाओं का नाम न लेने का चलन है.

आम तौर पर परिवार में उम्र में छोटे सदस्य महिलाओं को मां, बेटी या बहन कहकर संबोधित करते हैं.

महिला का नाम लेना एक तरह से गुस्सा ज़ाहिर करना माना जाता है और कभी कभी तो इसे अपमान के रूप में भी लिया जा सकता है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, अफ़ग़ान क़ानून के तहत जन्म प्रमाणपत्र में मां का नाम दर्ज नहीं किया जाता है.

अब महिला अधिकार कार्यकर्ता सोशल मीडिया में #WhereIsMyName के हैशटैग से एक अभियान चलाकर इसमें बदलाव की मांग कर रहे हैं.

सोशल मीडिया पर अभियान

पिछले कुछ दिनों में इस हैशटैग को 1,000 बार इस्तेमाल किया गया. इस अभियान में शामिल बहर सोहैली ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया, "ये केवल एक चिंगारी है, जिसके माध्यम से अधिकांश अफ़ग़ान महिलाओं के सामने ये सवाल रखा जा रहा है कि उनकी पहचान से उन्हें क्यों महरूम रखा जाता है. सच्चाई ये है कि महिलाएं भी इस मुद्दे पर खामोश बनी रहती हैं, वो इसका विरोध नहीं करतीं."

इस अभियान का समर्थन करने वाली क़ाबुल की नज़ला ने बीबीसी को बताया, "इस रुढ़िवादी परम्परा को हमने पिछली पीढ़ी से लिया है. यहां तक कि अपनी पत्नियों का नाम लेने में शर्मिंदगी महसूस करने वाले आदमी भी नहीं जानते कि इसके पीछे की वजह क्या है."

वो कहती हैं, "वो इसे एक तरीक़ा मानते हैं क्योंकि इसे उन्होंने बुज़ुर्गों से सुन रखा है."

लोकप्रिय अफ़ग़ानी संगीतकार फऱहाद दारया ने 10 जुलाई को अपनी और अपनी पत्नी सुल्ताना की फ़ेसबुक पर तस्वीर साझा करते हुए इस अभियान का समर्थन किया.

मर्द भी आए समर्थन में

सोशल मीडिया पर उन्होंने इस तस्वीर के साथ लिखा कि जब भी उन्होंने अपनी पत्नी या मां का नाम लिया, भीड़ की ओर से नकारात्मक प्रतिक्रिया आई. लेकिन उनकी पोस्ट पर लोगों ने काफ़ी सकारात्मक प्रतिक्रियाएं दी हैं.

खान लीला ने लिखा, "मैं ये देख कर बेहद ख़ुश हूं कि हमारे गायक भी महिलाओं के अधिकारों के समर्थन में खड़े हैं."

इस पहल पर अन्य पुरुष भी समर्थन में खड़े होने को प्रेरित हुए. नाज़िर सईद ने लिखा है, "अब, मुझे भी कायर कहिए. मेरी पत्नी का नाम ताहिरा है."

नाशिर अंसारी ने टिप्पणी की है, "महिलाओं के नाम छिपाने का इस्लाम से कोई संबंध नहीं है. अगर ऐसा होता तो, इस्लाम के पैगंबर की पत्नियों के नाम हर कोई क्यों जानता है?"

बीबीसी की फ़ारसी सेवा ने इस अभियान से जुड़ी कई महिलाओं से बात की.

मरने के बाद भी गुमनाम

क़ाबुल की रहने वाली तहमीना ने बीबीसी से कहा, "किसी की मां, बहन, बेटी या पत्नी होने से पहले मैं एक महिला हूं."

वो कहती हैं, "मैं अपने नाम से बुलाया जाना चाहती हूं. हर जगह, चाहे वो स्कूल हो या घर, किसी और नाम से पुकारे जाने से मैं थक चुकी हूं. मेरे लिए वाक़ई ये पीड़ादायी है."

अफ़ग़ानिस्तान के हेरात प्रांत की रहने वाली तलाया कहती हैं, "अंतिम संस्कार के समय भी महिलाओं का नाम नहीं लिया जाता, ना ही अंतिम संस्कार के कार्ड पर उनका नाम लिखा जाता है और क़ब्र के पत्थर पर भी उनका नाम नहीं लिखवाया जाता, इसलिए वो मौत के बाद भी गुमनाम ही रहती हैं."

तलाया के अनुसार, "इस लड़ाई में न केवल महिलाएं, बल्कि उन पुरुषों को भी खड़ा होना चाहिए जो खुद महिलाओं के इस दुख का कारण हैं. सभी को इस अधिकार के लिए कोशिश करनी चाहिए. इसके लिए उन्हें रात दिन महेनत करना होगा."

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