'मेरी मां ने कभी गंगाजल शब्द नहीं बोला'

    • Author, नवीन नेगी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

क्या आपने कभी गौर किया है कि आपकी मां आपके पिता को कैसे पुकारती हैं? वो उनका नाम लेती हैं या नहीं?

बात उठी इस वीडियो से जिसमें कुछ गांव की महिलाएं शर्माते हुए ज़िंदगी में पहली बार अपने पति का नाम ले रही थीं.

मुझे ख़्याल आया कि मैंने भी अपनी मां को कभी पिता का नाम लेते नहीं सुना. मां के ही जैसे पड़ोस की अपनी ताई को भी ऐसा करते नहीं सुना.

गर्मियों में जब घर में गेंहू खरीदा जाता, तो वो एक ख़ास किस्म के गेंहू का नाम भी नहीं लेती और इशारों में गेंहू दिखाने को कहतीं.

मै यह देखकर हैरान होता कि मेरी तेज़-तर्रार ताई को इस गेंहू का नाम कैसे नहीं पता.

'गेहूं का नाम भी नहीं लेती थीं'

बाद में मां ने बताया कि ताऊ का नाम 'डब्बल सिंह' है और गेहूं की इस किस्म के नाम 'डब्ल्यू-75' में वह अक्षर आता है, इसलिए ताई उसका नाम नहीं लेतीं.

बात छिड़ी तो सभी साथी अपनी-अपनी यादों के झरोखों में झांखने लगे.

मेरे सहयोगी सुशील झा का किस्सा भी मज़ेदार रहा. उन्होंने बताया कि उनके पिता का नाम जमुना झा है और चाचा का नाम गंगा और उनकी मां इन दोनों का ही नाम नहीं लेतीं.

गंगाजल को वह हरिद्वार वाला 'शुद्द' जल पुकारती हैं. वहीं एक बार दिल्ली घूमने आईं तो जमुना पार जाने के लिए कहने लगीं कि चलो 'नदी पार' चलते हैं.

संस्कार से जोड़कर देखते हैं

भारतीय परिवारों में मां-दादी-ताई-चाची का अपने जीवनसाथी का नाम नहीं लेना अपने पति के प्रति इज़्ज़त दिखाने का उनका एक तरीका रहा.

पति का नाम लेने वाली औरतों को परिवार में बुरा माना गया, यह समझा गया कि वे बहुत चालाक, तेज़, घमंडी हैं और ख़ुद को पति और परिवार से ऊपर समझती हैं.

18-19 साल की उम्र में इन महिलाओं के साथ जिस नाम को जोड़ा गया, उनकी ज़ुबान से उसे ही हमेशा के लिए अलग कर दिया गया.

यह बात भी सामने आती है कि पति भी पत्नियों के नाम खुलकर नहीं लेते, लेकिन पत्नियों के नाम लेने वाले पतियों को घमंडी और चालाक नहीं समझा जाता.

'उम्र कम हो जाती है'

बीबीसी की रूपा झा ने बताया, कि उनकी मां, इंदु रानी की शादी 13 साल की उम्र में ही हो गई.

उस छोटी सी उम्र में ही वह सीख गईं कि अब अपने पति नीति रंजन का नाम ज़ुबान से नहीं लेना है.

लेकिन पिता भी खुलेआम मां का नाम लेने से बचते रहे. इतना ही नहीं उन दिनों वे दोनों कोशिश करते कि दिन के समय वे एक-साथ ना दिख जाएं.

मेरी सहयोगी सुशीला सिंह ने इस चलन से जुड़े एक अंधविश्वास की बात बताई.

उनके माता पिता की शादी को चार दशक हो चुके हैं लेकिन उनकी मां कृष्णा देवी ने आज तक अपने पति रोहतास सिंह का नाम नहीं लिया.

उनकी मां का कहना था कि उन्होंने बड़े बुजर्गों से सुना था कि पति का नाम लेने से उनकी उम्र कम हो जाती है.

हालांकि आज जब वो अपनी बहू या बेटी को पति का नाम लेते हुए सुनती हैं तो कभी नहीं टोकती क्योंकि उनका मानना है कि अब लोग पढ़े-लिखे हैं, बराबरी में यक़ीन रखते हैं इसलिए एक दूसरे का नाम क्यों नहीं ले सकते.

बदलता ज़माना

यह सुनने पर मेरी नज़रों के सामने धारावाहिक 'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' के चित्र उभरने लगे.

उसकी मुख़्य किरदार दया बेन कभी अपने पति जेठालाल का नाम नहीं लेतीं. वो हमेशा उन्हें 'टप्पू के पापा' कहकर बुलाती हैं.

इसी तरह 'भाभी जी घर पर हैं' सीरियल में गांव वाली भोली-भाली अंगूरी भाभी अपने पति को हमेशा 'लड्डू के भैया' कहकर बुलाती हैं.

जबकि शहर वाली पढ़ी-लिखी आत्मनिर्भर अनीता भाभी बेधड़क अपने पति को 'विभू डार्लिंग' कहती हैं.

हालांकि, अब यह सोच पीछे छूट रही है और पति-पत्नी एक-दूसरे का नाम खुलकर ले रहे हैं और अपने प्यार का इज़हार भी कर रहे हैं.

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