मशाल खान: 'इल्म से भरे दिमाग को कुचल डाला'

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- Author, उरूज जाफरी
- पदनाम, मर्दान, पाकिस्तान से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
तीन साल की उम्र से ही स्कूल जाने की ज़िद्द करने वाले मेधावी छात्र मशाल ख़ान की पिछले महीने पाकिस्तान के एक सूबे ख़ैबर पख्तूनख्वाह के अब्दुल वली ख़ान यूनिवर्सिटी में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी.
इसके बाद उनकी लाश से कई घंटों तक यूनिवर्सिटी के छात्रों ने बुरा सलूक किया था. और पुलिस ने दर रात उनकी लाश घर वालों को सौंपी थी.
मशाल खान 26 मार्च 1992 को ज़िला स्वाबी के गांव ज़ैदा में पैदा हुए थे. वो चार भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर थे लेकिन उनकी समझ सबसे बेहतर थी.
छह फुट लंबा यह खूबसूरत नौजवान अपनी सोच समझ और पढ़ाई-लिखाई की वजह से अब्दुल वली खान यूनिवर्सिटी में आम छात्रों से अलग समझा जाता था.
अब्दुल वली ख़ान यूनिवर्सिटी में मशाल ख़ान जर्नलिज्म डिपार्टमेंट के छठे सेमेस्टर में थे और इससे पहले रूस भी हो आए थे.
वो चेखोव यूनिवर्सिटी बेलग्रेड में सिविल इंजिनियरिंग की पढ़ाई के लिए भी गए थे लेकिन पिता की ख्वाहिश पूरी ना कर सके.
उनका मानना था कि उनके अंदर एक लेखक और कवि बसता है. इसलिए इंजिनियरिंग की पढ़ाई बीच में छोड़कर वापस आ गए.

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मशाल की मौत के तक़रीबन चालिस दिन होने को है. मेरी मुलाक़ात उनके यूनिवर्सिटी के एक अधिकारी से हुई तो मैंने उनके बारे में जानना चाहा.
उन्होंने मुझे बताया, " मशाल ख़ान कोई पहचान का मोहताज नहीं था यूनिवर्सिटी में. पढ़ाई में टॉपर में होने की वजह से सभी उसे जानते थे. और अपनी इंक़लाबी सोच की वजह से भी लोगों में जाना जाता था.
वो काफी स्टाइलिस्ट था और अक्सर कॉमरेड वाली लाल टोपी भी पहनता था और खाने का भी शौक़ीन था.
यूनिवर्सिटी के इस अधिकारी का यह भी मानना था, "बारह हज़ार से ज्यादा लोगों वाले इस यूनिवर्सिटी में कैंटीन स्टाफ को सब से ज्यादा टिप मशाल खान दिया करता था. उसने यूनिवर्सिटी होस्टल में एक बिल्ली और कुत्ता भी पाल रखे थे. जिन्हें अक्सर कैंटीन भी साथ ले जाता था. ज्यादा टिप देने की वजह से वो कैंटिन के स्टाफ के बीच सबसे पसंदीदा ग्राहक था. मैनेजर को इस बात का शिकवा भी हुआ करता था. वो दोस्तों का दोस्त था."

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मशाल खान पख्तून स्टूडेंट्स फेडरेशन के सदस्य थे. उनका मानना था कि यूनिवर्सिटी की फीस 25 हज़ार की बजाए पांच हज़ार रूपये होनी चाहिए.
यूनिवर्सिटी के इस अधिकारी का यह भी कहना है कि अपने जिन साथियों के लिए वो यूनिवर्सिटी प्रशासन से लड़ा करते थे वो भी उन्हें मारने वाले भीड़ में शामिल थे.
मशाल खान के घर वाले उसे किसी फरिश्ते की तरह देखते हैं. उनकी बहन अस्तूरीया और सबा खान का कहना है, "वो इंसान दोस्त थे. ख़ुद को मानवतावादी कहते और गोरे-काले के फ़र्क़ को नहीं मानते. वो औरत मर्द के लिए बराबरी की बात करते थे."
मशाल के बड़े भाई अमाल का मानना है, "मशाल खान दोस्तों का दोस्त था. वो हर किसी की मुसीबत और गुरबत दूर करना चाहते थे, नाइंसाफी बर्दाश्त नहीं करते मगर उनका मिजाज़ ठंडा था. वो सूफी संगीत पसंद करते थे."
अमाल कहते हैं कि उनकी मौत से उन्होंने अपना एक बेहतरीन दोस्त खो दिया है.
मशाल की दिल हिला देने वाली मौत के बावजूद घर वालों का हौसला सलाम के क़ाबिल है. उनके मां-बाप ने जिस दिलेरी से उनकी बातें बताई वो आसान नहीं.

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उनके पिता इक़बाल ख़ान स्वाबी ज़िला के ज़ैदा गांव के रहने वाले युसुफजई पठान हैं और उनकी मां गुलज़ार बीबी सैयद हैं और उनकी दादी बर्मा की थी.
इक़बाल ख़ान का मशाल के बारे में कहना है, "मशाल के नाम उन्होंने रखा था. जिसका मतलब होता है रौशनी. वो रौशनी ही था सोच की और ज्ञान की. वो खूबसूरत था. उसकी बातों में जादू सा असर था. वो किताबें का शौक़ीन था. बातें कम करता और दोस्त भी कम बनाता. किताबों में वक़्त गुजारता. समाज की समस्याओं को सुलझाना चाहता था."
मिर्ज़ा ग़ालिब को पढ़ने वाला मशाल खान पश्तो शायरी में अजमल खटक और रहमान बाबा को भी पढ़ा करता था.
उनकी मां गुलज़ार बीबी तो अपने बेटे की खूबसूरती और प्रतिभा को याद तक करते हुए कहती हैं, "मशाल बचपन से ही खूबसूरत और जेहनी था. वो सुनकर भी सबक याद कर लेता था. लड़ाई नहीं करता. उसे देखकर लगता कि ख़ुदा ने उसके शरीर का हर नक्श गौर से बनाया हो. आंखे, नाक, होंठ, हाथ-पैर सब. यूनिवर्सिटी के जालिमों ने सब मिटा दिया, बर्बाद कर दिया. उसके इल्म से भरे दिमाग को कुचल डाला. किस बात की सज़ा दी. पख्तून क़ौम ने अपने ही बेटे को बुरी तरह मार डाला."

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मशाल के ज़िंदगी समझने का अंदाज़ कार्ल मार्क्स और चे ग्वेरा की सोच वाला था. वो पूंजीवाद को नहीं मानते थे.
उन्हें ये सोच अपने घर में अपने पिता से मिली थी. जो ख़ुद एक कवि हैं और शायद यही यूनिवर्सिटी में उनकी भयानक मौत की वजह बनी.
यूनिवर्सिटी के अधिकारी इसे वाक़ये को सुरक्षा इंतज़ाम और प्रशासन की कमजोरी भी मानते हैं.
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