'मै छोटी उम्र में गर्भवती थी, अकेली थी...'

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तंज़ानिया के राष्ट्रपति जॉन मगुफुली ने कहा है कि गर्भवती लड़कियों को स्कूल से निकाल देना चाहिए.
उन्होंने कहा था कि जो लड़कियां मां बन गई हैं उन्हें स्कूल जाने की अनुमति नहीं देनी चाहिए.
इसके बाद उनकी जमकर आलोचना हो रही है.
इस बारे में एक ऑनलाइट पेटीशन पर हस्ताक्षर कराए जा रहे हैं और अफ़्रीक का एक महिला संगठन चाहता है कि राष्ट्रपति अपनी टिप्पणी कि लिए माफ़ी मांगे.

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यहां हम जैकी लीयोनार्द लोमबोमा की कहानी बता रहे हैं जो कम उम्र में मां बनी लड़कियों के लिए एक सेंटर चलाती हैं.
यह सेंटर पूर्वी तंज़ानिया के मोरागोरो शहर में है. लीयोनार्द भी स्कूल की उम्र में ही मां बन गई थीं.
पढ़िए उन्हीं की शब्दों में उनकी कहानी-
मैं तीन महीने की उम्र में अनाथ हो गई थी. मेरे दादा ने देश के पश्चिमी-मध्य इलाक़े के तबोरा गांव में मुझे पाला-पोसा. मुझे बुनियादी सुविधा देने के लिए भी उन्हें संघर्ष करना पड़ा.
किसी तरीक़े से मैंने प्राथमिक स्कूल की पढ़ाई पूरी की. मेरे दादा के पास माध्यमिक स्तर की पढ़ाई का खर्च वहन करने के लिए पैसा नहीं था. ऐसे में मैं घर में ही दो साल तक रही.

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मेरी बेटी का पिता
उस वक़्त एक युवक से मेरी मुलाक़ात हुई. उसने प्रस्ताव रखा कि यदि मैं उसका साथ कबूल लूँ तो वो अपने माता-पिता से माध्यमिक स्तर की पढ़ाई के खर्च की लिए बात करेगा.
मैं अपनी पढ़ाई को लेकर घबराई हुई थी और मुझे यह एक अवसर की तरह लगा. मेरे कम उम्र में मां बनने की वजह यही थी. मैंने गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड की तरह उसके साथ डेटिंग नहीं की थी.
पहली बार मिली और पहली बार में ही गर्भवती हो गई और फिर उसे मैंने आख़िरी बार देखा. वह पहली बार था जब मैंने सेक्स किया था और गर्भवती हुई थी.
मैं छोटी लड़की थी, गर्भवती थी और अकेली थी. इसके बावजूद मेरे सपने नहीं मरे थे. इसकी उम्मीद ना के बराबर थी कि मेरी निराशाजनक स्थिति बदलेगी.
मेरे दादा ने मुझे घर से बाहर निकाल दिया. मेरे लिए कुछ भी सहारा नहीं बचा था. वहां के रस्म-रिवाज और परंपरा भी मेरे साथ नहीं थे.
जब कोई लड़की शादी से पहले गर्भवती होती है तो यह किसी अभिशाप से कम नहीं है. यह अभिशाप आपके परिवार, गांव और सभी के लिए है. ऐसे में मुझे उस इलाक़े से बाहर निकलना पड़ा.
मैं बिना परिवार या समाज के समर्थन के बिल्कुल अकेले थी. साथ ही मेरी बच्ची के पिता का भी पता नहीं था. मेरी कोशिश इसलिए भी बेकार थी क्योंकि वह कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेना चाहता था.
मुझे किसी क़ानून के बार में कुछ पता नहीं था. मुझे नहीं पता था कि ख़ुद को ज़िंदा रखने के लिए कहां से मदद लेनी चाहिए. मैं ख़ुद को बिल्कुल असमर्थ पा रही थी.
स्कूल में फिर से वापसी
मैंने कई घरों में नौकरानी का काम किया. मैं युगांडा में बसे तंज़ानिया के एक परिवार के घर में काम करने गई. आख़िर में उस परिवार ने दूसरी जगह जाने का फ़ैसला किया.
उस घर की मां ने मुझसे पूछा कि मैं विदाई गिफ़्ट के रूप में क्या चाहती हूं. मैंने काम अच्छा किया था इसलिए वह कुछ कीमती देना चाहती थीं.
मैंने उनसे कहा कि मैं स्कूल जाना चाहती हूं. मेरा यह कहना उनके लिए हैरान करने वाला था. उन्हें ऐसी उम्मीद नहीं थी. उन्हें लगा था कि मैं पैसे मांगूंगी.

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उन्होंने मुझे तंज़ानिया में बिज़नेस शुरू करने के लिए शुरुआती पूंजी देने का प्रस्ताव दिया, लेकिन मैं अपने निर्णय पर अडिग थी. मेरे पास यह अपने सपनों को साकार करने का दूसरा मौक़ा था और मैं इसे सच होते देख रही थी.
अगर वह मुझे लाखों की रकम भी दे देतीं तो मेरे पास पढ़ाई के नाम पर प्राथमिक शिक्षा ही होती.
मैंने महसूस किया कि मुझे ज्ञान और स्किल चाहिए ताकि इन पैसों को बुद्धिमत्ता से खर्च कर सकूं. आख़िरकार वह मुझे स्कूल ले जाने के लिए सहमत हो गईं.
इसके साथ ही माध्यमिक स्कूल की मेरी यात्रा शुरू हुई. मैंने युगांडा में दाखिला लिया. मुझे ख़ुशी हुई कि वहां तंज़ानिया के भी स्टूडेंट थे और जल्द ही मेरी दोस्ती हो गई.
हालांकि वह मेरे लिेए मुश्किल वक़्त था. मुझे परेशान किया गया. मेरा मज़ाक उड़ाया गया पर मैंने ख़ुद को कमज़ोर नहीं होने दिया.
मुझे पता था कि शिक्षा के ज़रिए ही सकारात्मक बदलाव ला सकती हूं. इसी के ज़रिए मेरी और मेरी बेटी रोज़ की ज़िंदगी बेहतर हो सकती थी.
राष्ट्रपति से निराशा
राष्ट्रपति का यह कहना कि जो लड़कियां गर्भवती हैं उन्हें स्कूल से निकाल दिया जाना चाहिए, सुनकर काफ़ी दुख हुआ.
मैं काफ़ी निराश हूं क्योंकि तंज़ानिया दुनिया के सबसे ग़रीब देशों में से एक है.
ऐसे में हमें वंचित तबकों को ताक़त देने की ज़रूरत है. ख़ासकर ऐसा हम कम उम्र में मां बनी लड़कियों के बीच शिक्षा के माध्यम से कर सकते हैं.
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