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फ्रांस: आसान नहीं डगर नवनिर्वाचित राष्ट्रपति मैक्रों की
फ्रांस के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अपनी नई ज़िम्मेदारी की तरफ़ सोमवार को पहला क़दम बढ़ाया, लेकिन अपनी सरकार को चलाने के लिए टीम का गठन उनके लिए बड़ी चुनौती होगी.
ऐसा इसलिए क्योंकि उनकी साल भर पुरानी पार्टी का संसद में एक भी सदस्य नहीं है.
अप्रैल 2016 में गठित एन मार्शे पार्टी का नाम बदलकर एन मार्शे से ला रिप्यूब्लिक एन मार्शे (रिपब्लिक ऑन द मूव) किया जा रहा है.
मैक्रों की जीत के बाद पार्टी के सामने संसदीय चुनाव बड़ी चुनौती हैं. 11 और 18 जून को फ़्रांस में होने वाले संसदीय चुनाव के लिए पार्टी को जल्द ही उम्मीदवार तय करने होंगे.
राष्ट्रपति चुनाव
रविवार को हुए राष्ट्रपति चुनाव में इमैनुएल मैक्रों ने धुर दक्षिणपंथी नेता मरी ल पेन को 33.9 फ़ीसदी वोटों के मुकाबले 66.1 फ़ीसदी वोटों से हराया है.
लेकिन इस बार फ़्रांस के चुनाव में कम मतदान प्रतिशत और शून्य (खाली) वोटों से लोगों की निराशा का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. ये निराशा ख़ास तौर पर वामपंथी तबके के वोटरों में रही क्योंकि उनके पास राष्ट्रपति चुनाव में अपनी पसंद का विकल्प नहीं रह गया था.
वहीं धुर दक्षिणपंथी उम्मीदवार मरी ल पेन ने भी अपनी पार्टी नेशनल फ्रंट में बड़े बदलाव के संकेत दिए हैं. उन्होंने संसदीय चुनाव में नई ताकत के साथ उतरने की बात कही थी. उनकी पार्टी के पदाधिकारी भी पार्टी का नाम बदलने का सुझाव दे चुके हैं.
सरकार चलाना कितना मुश्किल ?
इमैनुएल मैक्रों के सामने दो बड़ी मुश्किलें हैं- संसद में उनकी पार्टी का कोई प्रतिनिधि न होना और गहराई तक विभाजित फ़्रांस का समाज.
39 साल के मैक्रों न सिर्फ़ फ़्रांस के सबसे युवा राष्ट्रपति हैं बल्कि 1958 में फ़्रांसीसी गणतंत्र की स्थापना के बाद फ़्रांस की दो प्रमुख पार्टियों के बाहर से बनने वाले पहले राष्ट्रपति भी हैं.
हालांकि उन्हें हिचकिचाहट के साथ ही सही, सोशलिस्ट और रिपब्लिकन पार्टी से समर्थन मिला है, लेकिन वो मोटे तौर पर मरी ल पेन को हराने के मकसद से दिया गया था.
अब रूढ़िवादी रिपब्लिकन संसदीय चुनावों में दमदार प्रदर्शन की तैयारी में जुट गए हैं.
क्या कहते हैं ओपिनियन पोल?
मैक्रों के राष्ट्रपति चुनाव जीतने के तुरंत बाद आए ओपिनियन पोल के मुताबिक वो और उनकी सहयोगी पार्टी मोडेम संसदीय चुनाव के पहले राउन्ड में 11 जून को सबसे ऊपर रहेंगी जिसमें 24 से 26 प्रतिशत वोट इनके खाते में जाएंगे.
रिपब्लिकन और नेशनल फ्रंट, दोनों को 22-22 प्रतिशत वोट और धुर वामपंथी फ़्रांस अनबाउंड को 13 -15 प्रतिशत और राष्ट्रपति फ़्रांस्वा ओलांद की अलोकप्रियता से जूझ रही सत्तारूढ़ सोशलिस्ट पार्टी के खाते में सिर्फ नौ फ़ीसदी वोट जाते दिखाए गए हैं.
लेकिन फिर भी सीटों का अनुमान लगाना आसान नहीं है.
मरी ल पेन की नेशनल फ़्रंट के पास संसद में दो सीटें हैं और राष्ट्रपति चुनाव में ल पेन की हार के बाद एक ओपिनियन पोल के मुताबिक उनकी पार्टी को 577 सीटों वाली संसद में 15-25 सीटें ही मिलेंगी.
इस अनिश्चितता का मतलब है कि मैक्रों को अन्य पार्टियों को अपने मेनिफ़ेस्टो से सहमत कराने के लिए बड़ी सौदेबाज़ी करनी पड़ सकती है.
नेशनल फ्रंट की चुनौती?
नेशनल फ्रंट के नाम बदले जाने को संकेत मिल रहे हैं, लेकिन ये भी सच है कि मरी ल पेन की कई कोशिशों के बाद भी पार्टी उनके पिता जां मरी ल पेन के कट्टरवादी संपर्कों का ख़ामियाज़ा भुगत रही है.
पार्टी के महासचिव निकोलस बे समाचार एजेंसी एपी को बताया, "नेशनल फ़्रंट और सक्षम होकर उभरेगी. जितने लोगों तक पार्टी कल पहुंची थी उससे भी ज़्यादा लोगों को साथ लाएंगे. "
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